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Mahant Avaidyanath: जब सीएम योगी के गुरु ने कहा था “हनुमान जी का मंदिर नहीं बनेगा तो जियाउल हक की मजार बनाओगे”

Mahant Avaidyanath: गोरक्षपीठाधीश्वर ब्रम्हलीन महंत अवैद्यनाथ जी आध्यात्मिक संत होने के साथ सामाजिक समरसता के अग्रदूत रहे। आज उनके जन्म जयंती के अवसर पर राममंदिर निर्माण आंदोलन से लेकर हिंदू चेतना के जागरण तक उनके योगदान को याद करने का प्रयास करते हैं...

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ब्रम्हलीन महंत अवैद्यनाथ और उनके शिष्य सीएम योगी

बात सन 1989 की है जब मैने महाराणा प्रताप इंटर कॉलेज गोरखपुर में नौंवी क्लास में एडमिशन लिया। कॉलेज के ही प्रताप हॉस्टल के कमरा नंबर 71 मेरे लिए एलॉट किया गया था। घर से पहली बार दूर आया था और लगातार घर की याद आ रही थी। महंत अवैद्यनाथ जी का नियम था वह प्रत्येक बच्चे से मिलते थे और उसे मिठाई फल आदि दिया करते थे। नए सत्र के बच्चों से मिलने के लिए एक बस आई और सभी लोग उसमें बैठकर गोरखनाथ मंदिर गए जहां महंत जी ने सबको अपना आशीष दिया और मिठाई देते हुए कहा खूब मन लगाकर पढऩा है।

एक-एक बच्चे से पूछते तुम्हारा नाम क्या है? इसके पहले कहां पढ़ते थे ? पिता जी क्या करते हैं ? यह सवाल उन्होने मेरे से भी किया, तब मै रोने लगा और कहा मै घर जाउंगा मुझे घर की याद आती है। महंत जी मुझे रोता देखकर पकडक़र सीने से लगा लिए और कहा मै भी आपका पिता ही हूं, मत रोओ, मिठाई खाओ बेटा... लेकिन मै नहीं माना और कुछ दिन बाद घर वापस जाकर दूसरे कॉलेज में एडमिशन ले लिया। अब सोचता हूं तो लगता है, कितने संवेदनशील और मानवीय थे महंत अवैद्यनाथ जी वास्तव में वह मनसा वाचा कर्मणा संत थे।

जिया उल हक की मजार बनाओगे
इधर 1990 का दशक राममंदिर आंदोलन अपने उफान पर था और महंत जी, अशोक सिंहल, विनय कटियार, साध्वी ऋतंभरा, उमा भारती की रैलियां चल रही थी। कभी शिला पूजन, तो कभी रामज्योति यात्रा आदि निकल रहे थे। माहौल गर्म था। फिजाओं में एक ही नारा था कि ‘सौगंध राम की खाते हैं, हम मंदिर वहीं बनाएंगे’।

इसी बीच गोरखपुर से सटे देवरिया जिले में एक स्थान पर बिजली का करंंट लगने से एक बंदर की मौत हो गई। जिस जगह पर बंदर की मौत हुई वह भूमि बचत की या सार्वजनिक भूमि थी। गांव के लडक़ों ने वहां हनुमान जी का मंदिर निर्माण शुरू कर दिया। लेकिन जो ग्राम प्रधान थे, वह इसका विरोध करने लगे। मामला बढ़ गया और धीरे-धीरे बड़े लोग इसमें शामिल होने लगे। तभी किसी ने गोरखनाथ मंदिर पर महंत अवैद्यनाथ जी को बता दिया और वे मंदिर निर्माण स्थल पर पहुंच गए।

चारों तरफ जय श्रीराम के नारों से गूंज उठा और महंत जी ने मंच से एसडीएम से पूछा यहां मंदिर क्यों नहीं बन सकता ? प्रशासनिक अधिकारियों ने बताया कि यह सार्वजनिक भूमि है। महंत जी ने कहा तो सार्वजनिक भूमि किसकी है हिंदुस्थान की या पाकिस्तान की ? मंदिर हिंदुस्थान की सार्वनिक भूमि पर नहीं बनेगा तो क्या तुम यहां जिया उल हक की मजार बनाओगे? इसके बाद और जोर से जय श्रीराम के नारे लगे। अखंड रामचरित मानस, भजन कीर्तन शुरू हुआ और निर्बाध मंदिर निर्माण हुआ।

