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हमरै जिंदगी का एकै मकसद है बदला… लखनऊ का बाप कौन ? रमेश कालिया…… रमेश कालिया

मै रंगदारी मांग रहा हूं भीख नहीं... इतने देर में उस मकान को तीन तरफ से बारातियों ने घेर लिया। अचानक बारातियों ने हथियारों के साथ धावा बोल दिया और आसपास गाडिय़ों की आड़ में पोजिशन ले लिया। कौन था रमेश कालिया? आतंक का पर्याय कहे जाने वाले डॉन श्रीप्रकाश शुक्ला को क्यों दिया था 5 लाख रुपया और एके 47 हथियार। आइए जानते हैं तीन दर्जन हत्याओं को अंजाम देने वाले दुर्दांत अपराधी रमेश कालिया उर्फ रमेश यादव के एनकाउंटर की इनसाईड स्टोरी मार्कण्डेय पांडे से......।

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उसने अपने बाबा की हत्या का बदला लेने के लिए हथियार उठा लिया था और अपने ही गांव में यादवों की हत्या कर धीरे-धीरे पेशवर अपराधी बन चुका था।

Lucknow News: मनोज बाजपेई की गैंग ऑफ वासेपुर फिल्म का यह डॉयलाग यूपी के दुर्दांत अपराधी रमेश कालिया के अपराध जीवन से ही लिया गया है। करीब तीन दर्जन हत्याओं को ताबड़तोड़ अंजाम देने वाले कालिया ने एक ही परिवार के पांच लोगों की हत्या कर उत्तरप्रदेश में पुलिसिया इकबाल से लेकर तत्कालीन मुलायम सिंह सरकार को सीधी चुनौती दे डाली थी।

जिसके बाद पश्चिम यूपी के मुज्जफरनगर के माफियाओं का खात्मा कर अखबारों की सुर्खियों में आए आईपीएस नवनीत सिकेरा को फौरन राजधानी लखनऊ तलब किया गया और रमेश कालिया टास्क पकड़ा दिया गया था। एक वारदात के बाद पुलिस का पसीना भी नहीं सूख पाता तब तक कालिया दूसरे, तीसरे घटनाओं को अंजाम दे देता। प्रत्येक घटना के बाद वह मुंबई के डॉन भीखू महात्रे की नकल कर अपने गुर्गो से पूछता- लखनऊ का बाप कौन ?? रमेश कालिया.... रमेश कालिया......

मेरी सरकार को बदनाम कर रहा है....मुलायम सिंह यादव
साल 2005, उत्तरप्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार थी और मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव थे। रात करीब दस बजे उन्नाव से खबर आई कि समाजवादी पार्टी के एमएलसी अजीत सिंह को गोलियों से भून दिया गया है। पूरी सरकार को झकझोर देने वाले इस कांड की सूचना पाकर मुख्यमंत्री मुलायम सिंह बेचैन हो उठे और आनन-फानन में वरिष्ठ अधिकारियों की मीटिंग बुलाई गई।

पुलिस के एक वरिष्ठ सेवानिवृत अधिकारी बताते हैं कि मीटिंग में मुलायम सिंह ने पहला वाक्य यही बोला कि ‘‘अब वह मेरी सरकार को बदनाम कर रहा है, लगातार यादवों की हत्या के बाद एक एमएलसी को मार डाला......’’ हांलाकि रमेश कालिया भी यादव था, उसने अपने बाबा की हत्या का बदला लेने के लिए हथियार उठा लिया था और अपने ही गांव में यादवों की हत्या कर धीरे-धीरे पेशवर अपराधी बन चुका था। रमेश यादव को रमेश कालिया नाम पुलिस ने दिया था, क्यों कि उसका रंग काला था।

