दरअसल मुलायम की पूरी राजनीति ही चौंकाने वाले फैसले लेकर आसपास के लोगों को पछाड़ने की रही है। यही कारण है कि राजनीति में उन्हें विश्वसनीय नहीं माना जाता है। हाल ही में जब समाजवादी पार्टी व कांग्रेस के बीच गठबंधन की बात चली तो कांग्रेस की ओर से साफ कह दिया गया कि गठबंधन तभी होगा, जब अखिलेश मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित होंगे। मुलायम की अविश्वसनीयत के किस्से उनके पूरे राजनीतिक करियर में भरे पड़े हैं, किन्तु आज जब उनके ही बेटे ने उन्हें पछाड़ कर पार्टी पर कब्जा किया तो एक बार फिर पुरानी घटनाओं की याद ताजा हो गयी। दरअसल, जिस तरह मुलायम राष्ट्रीय राजनीति में राम गोपाल यादव को आगे कर अन्य राजनीतिक दलों के साथ खेल करते रहे हैं, इस बार उनके साथ हुए खेल में भी रामगोपाल ही कुंजी बने। मुलायम ने तमाम राजनीतिक दलों को तोड़ने व कब्जे के लिए कागजी लिखापढ़ी को आधार बनाया, इस बार समाजवादी पार्टी की लिखापढ़ी में अखिलेश-रामगोपाल ने उन्हीं पैंतरों का इस्तेमाल कर उन्हें शिकस्त दी। मुलायम ने पिछड़ों की एकता के नाम पर तमाम बार गठबंधन से लेकर प्रधानमंत्री बनने तक के सपने देखे, आज प्रदेश अध्यक्ष पद पर एक कुर्मी (नरेश उत्तम) की नियुक्ति कर उनके बेटे ने एक बृहद पिछड़ा दांव खेल दिया है।