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शौर्यगाथा – अकेले ही पाक सेना के दांत खट्टे कर दिए थे परमवीर सिपाही जदुनाथ सिंह ने

इस वीर सिपाही ने 1947 के भारत-पाक युद्ध के दौरान कश्मीर के नौशेरा सेक्टर में मुठ्ठीभर टुकड़ी का कुशल नेतृत्व करते हुए नौशेरा चौकी पर तिरंगा झंडा लहराया था।

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लखनऊ

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Abhishek Gupta

Feb 27, 2019

Jadunath

Jadunath

लखनऊ. जैश का जोश जमींदोज करने के बाद भारतीय वायुसेना के जाबांजों की चर्चा हर जुबान पर है। आह्लाद और गौरव के इस पुलक भरे लम्हे में हर देशवासी खुद को विजेता महसूस कर रहा है। ऑपरेशन बालाकोट की विजयगाथा हमेशा याद की जाएगी। ऐसे वक्त में याद आ रहे हैं परमवीर चक्र विजेता जदुनाथ सिंह। इस वीर सिपाही ने 1947 के भारत-पाक युद्ध के दौरान कश्मीर के नौशेरा सेक्टर में मुठ्ठीभर टुकड़ी का कुशल नेतृत्व करते हुए नौशेरा चौकी पर तिरंगा झंडा लहराया था।

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यूपी के शाहजहांपुर में 21 नवंबर 1916 में जन्में राठौर राजपूत जदुनाथ के अदम्य साहस के सामने पाकिस्तानी सेना को तब कई बार पीछे हटना पड़ा था। राजपूत रेजीमेंट के सिपाही जदुनाथ 6 फरवरी 1947 को जब दुश्मनों की 250 से ज्यादा टुकड़ी का अकेले सामना कर रहे थे, तब एक गोली उनके सीने को चीरते हुए निकल गयी थी और वे देश की रक्षा करते हुए शहीद हो गए थे।

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याद किया गया शौर्य-
पाक में घुसकर आतंकी जैश के ठिकाने को ध्वस्त करने के मौके पर जश्न मनाते हुए जदुनाथ के शौर्य को भी याद किया गया। यहां के बुर्जुगों ने बताया कि जदुनाथ के पिता बीरबल सिंह राठौर एक गरीब किसान थे। इनकी माता का नाम जमुना कंवर था। जदुनाथ अपने 8 भाई-बहनों में तीसरे स्थान पर थे। कक्षा 4 के बाद इन्होंने पढ़ाई छोड़ दी थी। 1941 में ब्रिटिश भारतीय सेना में शामिल हो गए थे। यह 1942 में बर्मा अभियान के लिए अराकान प्रान्त में तैनात किए गए थे जहां उन्होंने जापानियों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी।

नौशेरा में दिखाया था पराक्रम-
1947 के भारत-पाक युद्ध के दौरान जदुनाथ की तैनाती नौशेरा क्षेत्र में टैनधार में हुई। यहां से उनको श्रीनगर एयरफील्ड को भी संभालना था। नायक जदुनाथ सिंह अपने 9 सैनिकों की एक टुकड़ी के साथ यहां मोर्चा संभाले हुए थे। पाकिस्तान लगातार हमले कर रहा था। नायक जदुनाथ अपनी छोटी सेना के साथ दुश्मनों से जमकर लोहा ले रहे थे। इस बीच उनके 4 सैनिक घायल हो गए। जब भी नायक जदुनाथ अपने बचे सैनिकों का लगातार प्रोत्साहित कर रहे थे। जख्मी होने के बावजूद जदुनाथ ने हिम्मत नहीं हारी और लड़ते रहे। एक समय ऐसा आया जब जदुनाथ अकेले ही दुश्मनों से लोहा लेते रहे। इस दौरान उन्होंने दुश्मनों को तीन बार पीछे हटने को मजबूर किया। लेकिन, अकेले वे कब तक लड़ते। एक गोली जदुनाथ के सीने पर लगी और वे रणभूमि पर गिर गए। बड़ी निडरता के साथ दुश्मनों से लड़ते हुए वे शहीद हो गए। जदुनाथ को बाद में भारतीय सेना के सर्वोच्च पुरस्कार परमवीर चक्र से भी नवाजा गया था।

हथौड़ाबुर्जुग गांव में जुटे ग्रामीण-
शाहजंहापुरवासियों ने बताया कि शहीद जदुनाथ की याद में प्रत्येक वर्ष 6 फरवरी को नौशेरा सेक्टर में एक विशाल मेला लगता है। वायुसेना के शौर्य पर चर्चा के लिए शाहजंहापुर के हथौड़ाबुर्जुग गांव में बुधवार को सैकड़ो ग्रामीण जुटे और जदुनाथ की आवक्ष प्रतिमा पर माल्यापर्ण कर भारतीय वायुसेना के सैनिकों के साहस और शौर्य को सराहा गया।