
माया नहीं अब दीदी हैं अब भाजपा की दुश्मन नंबर वन, जानें- क्यों एकाएक बदल गई बीजेपी की रणनीति
लखनऊ. उप्र में अंतिम राउंड का चुनाव अभी बाकी है। लेकिन, प्रदेश भाजपा मुख्यालय में सन्नाटा पसरा है। कुछ जाने-पहचाने चेहरों के अलावा कार्यकर्ताओं की भीड़ नदारद है। तपता सूरज और 44 डिग्री का तापमान बड़ी वजह हो सकती है। फिर भी वास्तविक कारण बताने के लिए कोई मुंह खोलने को तैयार नहीं। हालांकि, भाजपा के सूत्र बताते हैं कि यूपी में चार चरण का चुनाव निपटने के बाद ही यहां के अनुभवी नेताओं और संसाधन को पश्चिम बंगाल भेज दिया गया। ऐसा इसलिए क्योंकि भाजपा का अपना आकलन है कि उत्तर प्रदेश में 2014 जैसे नतीजे नहीं आने वाले। ऐसे में यूपी की कमी बंगाल से पूरी करने की रणनीति पर भाजपा जुट गयी है।
गुजरात से मॉनिटरिंग
...तो क्या इस बार यह मिथक टूटने वाला है कि देश के पीएम की कुर्सी का रास्ता यूपी से होकर जाता है। भाजपा की तैयारी तो कम से कम इसी ओर इशारा कर रही है कि पश्चिम बंगाल की 42 सीटें देश का अगला प्रधानमंत्री तय करने वाली हैं? भाजपा कार्यालय में घंटों गुजारने के बाद कुछ इसी तरह की बातें और आंकलन सुनने को मिला। भाजपा का मानना है कि उत्तर प्रदेश की सियासत बड़ी तेज़ी से बदली है। गठबंधन ेने पार्टी की उम्मीदों पर पानी फेरने का काम किया है। पार्टी अध्यक्ष अमित शाह भले ही यूपी से 73 प्लस सीटों का दावा कर रहे हों लेकिन भाजपा का थिंक टैंक और चुनावी टीम यह मानने को तैयार नहीं है। इसीलिए यूपी नहीं अब बंगाल जीतना भाजपा के एजेंडे में नंबर वन पर है। भाजपा सूत्रों के मुताबिक उत्तर प्रदेश के चुनाव प्रबंधन एक्सपर्ट को यूपी से बंगाल भेज दिया गया है। वह गली-गली और बूथ-बूथ पर जीत की रणनीति बना रहे हैं। बंगाल के चुनाव की मॉनिटरिंग गांधीनगर में बने तीन कंट्रोल रूम से की जा रही है।
22 सीटें जीतने का लक्ष्य
चुनावी रणनीतिकारों का मानना है यूपी में भाजपा को कम से कम 30 से 32 सीटों का नुकसान हो सकता है। इसलिए बंगाल की 42 में से कम से कम 22 सीटें हरहाल में जीतने की रणनीति पर पार्टी काम कर रही है।
एकाएक बदल गयी रणनीति
तीसरे चरण के चुनाव तक बसपा प्रमुख मायावती भाजपा के निशाने पर थीं। पार्टी अध्यक्ष अमित शाह से लेकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक के हर भाषण में बसपा प्रमुख का जिक्र जरूर होता था। लेकिन एकाएक इस रणनीति में परिवर्तन हो गया। अब भाजपा के निशाने पर ममता बनर्जी हैं। दरअसल, ममता बनर्जी भी प्रधानमंत्री बनने की दौड़ में हैं। इसलिए वह तृणमूल को 42 में से कम से कम 38 सीटों पर जिताना चाहती हैं। भाजपा इस लक्ष्य तक दीदी को पहुंचने नहीं देना चाहती। असली लड़ाई यही है। इसीलिए इस बार बंगाल कुर्सी की प्रयोगशाला बन गया है। भाजपा यहां चुनाव धर्म के आधार पर लड़ रही है। इसके पहले बंगाल का चुनाव कैडर के दम पर ज्यादा लड़ा जाता था। भाजपा ने तो अब वामपंथी कैडर को भी रामपंथी बना दिया है। इसीलिए तपती गर्मी में राम,लक्ष्मण की झांकी निकाली गयी। हिंदू वोटों का तेज़ी से ध्रुवीकरण किया गया। कमोबेश कुछ इसी तरह की रणनीति उप्र में भी 2014 के चुनावों में अपनायी गयी थी।
यह है भाजपा का गणित
भाजपा का आंकलन है कि मायावती की पार्टी उप्र में 20 से भी कम सीटें पाएगी। ऐसे में वह प्रधानमंत्री पद की दौड़ से बाहर होंगी। नीतीश कुमार मोदी के साथ ही हैं। भाजपा को डर है तो ममता बनर्जी से। इसलिए प्रधानमंत्री की कुर्सी के लिए सबसे ताकतवर उम्मीदवार को सबसे कमजोर बनाने की भाजपा ने कारगर रणनीति बनायी है।
Published on:
16 May 2019 04:43 pm
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