आज भी बिल्कुल वैसा ही जुलूस निकाला जाता है, जैसा अवध के पहले राजा मोहम्मद अली शाह बहादुर ने अठ्ठारह सौ अड़तिस में निकाला था। उसी तरह के गाजे-बाजे, मातमी धुन बजाते बैंड,शहनाई और सबसे ख़ास चीज माहे मरातिब यानि और शमशीर (तलवार ) साथ निकलता है यह जुलूस। उत्तर प्रदेश पुलिस का बैंड भी इसमें शामिल होता है और लखनऊ की मशहूर अंजुमने (समूहों ) मार्शिया (तारीफ़ में क़सीदे पढ़ना ) पढ़ती है।