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​​​​​…अब अपनों ने मुलायम पर चलाया नत्थू सिंह का सिखाया दांव

1967 से अब तक तमाम विरोधियों को चौंकाते व पछाड़ते रहे हैं मुलायम.

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Sanjeev Mishra

Jan 01, 2017

डॉ.संजीव.
लखनऊ. बात 1962 की है। मैनपुरी में तीन दिवसीय दंगल चल रहा था। नौजवान पहलवान मुलायम सिंह वहां लोगों को पछाड़ रहा था। इटावा की जसवंत नगर विधानसभा सीट से प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार नत्थू सिंह ने उसकी प्रतिभा देखी और फिर डॉ.राम मनोहर लोहिया से मिलवा दिया। नत्थू सिंह ने लोहिया से कहा, मैं आपको एक मेधावी नौजवान दे रहा हूं। ...और यह क्या, अगला चुनाव आया और सब बदल गया। इस बीच प्रजा सोशलिस्ट पार्टी का सोशलिस्ट पार्टी में विलय हो गया और मिल कर बनी संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी। 1967 के विधानसभा चुनाव में जसवंतनगर सीट से उसी संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के प्रत्याशी नत्थू सिंह नहीं, मुलायम सिंह यादव थे। कहा जाता है कि मुलायम सिंह ने अपने पहले राजनीतिक गुरु को पछाड़ कर पहला टिकट पाया था। नत्थू ने मुलायम को जो दांव सिखाए थे, पहले ही चुनाव में मुलायम ने नत्थू पर ही उन्हें आजमा लिया। आज पचास साल बाद मुलायम के अपनों ने ही उन पर नत्थू सिंह का सिखाया दांव चला कर उन्हें पछाड़ दिया है।

दरअसल मुलायम की पूरी राजनीति ही चौंकाने वाले फैसले लेकर आसपास के लोगों को पछाड़ने की रही है। यही कारण है कि राजनीति में उन्हें विश्वसनीय नहीं माना जाता है। हाल ही में जब समाजवादी पार्टी व कांग्रेस के बीच गठबंधन की बात चली तो कांग्रेस की ओर से साफ कह दिया गया कि गठबंधन तभी होगा, जब अखिलेश मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित होंगे। मुलायम की अविश्वसनीयत के किस्से उनके पूरे राजनीतिक करियर में भरे पड़े हैं, किन्तु आज जब उनके ही बेटे ने उन्हें पछाड़ कर पार्टी पर कब्जा किया तो एक बार फिर पुरानी घटनाओं की याद ताजा हो गयी। दरअसल, जिस तरह मुलायम राष्ट्रीय राजनीति में राम गोपाल यादव को आगे कर अन्य राजनीतिक दलों के साथ खेल करते रहे हैं, इस बार उनके साथ हुए खेल में भी रामगोपाल ही कुंजी बने। मुलायम ने तमाम राजनीतिक दलों को तोड़ने व कब्जे के लिए कागजी लिखापढ़ी को आधार बनाया, इस बार समाजवादी पार्टी की लिखापढ़ी में अखिलेश-रामगोपाल ने उन्हीं पैंतरों का इस्तेमाल कर उन्हें शिकस्त दी। मुलायम ने पिछड़ों की एकता के नाम पर तमाम बार गठबंधन से लेकर प्रधानमंत्री बनने तक के सपने देखे, आज प्रदेश अध्यक्ष पद पर एक कुर्मी (नरेश उत्तम) की नियुक्ति कर उनके बेटे ने एक बृहद पिछड़ा दांव खेल दिया है।

कठिन था मुलायम को हराना
राजनीतिक जीवन की शुरुआत के समय मुलायम की उम्र 28 साल थी। तब उन्हें देखकर डॉ.लोहिया ने कहा था कि राजनीति की सही उम्र यही है। मुलायम ने भी लोहिया की बात को सही साबित किया और वे चुनाव जीतकर प्रदेश के सबसे युवा विधायक बने। मुलायम सिंह आज भले ही बेटे से हारते नजर आ रहे हों, किन्तु उऩकी पहलवानी के दौर में उन्हें हराना कठिन था। बारहवीं में पढ़ते समय वे कुश्ती चैंपियन हुआ करते हैं। वे जब अखाड़े में उतरते थे, तो बस जीत कर ही बाहर आते थे। इटावा के एक इंटर कालेज में शिक्षक बनने के बाद मुलायम ने कुश्ती के अखाड़े में उतरना बंद कर दिया था, किन्तु राजनीति के अखाड़े में उन्हें बार-बार दांव चले और विरोधियों को चित कर हर बार जीत भी हासिल की।

