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नैमिषारण्य में गिरा था सुदर्शन चक्र, यहां आज भी पाताल लोक से आता है पानी

- सीतापुर मुख्यालय से लगभग 40 किलोमीटर दूरी पर गोमती नदी के किनारे स्थित है नैमिषारण्य - नैमिषारण्य में स्थित 108 पीठ में से मां ललिता देवी शक्तिपीठ का विशेष महत्व - नवरात्रि के मौके पर यहां लगता है श्रद्धालुओं का तांता

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लखनऊ

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Nitin Srivastva

Aug 26, 2019

 नैमिषारण्य में गिरा था सुदर्शन चक्र, आज भी पाताल लोक से आता है पानी

नैमिषारण्य में गिरा था सुदर्शन चक्र, आज भी पाताल लोक से आता है पानी

सीतापुर. अट्ठासी हजार ऋषियों की तपोभूमि सीतापुर के नैमिषारण्य (Namisharanya Sitapur) में स्थित 108 पीठ में से मां ललिता देवी के शक्तिपीठ की महत्ता भारत के कोने-कोने से आए हुए श्रद्धालुओं की जुड़ी आस्था को देखकर लगाया जा सकता है। नवरात्र (Navratri) के मौके पर यहां श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। लगभग 200 वर्ष पुराने मां ललिता देवी के मंदिर में हजारों की संख्या में भक्त नित्य प्रतिदिन भगवान ब्रह्मा के द्वारा फेके गए चक्र में स्नान कर मां ललिता देवी (Lalita Devi) के दर्शन कर सुख का अनुभव प्राप्त करते हैं। मां ललिता देवी में आये सभी भक्तों का यह मानना है कि नैमिष (Naimish) स्थित चक्र में स्नान करने के बाद मां ललिता के दर्शन करने से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।

ललिता शक्ति ने धरती को प्रलय से बचाया

जनपद सीतापुर मुख्यालय से लगभग 40 किलोमीटर दूरी पर नैमिषारण्य (Namisharanya) गोमती नदी के किनारे स्थित यह धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक केंद्र अपनी पुरातन प्रतिष्ठा को आज भी अक्षुण बनाये हुए हैं। ललिता देवी पीठ में महंतो के अनुसार मान्यता है कि जब सतयुग में देवता निर्विघ्न तपस्या के लिए उचित स्थान पूछने गए तो उन्होंने ब्रह्म मनोमय चक्र की उत्पत्ति कर देवताओ से कहा कि यह चक्र जिस स्थान पर गिरेगा, वही स्थान तपस्या के लिये सर्वोत्तम स्थान होगा। बताते हैं कि यह चक्र नैमिषारण्य में गिरा और धरती का भेदन करने लगा। जब यह चक्र साढ़े छह पाताल भीतर पहुंच गया तो देवताओं को यह चिंता हुई कि चक्र के सात पाताल घुसने पर प्रलय आ जाएगी। जिस पर उन्होंने भगवान शिव की शरण ली और उनके आर्शीवाद से ललिता शक्ति का अवतरण हुआ और उसने चक्र की नेमि को रोककर धरती को प्रलय से बचाया। उस शक्ति की स्थापना ललिता देवी के नाम से हुई। यहां चक्र में आज भी पाताल लोक से पानी आता है।

सारे तीर्थों में एक है नैमिषारण्य की भूमि

सभी तीर्थों में एक नैमिषारण्य (Naimisharanya) ही ऐसा तीर्थ हैं कि जहां आकर आपने स्नान नहीं किया तो आपके सारे धामों की पूजा व्यर्थ चली जाती है। ऐसी दूसरी मान्यता है कि मां भगवती सती ने अपने पिता दक्ष प्रजापति के यज्ञ में अपने पति भगवान शंकर के अपमान के कारण अपने को यज्ञ कुंड में भस्म कर दिया था। तब भगवान शंकर ने यज्ञ विध्वंस कराया। सती के पार्थिव शरीर को कंधे पर लटकाकर उनके वियोग में इधर उधर भटकने लगे। जिससे संहार सृष्टि रुक गयी। तब भगवान विष्णु ने क्रोधित होकर सुदर्शन चक्र से मां सती के 108 टुकड़े कर दिए और जहा-जहां उनके शरीर का खंड गिरा वह सिद्ध पीठ हो गया। नैमिषारण्य में सती का (ह्रदय ) भाग गिरा जिसके कारण यह स्थान ललिता देवी सिद्ध पीठ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। जो भक्त सच्चे मन से चक्र में स्नान के पश्चात मां के दर्शन करता है, वह संपूर्ण जीवन सुख से व्यतीत करता है।

नैमिषारण्य में अन्य देव स्थल भी मौजूद

88 हजार ऋषियों की तपोभूमि स्थली नैमिषारण्य (Naimisharanya) में शक्ति पीठ मां ललिता देवी के अलावा, हनुमान गढ़ी, देव देवेश्वर, वेद व्यास स्थली, रुद्रावर्त, मां कालिका देवी मंदिर आदि देव स्थल मौजूद हैं। ऐसी मान्यता है कि अगर आप चार धाम की यात्रा पर गए हैं और वापस आकर नैमिषारण्य के पवित्र चक्र तीर्थ में स्नान नहीं किया तो आपकी यात्रा पूर्ण नहीं मानी जाती है। क्योंकि मान्यता है कि जब देवताओं को तपस्या के लिए धरती पर स्थित नैमिषारण्य में ही तप करने के लिए बताया गया था। इसलिए इस धरती पर सभी तीर्थों में एक योग्य तीर्थ नैमिषारण्य ही माना जाता है।


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