IMAGE CREDIT: अब वह मेरी सरकार को बदनाम कर रहा है

देर रात मुख्यमंत्री के आदेश पर एसएसपी बदले गए
रमेश कालिया को जिंदा या मुर्दा पकडऩा जरुरी था। उसको मौत की नींद जब तक नहीं सुलाया जाता तबतक सरकार के मंत्रियों और अफसरों को नींद उड़ी हुई थी। हाईलेवल मीटिंग में फैसला हुआ कि मुज्जफरनगर में माफियाओं और डकैतों का सफाया करने वाले आईपीएस नवनीत सिकेरा को तत्काल लखनऊ का चार्ज दिया जाए।

इधर आदेश जारी हुआ, उधर सिकेरा ने लखनऊ का रुख कर लिया। लेकिन इस बार टास्क बेहद खतरनाक था, उत्तरप्रदेश में जरायम की दुनिया में रमेश कालिया ने एके 47 को प्रचलन शुरु कर दिया था और अपने माफिया डॉन गुरु श्रीप्रकाश शुक्ला से तकनीक सीखकर काफी शातिर हो चुका था। कहीं भी स्थाई नहीं रहता, और ना ही एक फोन का इस्तेमाल करता।

आतंक के पर्याय श्रीप्रकाश को दी थी एके 47
रमेश कालिया के पिता के फूफा अयोध्या प्रसाद यादव उसको पढ़ाई कराने के लिए चिनहट के पास बाघामउ लाए थे लेकिन कुछ ही दिनों में अयोध्या प्रसाद यादव की हत्या रघुनाथ यादव ने कर दी। यह इलाका यादव बाहुल्य था और वर्चस्व की लड़ाई में अयोध्या प्रसाद की हत्या हो गई।

बाबा की हत्या का बदला लेने के लिए ही रमेश यादव ने रघुनाथ पर हमला किया लेकिन वह बच गया। इसके बाद पहला मामला रमेश यादव उर्फ कालिया और उसके पिता शिवराज यादव पर दर्ज हुआ जिसके बाद लगातार पचास से अधिक मामले रमेश कालिया के खाते में दर्ज होते गए। हांलाकि रघुनाथ पर हमले के बाद रमेश कालिया जेल चला गया और वहां उसकी मुलाकात सूरजपाल से हुई।

सूरजपाल भी रघुनाथ के जुल्म का शिकार रहा था। दुश्मन का दुश्मन दोस्त बन गया और दोनों ने श्रीप्रकाश शुक्ला से संपर्क साधना शुरु किया। आतंक के पर्याय रहे श्रीप्रकाश शुक्ला को रघुनाथ यादव के भाई शंभू यादव की सुपारी दे दी गई, बदलें पांच लाख रुपया और एके 47 मुहैया कराया गया। इसके बाद श्रीप्रकाश ने पशुपालन विभाग के दफ्तर के सामने ही शंभू यादव को गोलियों से भून दिया।

करीब तीन दर्जन हत्याओं का ब्योरा
दिन के करीब दो बजे अचानक गोलियों की तड़तड़ाहट से हजरतगंज का जीयामउ इलाका गूंज उठा। धड़ाधड़ दुकानों के शटर बंद होने लगे और लोग बदहवास, जिसे जिधर भी रास्ता मिला भागने लगा। भगदड़ मच गई और चंद सेकेंडों में पूर्व मंत्री लक्ष्मी शंकर यादव का निढाल मृत शरीर गोलियों से छलनी हुआ लहूलूहान पड़ा था।

रमेश कालिया जेल से छूट चुका था, इसका संदेश लोगों तक पहुंच गया। कुछ ही दिन बाद अपने साथी के मामा के हत्यारों का बदला लेने के लिए कालिया ने बद्री प्रसाद यादव पर फायरिंग झोंक दिया लेकिन वह बच गया। इसके बाद हत्या में बाईक उपलब्ध कराने वाले मोटर को गोलियों से छलनी कर दिया।

