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Maulana Abul Kalam रामपुर से जीते थे चुनाव, बने देश के पहले शिक्षा मंत्री, क्या आप जानते हैं?

Maulana Abul Kalam आजाद देश के पहले शिक्षामंत्री थे। आज उनकी 64वीं पुण्यतिथि है। अंग्रेजों के भारत छोड़ने के बाद गठित पंडित जवाहर लाल नेहरू सरकार में उन्हें शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी मिली थी।

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लखनऊ

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Vishnu Bajpai

Feb 22, 2023

Maulana Abul Kalam Azad

मौलाना अबुल कलाम आजाद का यूपी से गहरा नाता है। आजादी के बाद देश में हुए लोकसभा चुनाव के लिए मौलाना अबुल कलाम आजाद ने यूपी के रामपुर का रुख किया था। यहीं से चुनाव जीतकर वह पहली बार सांसद और देश के पहले शिक्षामंत्री बने।

34753 मतों के अंतर से जीते थे चुनाव
पहले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस से अबुल कलाम आजाद थे। जबकि एचएमएस यानी हिन्द मजदूर महासभा ने बिशन चंद्र सेठ को चुनावी समर में उतारा था। चुनाव में अबुल कलाम को 108180 वोट मिले थे। जबकि बिशन चंद्र सेठ को 73427 वोट मिले थे। इसमें 34753 मतों के अंतर से मौलाना अबुल कलाम आजाद चुनाव जीत गए।

तीन बार रामपुर आए थे आजाद
अबुल कलाम आजाद के बारे में भारतीय सांस्कृतिक निधि रूहेलखंड के सह संयोजक काशिफ खां बताते हैं "वह महज तीन बार रामपुर आए। पहली बार चुनाव का नामांकन दाखिल किया। दूसरी बार जीत का प्रमाण पत्र लेने और तीसरी बार गांधी मैदान में सभा करने आए थे।

काशिफ खां आगे बताते हैं "अबुल कलाम आजाद बेशक पहले शिक्षा मंत्री रहे, लेकिन उन्होंने अवाम से किए वादे पूरे नहीं किए। चुनाव में उन्होंने मदरसा आलिया के जीर्णोद्घार की बात की थी, लेकिन पूरी नहीं की। जिस पर अवाम ने नवाब रजा अली खां से शिकायत की। नतीजतन अगले चुनाव में नवाब रजा अली खां ने राजा पीरपुर अहमद मेहंदी को रामपुर से चुनाव लड़वाकर जीत दिला दी।

कौन हैं मौलाना अबुल कलाम आजाद ?
मौलाना अबुल कलाम आजाद का जन्म 11 नवम्बर 1888 को मक्का, सऊदी अरब में हुआ था। इनके पिता मोहम्मद खैरुद्दीन एक बंगाली मौलाना थे, जो बहुत बड़े विद्वान थे। जबकि इनकी माता अरब की थी, जो शेख मोहम्मद जहर वात्री की बेटी थी। वह मदीना में मौलवी थी। जिनका नाम अरब के अलावा बाहरी देशों में भी था। मौलाना खैरुद्दीन अपने परिवार के साथ बंगाली राज्य में रहते थे, लेकिन 1857 के समय हुई विद्रोह की लड़ाई में उन्हें भारत छोड़कर अरब जाना पड़ा। वहीं मौलाना आजाद का जन्म हुआ। मौलाना आजाद जब दो वर्ष के थे। तब 1890 में उनका परिवार वापस भारत आ गया और कलकत्ता में बस गया। 13 साल की उम्र में मौलाना आजाद की शादी जुलेखा बेगम से हो गई।

रूढ़िवादी ख्यालों वाला था मौलाना आजाद का परिवार
मौलाना आजाद का परिवार रूढ़िवादी ख्यालों का था, इसका असर उनकी शिक्षा में पड़ा। मौलाना आजाद को परंपरागत इस्लामी शिक्षा दी गई। लेकिन मौलाना आजाद के परिवार के सभी वंशों को इस्लामी शिक्षा का बखूबी ज्ञान था, और ये ज्ञान मौलाना आजाद को विरासत में मिला। आजाद को सबसे पहले शिक्षा उनके घर पर ही उनके पिता द्वारा दी गई। इसके बाद उनके लिए शिक्षक नियुक्त किये गए, जो उन्हें संबंधित क्षेत्रों में शिक्षा दिया करते थे। आजाद ने सबसे पहले अरबी, फारसी भाषा सीखी, इसके बाद उन्होंने दर्शनशास्त्र, ज्यामिति, गणित और बीजगणित का ज्ञान प्राप्त किया। इसके साथ ही इन्होने बंगाली एवं उर्दू भाषा का भी अध्यन किया। मौलाना आजाद को एक विशेष शिक्षा और ट्रेनिंग दी गई, जो मौलवी बनने के लिए जरुरी थी।

भारत रत्न से नवाजे गए थे अबुल कलाम
मौलाना अबुल कलाम प्रसिद्ध भारतीय मुस्लिम विद्धान थे। कवि, लेखक, पत्रकार के साथ ही वह भारतीय स्वतंत्रता सेनानी थे। वह पाकिस्तान को अलग राष्ट्र बनाने का विरोध करने वाले मुस्लिम नेता थे। खिलाफत आंदोलन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। वर्ष 1923 में वह भारतीय नेशनल कांग्रेस के सबसे कम उम्र के प्रेसीडेंट बने। उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

