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भाजपा के लिए क्यों जरूरी हैं अनुप्रिया पटेल, संजय निषाद और ओम प्रकाश राजभर

- पूर्वांचल साधने के लिए भाजपा ने सहयोगियों को मनाना शुरू किया- तीन जातीयों के नेता हैं पूर्वी यूपी के क्षेत्रीय क्षत्रप

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महेंद्र प्रताप सिंह

पत्रिका न्यूज नेटवर्क

लखनऊ. उप्र में अंतर्कलह से जूझ रही भारतीय जनता पार्टी के लिए पूर्वांचल का गढ़ बचाना सबसे अहम है। अब जबकि 2022 में प्रस्तावित विधान सभा चुनाव में आठ महीने का वक्त बचा है। भाजपा अपने पुराने सहयोगियों को मनाने में जुट गई है। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से अनुप्रिया पटेल और डॉ. संजय निषाद की मुलाकातों से स्पष्ट है कि भाजपा अपने सहयोगियों को किसी कीमत पर छोड़ना नहीं चाहती।

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क्यों जरूरी है अनुप्रिया पटेल का साथ

पूर्वांचल में अन्य पिछड़ा वर्ग और दलितों की बहुलता है। सबसे पिछड़े और गरीब तबके के इस वर्ग से अपने-अपने क्षेत्रीय क्षत्रप हैं। अपना दल (एस) की अध्यक्ष अनुप्रिया पटेल पूर्वांचल में ओबीसी की अधिसंख्य आबादी पटेल यानी कुर्मी बिरादरी की नुमाइंदगी करती हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में अपना दल भाजपा की सहयोगी थी। और अनुप्रिया पटेल केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल थीं। लेकिन, 2019 के बाद इन्हें भाजपा ने कोई तवज्जों नहीं दी। हालांकि, योगी मंत्रिमंडल में अपना दल के कोटे से एक मंत्री है। उचित प्रतिनिधित्व न मिलने से अनुप्रिया भाजपा से नाराज चल रही हैं। इधर, सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव से अपना दल की बढ़ती नजदीकियों के मद्देनजर एक बार फिर अनुप्रिया को केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल करने की चर्चाएं तेज हो गयी हैं। जबकि, पार्टी के कार्यकर्ताओं को विभिन्न निगमों और आयोग में शामिल कर पटेल बिरादरी को खुश करने की कोशिश की जाएगी।

गोरखपुर मंडल में संजय निषाद का प्रभाव

यूपी में तकरीबन 12 फीसदी आबादी मल्लाह, केवट और निषाद जातियों की है. यूपी की तकरीबन 20 लोकसभा सीटें ऐसी हैं जहां निषाद वोटरों की संख्या अधिक है। गोरखपुर और उसके आसपास के कई जिलों में मल्लाह या निषाद जातियां काफी प्रभावी हैं। निषाद अन्य पिछड़ी जाति में आते हैं। निषाद पार्टी के अध्यक्ष डॉ. संजय निषाद मल्लाह,केवट या निषाद जाति को अनुसूचित जाति में शामिल करने की लंबे अर्से से मांग कर रहे हैं। दस्यु सुंदरी फूलन देवी मिर्जापुर से सपा सांसद हुआ करती थीं। इनकी मौत के बाद संजय ने निषादों को एकजुट किया। गंगा तट के करीब 16 जिलों में निषाद मत काफी संख्या में हैं। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी भी जब तब मल्लाहों और केवटों की राजनीति करती रही हैं। इसीलिए भाजपा इस जाति को अपने से छिटकने नहीं देना चाहती।

राजभर ने भाजपा को किया निराश

पूर्वांचल में तीसरी जाति जो सबसे ज्यादा प्रभावी है वह है राजभर। यहां राजभर मतदाताओं की संख्या 12 से 22 फीसदी तक है। इस जाति के क्षेत्रीय क्षत्रप हैं सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर। राजभर जाति भी पिछड़ी जाति में आती है और पूर्वांचल की कम से कम 60 विधानसभा सीटों पर इनके निर्णायक मत हैं। पिछला चुनाव भाजपा ने राजभर की पार्टी के साथ मिलकर लड़ा था। और राजभर योगी मंत्रिमंडल में शामिल भी थे। लेकिन, पार्टी तोडऩे का आरोप लगाते हुए वह भाजपा से अलग हो गए। दो दिन पूर्व भाजपा ने अपने एक वरिष्ठ सहयोगी के जरिए राजभर से मेलजोल बढ़ाने की कोशिश की। लेकिन, राजभर से भाजपा से दोबारा गठबंधन करने से मना कर दिया है। शुक्रवार को भी उन्होंने भाजपा को डूबती हुई नैया बताया है।