कुंभ में जब महंत जी आए
राममंदिर विरोधी विरोधियों ने राममंदिर का उपहास उड़ाने और आंदोलन के लोगों का मजाक बनाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ा था। तथाकथित सेकुलर विपक्षी नेताओं ने नारा ही बना दिया था कि
मंदिर वहीं बनाएंगे, तारीख नहीं बताएंगे
इसी बीच मंदिर निर्माण को लेकर प्रयागराज कुंभ में धर्मसंसद का आयोजन होना था। चर्चा थी कि गोरक्षपीठ के महंत अवैद्यनाथ जी नहीं आ पाएंगे उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं है। देशभर के साधु-संत, महंत, आचार्य, महामंडलेश्वर, संयासी आदि धर्मसंसद के मंच पर थे, हजारों की तादात में गेरुआ पहने संत समाज दर्शक दीर्घा में आगे बैठा था। पीछे हजारों कार्यकर्ता, आम लोग, राम के प्रेमी, कल्पवासी आदि की हजारों की भीड़ थी। काफी लंबा चौंड़ा पांडाल खचाखच भरा था और देश-विदेश की मीडिया उनके कैमरे लगे थे।

तभी कोई सज्जन मंच पर पहुंचे और विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय महामंत्री (तत्कालीन) अशोक सिंहल के कान में कुछ कहा। अशोक सिंहल जी जल्दी से उठे और मंच के नीचे उतर कर पांडाल से बाहर पीछे की तरफ जल्दी-जल्दी जाने लगे। मै भी उनके पीछे भागा, तो पता चला महंत अवैद्य नाथ जी आ रहे हैं।

थोड़ी दूरी पर महंत अवैद्यनाथ छड़ी लिए चले आ रहे थे और उनके पीछे नाथ सम्प्रदाय के ब्रम्हचारी, साधु आदि घंटी, घडिय़ाल, शंख बजाते आ रहे थे। अशोक सिंहल जी महंत जी के सामने जाकर जल्दी से अपना चप्पल निकाले और आगे बढक़र बालू में लेट गए। साष्टांग प्रणाम कर उनको आगे करके पीछे-पीछे चलना शुरु किया। जब महंत जी मंच पर पहुंचे तो समस्त संतों ने हर-हर महादेव, जयश्रीराम कहकर उनका स्वागत किया।

देश भर में चलाया आंदोलन
सच कहे तो देश में 1857 के बाद जो सबसे बड़ा आंदोलन रहा है, वह निसंदेह श्रीरामजन्मभूमि का आंदोलन रहा है। इसके शिल्पकार गोरक्षनाथ पीठाधीश्वर ब्रम्हलीन महंत अवैद्यनाथ जी रहे हैं। हांलाकि इसके पहले भी महंत दिग्वििजय नाथ जी भी श्रीरामजन्म भूमि मुक्ति यज्ञ से जुड़े रहे हैं। लेकिन आज महंत अवैद्यनाथ जी के जन्म जयंती पर हम उनके योगदार की ही चर्चा करेंगे।

महंत जी की सबसे बड़ी विशेषता थी कि हिंदू धर्म के 13 अखाड़ों, विभिन्न मठों, आचार्यो और संतों के बीच मतभेद भुलाकर सबको एक मंच पर लाने में सफल थे। 21 जुलाई 1984 का जब राम जन्म भूमि यज्ञ समिति का गठन किया गया तो महंत जी को इसका प्रथम अध्यक्ष बनाया गया और वे जबतक जीवित रहे अध्यक्ष का कार्यभार देखते रहे। उनके नेतृत्व में ही राम मंदिर आंदोलन पूरे देश में जन-जन तक पहुंचा और हिंदुत्व को लेकर दुनिया भर में चर्चा शुरू हुई थी।

बाबर के आक्रमण के बाद से ही राममंदिर निर्माण को लेकर अनेक आंदोलन होते रहे लेकिन महंत अवैद्यनाथ जी के नेतृत्व में 1984 में शुरू हुआ राममंदिर आंदोलन अपने सफल परिणाम तक पहुंचा और सौगंध राम की खाते हैं, हम मंदिर वहीं बनाएंगे यर्थाथ, सत्य अविनाशी और सनातन सार्थक हो गया।