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शुभ और अशुभ दोनों ही है ये महापौर की कुर्सी, यहां हार के बावजूद बढ़ता है राजनीतिक कद

जो-जो यहां से बना महापौर फिर कभी नहीं जीता कोई भी चुनाव !

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लखनऊ

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Dikshant Sharma

Oct 30, 2017

lucknow mayor

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लखनऊ. निकाय चुनाव में सभी पार्टियां एड़ी चोटी का जोर लगा रही हैं। उम्मीदवारों में सबसे अधिक होड़ है महापौर की सीट पर दावेदारी ठोकने की। दूसरे राज्यों के राज्यपाल हों या सांसद, सभी अपने रिश्तेदारों को पार्टी के प्रतिनिधि के तौर पर मेयर पद की दावेदारी कर रहे हैं। सिफारिशों का बाजार भी सज गया है। आखिर हो भी क्यों ना ? दरअसल ये कहना गलत नहीं होगा कि प्रदेश की राजनीति के बड़े पदों पर पहुंचने का रास्ता यही से होकर गुज़रता है। इतिहास देखें को प्रदेश में अभी तक छह बार उप मुख्यमंत्री नियुक्त हुए हैं जिसमें से दो बार यह जिम्मेदारी लखनऊ के महापौर रह चुके राजनेताओं को मिली। ये सीट बेशक राजनीतिक कद बढ़ा देती हो लेकिन इससे एक हार का टोटका भी जुड़ा है।

50 साल पहले 1967 में तत्कालीन चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व वाली सरकार में राम प्रकाश गुप्ता को प्रदेश का उप मुख्यमंत्री बनाया गया था। इस सरकार में जनसंघ भी शामिल थी। पहले राम प्रकाश गुप्ता उप नगर प्रमुख यानी डिप्टी मेयर का पद संभाल चुके थे। 1999 में कल्याण सिंह के बाद इन्हे प्रदेश का मुख्यमंत्री भी बनाया गया और फिर वे मध्यप्रदेश के राज्यपाल रहे। इनके अलावा वर्तमान उपमुख्यमंत्री डॉ दिनेश शर्मा भी दो बार लखनऊ नगर निगम सदन में बतौर महापौर रह चुके हैं। वे सबसे पहले 2006 में महापौर चुने गए थे और दोबारा 2012 में महापौर चुन कर वे सदन पहुंचे। 2017 में उन्हें डिप्टी चीफ मिनिस्टर बनाया गया।

इस कुर्सी से जुड़ा है हार का टोटका

लखनऊ सदन प्रमुख की कुर्सी पर बैठने के लिए तो जंग छिड़ी हुई है लेकिन बहुत कम ही लोग ये जानते हैं कि यहां से महापौर बनने वाला कोई और चुनाव नहीं जीत सका। हाँ, कइयों का कद तो बढ़ा लेकिन इसके लिए उन्हें दूसरा सहारा लेना पड़ा।

इसे अंधविश्वास कहें या संयोग लेकिन जो भी यहां महापौर बना फिर कोई सीधा चुनाव नहीं जीता सका। पूर्व महापौर दाऊ जी गुप्ता करीब 21 साल तक महापौर रहे थे लेकिन वे लोकसभा का चुनाव नहीं जीत सके। बाद में वह एमएलसी बनकर सदन पहुंचे। यही नहीं डॉक्टर अखिलेश दास गुप्ता भी महापौर बनने के बाद लोकसभा चुनाव हारे। वे कांग्रेस सरकार में केंद्र मंत्री रहे पर इसके लिए उन्हें राज्यसभा का सहारा लेना पड़ा। डॉ पुरुषोत्तम दास कपूर महापौर बनने के बाद विधायक और सांसद का चुनाव लड़े लेकिन दोनों में ही उन्हें पराजय मिली। कैप्टन वीर मोहन ने भी महापौर बनने के बाद लोकसभा चुनाव लड़ा लेकिन जीत उन्हें हाथ नहीं लगी।