किसी को नहीं बख्शा
मुलायम ने अपने राजनीतिक करियर में किसी को भी नहीं बख्शा। 1988 में हेमवती नंदन बहुगुणा का साथ छोड़कर पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह का हाथ पकड़ लिया था। एक साल बाद अजित सिंह से हाथ मिलाया और पहली बार उत्तर प्रदेशष के मुख्यमंत्री बनने में सफल हो गए। 1992 में चंद्रशेखर को छोड़कर अपनी पार्टी बनाई और 1993 में बसपा से गठबंधन कर दूसरी बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने में सफल हुए। दरअसल कांशीराम के साथ हुआ उनका समझौता तो प्रदेश के राजनीतिक समीकरण बदलने की धुरी साबित हुआ और आज तक सूबे की राजनीति सपा-बसपा के आसपास ही घूम रही है। समाजवादी पार्टी के भीतर इस समय चल रहे संघर्ष पर भी सबसे तगड़ी नजर बसपा की ही है। बसपा नेता मानते हैं कि झगड़ा बना रहा तो सर्वाधिक लाभ उन्हें ही होगा।

तोड़ डाले पुराने रिश्ते
मुख्यमंत्री बनने के लिए मुलायम सिंह ने पुराने रिश्ते तोड़ने में कभी समय नहीं लगाया। 2003 में वे तीसरी बार मुख्यमंत्री बने और इस बार उन्हें साथ मिला कांग्रेस का। इस बीच कभी एक दूसरे के कट्टर दुश्मन जैसे माने जाने वाले कल्याण सिंह व मुलायम सिंह की भी दोस्ती हुई और सरकार तक में हिस्सेदारी हो गयी। 2010 में मुलायम ने अमर सिंह से 14 साल पुरानी दोस्ती तोड़ डाली, जो कभी उनके सबसे ज्यादा करीबी थे। इसी तरह अपने सियासी सफर में वे बेनीप्रसाद वर्मा व राजबब्बर को भी त्याग चुके हैं। बेनी व अमर की तो पार्टी में वापसी भी हो चुकी है, राज बब्बर कांग्रेस के रास्ते प्रदेश की राजनीति का बड़ा चेहरा बन चुके हैं। इसीलिए आज जब उनके अपनों ने रिश्ते तोड़े तो लोग चौंक नहीं रहे हैं।

राष्ट्रीय स्तर पर भी दांव
मुलायम ने अपने सियासी दांव राष्ट्रीय स्तर पर भी खूब चले। कभी वामपंथी उनसे सबसे निकट होते थे, आज उत्तर प्रदेश में वामपंथियों का नामोनिशान तक नहीं है। राष्ट्रीय स्तर पर हरकिशन सिंह सुरजीत से लेकर एपीजे अब्दुल कलाम तक को मुलायम ने अपनी राजनीति का मोहरा बनाया और सफल भी हुए। ममता बनर्जी व जयललिता के साथ गठजोड़ की तमाम घोषणाएं होने के बाद ऐन मौके पर पीछे हटने के लिए भी मुलायम याद किये जाते हैं। बिहार चुनाव से ठीक पहले जनता परिवार की एकता को लेकर चल रही तमाम कोशिशें विफल होने के लिए भी मुलायम ही जिम्मेदार माने जाते हैं। यही कारण है कि मुलायम से धोखा खायी ममता ने अखिलेश को साथ देने का भरोसा दिलाया है और इसके लिए खुद फोन भी किया है। अखिलेश अब राष्ट्रीय चेहरा होंगे, पर दांव तो मुलायम वाले ही होंगे।