अब आइये इनके बारे में दस रोचक जानकारियां साझा करते हैं...
1. एक मौलवी के रूप में शिक्षा लेने के बाद भी आजाद जी ने अपने इस काम को नहीं चुना और हिन्दू क्रांतिकारीयों के साथ, स्वतंत्रता की लड़ाई में हिस्सा लिया।

2. 1912 में मौलाना आजाद ने उर्दू भाषा में एक साप्ताहिक समाचार पत्र ‘अल-हिलाल’की शुरुआत की। जिसमें ब्रिटिश सरकार के खिलाफ खुलेआम लिखा जाता था। साथ ही भारतीय राष्ट्रवाद के बारे में भी इसमें लेख छापे जाते थे। यह अखबार क्रांतिकारियों के मन की बात सामने लाने का जरिया बना।

3. 1914 में अल-हिलाल को बैन कर दिया गया। इसके बाद मौलाना आजाद ने ‘अल-बलाघ’नाम की पत्रिका निकाली। जो अल-हिलाल की तरह ही कार्य करती थी। लगातार अखबार में राष्ट्रीयता की बातें छपने से देश में आक्रोश पैदा होने लगा। जिससे ब्रिटिश सरकार को खतरा समझ आने लगा और उन्होंने भारत की रक्षा के लिए विनियम अधिनियम के तहत अखबार पर प्रतिबंध लगा दिया। इसके बाद मौलाना आजाद को गिरफ्तार कर रांची की जेल में डाल दिया गया। जहां उन्हें एक जनवरी 1920 तक रखा गया।

4. जेल से बाहर आने के बाद मौलाना फिर भारतीय नागरिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत अधिकारों के आवाज बुलंद करने लगे। इस दौरान मौलाना आजाद ने खिलाफत आन्दोलन शुरू किया, जिसके द्वारा मुस्लिम समुदाय को जागृत करने का प्रयास किया गया। आजाद ने गांधी जी का ‘असहयोग आन्दोलन’ में सहयोग किया। जिसमें ब्रिटिश सरकार की हर चीज जैसे सरकारी स्कूल, सरकारी दफ्तर, कपड़े एवं अन्य समान का पूर्णतः बहिष्कार किया गया। इस दौरान इन्हें आल इंडिया खिलाफत कमेटी का अध्यक्ष चुना गया। बाद में खिलाफत लीडर के साथ मिलकर इन्होने दिल्ली में ‘जामिया मिलिया इस्लामिया संस्था’की स्थापना की।

5. 1923 में मौलाना आजाद को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया, इतनी कम उम्र में पहली बार किसी नेता को ये पद मिला था. इसके बाद इन्होने दिल्ली में एकता सम्मेलन में किया, साथ ही खिलाफत एवं स्वराजी के बीच मतभेद कम करने की कोशिश की।

6. 1928 में मौलाना आजाद किसी ने मुस्लिम लीग लीडर का विरोध कर मोतीलाल नेहरू का साथ दिया। उन्होंने मुहम्मद अली जिन्ना द्वारा सांप्रदायिक बात का विरोध किया और एक धर्मनिरपेक्ष देश की बात की।

7. 1930 में गांधी जी के साथ किये नमक तोड़ो आन्दोलन में, आजाद जी को बाकि नेताओं के साथ गिरफ्तार किया गया। 1934 में इन्हें जेल से रिहाई मिली। इसके बाद इन्होने भारत सरकार अधिनियम के तहत चुनाव के आयोजन में मदद की। केंद्रीय विधायिका में संयुक्त राष्ट्र के निर्वाचित सदस्यों की बड़ी संख्या के कारण, वे 1937 के चुनावों में नहीं थे।

8. 1940 में मौलाना आजाद को रामगढ़ सेशन से कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया। वहां उन्होंने धार्मिक अलगाववाद की आलोचना और निंदा की, और साथ ही भारत की एकता के संरक्षण की बात कही। वे वहां 1946 तक रहे। भारत की आजादी के बाद मौलाना जी ने भारत के नए संविधान सभा के लिए, कांग्रेस की तरफ से चुनाव लड़ा।

9. वे वैज्ञानिक शिक्षा पर विश्वास करते थे। इन्होने कई यूनिवर्सिटी एवं इंस्टिट्यूट का निर्माण कराया, जहाँ उच्च दर की शिक्षा मौजूद कराई। मौलाना आजाद के तत्वावधान में ही देश का पहला IIT, IISC एवं विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का निर्माण हुआ था।

10. वे भारत के पहले शिक्षा मंत्री थे। उन्होंने ग्यारह वर्षों तक राष्ट्र की शिक्षा नीति का मार्गदर्शन किया। मौलाना आज़ाद को ही 'भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान' अर्थात 'आई.आई.टी.' और 'विश्वविद्यालय अनुदान आयोग' की स्थापना का श्रेय है। उन्होंने शिक्षा और संस्कृति को विकसित करने के लिए उत्कृष्ट संस्थानों की स्थापना की।