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वो मौत से कब तक लड़ती, आखिकार लोहिया संस्थान की रेजिडेंट डॉ. शारदा सुमन जिंदगी की जंग हार ही गईं

- किम्स में करीब 140 दिन तक वेंटिलेटर पर जूझती रहीं- डोनर न मिलने से फेफड़े का नहीं हो सका प्रत्यारोपण

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लोहिया संस्थान की रेजिडेंट डॉ. शारदा सुमन जिंदगी की जंग हार गईं

लोहिया संस्थान की रेजिडेंट डॉ. शारदा सुमन जिंदगी की जंग हार गईं

लखनऊ. आखिरकार डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान की रेजिडेंट डॉ. शारदा सुमन (Sharda Suman) जिंदगी की जंग हार गईं। 140 दिन तक जीवन की आस के लिए लगातार मौत से संघर्ष करने के बाद डॉ. शारदा सुमन ने सोमवार को हैदराबाद (KIMS Hospital HYDERABAD) में इहलोक को अलविदा कर दिया। काफी इंतजार के बाद भी डोनर न मिलने की वजह से फेफड़ा प्रत्यारोपण नहीं हो सका। अब दुधमुंही बेटी से मां का साया उठ गया। परिजनों ने उनका हैदराबाद में ही अंतिम संस्कार कर दिया।

जिंदगी को बचा रहा था एकमो :- लोहिया संस्थान के स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग में वर्ष 2018 में डॉ. शारदा सुमन ने जूनियर रेजिडेंट के पद पर नौकरी शुरू की। वह संस्थान में डीएनबी की छात्रा थीं। 29 मई 2019 में खलीलाबाद निवासी डॉ. अजय से डॉ. शारदा का विवाह हुआ था। गर्भावस्था में दौरान शारदा ने ड्यूटी किया और वह कोरोना संक्रमित हुईं थीं। जहां उनके दोनों फेफड़े खराब हो गए। डॉ. अजय ने बताया कि, पत्नी एकमो पर जिंदगी के लिए संघर्ष करती रहीं।

यूपी सरकार ने मंजूर किया डेढ़ करोड़ का खर्च :- एकमो पर जीवन के लिए संघर्ष कर रही शारदा सुमन ने एक बच्ची को जन्म दिया। इस बीच उनके इलाज के लिए फेफड़ा प्रत्यारोपण (lung transplant) का विकल्प सुझाया गया जिसके लिए करीब डेढ़ करोड़ रुपए का खर्च आना था, जिसे यूपी सरकार ने मंजूर कर लिया।

करीब 140 दिन का रहा संघर्ष :- 11 जुलाई को शारदा को हैदराबाद के कृष्णा इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल सांइसेस (किम्स) में एयरलिफ्ट किया गया। करीब 34 दिन डॉ. शारदा का इलाज किम्स में चला। पर डोनर न मिलने से फेफड़ा प्रत्यारोपण नहीं हो पाया। आखिर में चार सितंबर को डॉ. शारदा की जिंदगी की डोर टूट गई। पति ने बताया कि, करीब 140 दिन वह संघर्ष करती रहीं।

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