हत्या दर हत्या के बाद रमेश कालिया को रायबरेली के एक बड़े नेता का राजनैतिक संरक्षण भी मिलने लगा। जिसके बाद उसने सडक़ से लेकर रेलवे तक के ठेकों और रियल एस्टेट में दखल बढ़ाना शुरु कर दिया। इसी दौरान उसने सफेदाबाद क्रॉसिंग के पास रघुनाथ यादव पर दोबारा हमला किया और मौके पर ही तीन लोगों को गोलियों से भून डाला।

पांच लाख रुपया बना मौत का कारण
रातोंरात लखनऊ का चार्ज लेने के बाद आईपीएस नवनीत सिकेरा के सामने सबसे बड़ा टास्क था रमेश कालिया जिसकी लोकेशन पता करना पुलिस के लिए असंभव हो चुका था। कारण कि वह किसी एक जगह पर स्थाई नहीं ठहरता ना ही वह एक मोबाईल फोन इस्तेमाल करता। ऐसी हालत में क्या किया जाए? कालिया के टॉप टेन मददगारों की लिस्ट तैयार की जा रही थी, इसी दौरान लखनऊ के एक बिल्डर के पास पांच लाख रुपए की रंगदारी के लिए कालिया ने फोन किया। पुलिस के एक वरिष्ठ सेवा निवृत अधिकारी बताते हैं ‘बिल्डर डरा सहमा पुलिस के पास पहुंच गया।

एसएसपी सिकेरा ने व्यापारी से कहा कि आप हमारा सहयोग करीए, हम आपका सहयोग करेंगे। व्यापारी ने बताया कि पैसा लेकर किस जगह पर आने को कहा गया है। लेकिन लखनऊ कैंट इलाके में जिस जगह बुलाया गया, वहां सन्नाटा था। आसपास कोई मकान नहीं था और जिस मकान में बुलाया गया उसके आसपास की गतिविधि को उस मकान से आसानी से देखा जा सकता था। पुलिस के लिए वहां पहुंचना बेहद मुश्किल काम था। वहां से दूर-दूर देखा जा सकता था और पुलिस के छुपने के लिए कोई जगह नहीं थी, ना ही कोई ढाल था।’

मै रंगदारी मांग रहा हूं भीख नहीं
कालिया का पता चल चुका था, उसे जिंदा या मुर्दा कैसे भी पकडऩा अब पुलिस के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया था। पुलिस महकमे में मंथन होने लगा कैसे क्या किया जाए, तभी एक सब इंस्पेक्टर ने सुझाव दिया कि पुलिस कर्मी अगर बाराती बनकर चलते हैं तो किसी को शक नहीं होगा। लगभग प्लान तैयार हो गया और 12 फरवरी 2005 को बिल्डर एक झोले में 60 हजार रुपया लेकर बताए गए मकान पर पहुंचा।

इधर पुलिस कर्मी बाराती बने दरोगा प्रताप सिंह दुल्हा बनकर बैठै तो कांस्टेबल सुमन वर्मा दुल्हन बनी। गाजे-बाजे बैंड के साथ बारात चल पड़ी। किसी ने मोजे में पिस्टल छिपाया तो किसी ने शेरवानी में हथियार छिपाया, तो कोई टोपी और पगड़ी में असलहे छिपाया और नाचते-गाते चल पड़े। तय समय पर व्यापारी 60 हजार रुपया लेकर पहुंचा लेकिन पांच लाख की जगह 60 हजार रुपया देखकर रमेश कालिया भडक़ गया। बोला ‘मै रंगदारी मांग रहा हूं भीख नहीं।’ इतने देर में उस मकान को तीन तरफ से बारातियों ने घेर लिया था।

अचानक बारातियों ने हथियारों के साथ धावा बोल दिया और उस मकान में घुसने के साथ ही आसपास गाडिय़ों की आड़ में पोजिशन ले लिया। दोनों तरफ से चले करीब 25 मिनट तक की फायरिंग के बाद मकान से गोलियां आनी बंद हो गई और आतंक का अंत हुआ रमेश कालिया मारा गया। इस दौरान व्यापारी को सकुलश जिंदा वापस लाने में पुलिस कामयाब रही।