
लखनऊ. किसान अपनी परम्परागत खेती के साथ औषधीय खेती की ओर एक बार ध्यान अवश्य दें तो उन्हें मालामाल होने में देर नहीं लगेगी। कम समय में ही उन्हें भरपूर मुनाफा मिलेगा और उनके खेतों की उर्वरक शक्ति भी बढ़ेगी। जिले के एक प्रगतिशील किसान ने पिपरमेंट की खेती कर कुछ ऐसा ही मुकाम हासिल किया है। बगैर किसी सरकारी सहायता के तीन वर्ष पूर्व पिपरमेंट की खेती शुरू की और आज लाखों रुपए की यूनिट लगाकर स्वयं और दूसरों को औषधीय खेती की नसीहत दे रहे हैं।
उरई मुख्यालय जालौन से 30 किमी दूर कोंच नगर के बौहरा गांव के किसान सन्तोष कुमार ने 2009 में औषधीय खेती की ओर अपना ध्यान दिया। पहले 4 एकड़ और आज 25 बीघे में पिपरमेंट की खेती करते हैं। पिपरमेंट का दो फीट का पौधा इतना लाभ देता है कि 4 एकड़ में तीन महीने में लगभग 2 लाख 30 हजार रुपए की पैदावार देता है। किसान पिपरमेंट की कटाई के बाद उसमें हरी खाद और उसके बाद धान की भी रोपाई उसी खेत में कर सकते हैं। सन्तोष कुमार ने बताया कि पिपरमिंट की नर्सरी डालने के लिए धान की नर्सरी की तरह ही खेत तैयार किया जाता है, उसमें नर्सरी डाली जाती है और 20-25 दिन बाद उसकी रोपाई की जाती है। ठीक 90 से 120 दिन के अन्तराल में उसकी कटाई हो जाती है। कटाई के बाद फसल को प्लांट के माध्यम से उबाल कर उसका तेल निकाला जाता है।
किसान सन्तोष कुमार और ग्राम प्रधान जगदीश प्रसाद का कहना है कि इसके पहले वर्ष मात्र 4 एकड़ पिपरमेंट बोया गया। दूसरे साल ज्यादा खेती किया। कहा कि फिलहाल पिपरमिंट बनाने के लिए इस क्षेत्र में कोई ईकाई नहीं है लेकिन पौधों से निकाला गया तेल (कच्चा माल) कोंच, जालौन में बिक जाता है। बताया कि इसके तेल को एक से 3, 4, 5, वर्ष रोककर भी अच्छे दामों में बेचा जा सकता है तो 1200 से 1800 रुपए प्रति किलोग्राम तक बिक जाता है। इस तेल को कंपनियां सीधे किसानों से लेने लगें तो और अच्छा मुनाफा मिलेगा। बताया कि औषधीय खेती के लिए क्षेत्र के अन्य किसानों को भी जागरूक किया जा रहा है लेकिन लोगों का अभी भी परंपरागत खेती से मोह भंग नहीं हो रहा है। उधर सन्तोष कुमार का कहना है कि सन्तोष कुमार का स्वयं का पिपरमेंट बनाने का प्लांट भी लगा हुआ है।
कैंसे करें रोपाई
खेतों की चार-पांच बार जुताई करा लें। उसमें गोबर की खाद डालना जरूरी है। अगर नहीं है तो यूरिया भी डाल सकते हैं। पिपरमेंट के एक दिन पहले पानी में भिगोकर रखें। खेत तैयार होने पर उसमें पानी लगाकर 10 से 15 सितम्बर के बीच बीज छिड़क कर डालें। 20-25 दिन में तैयार नर्सरी को खेत में पानी लगाकर उसमें डीएपी का छिड़काव करें और रोपाई कर दें। पौधे की दूरी आठ इंच की होनी चाहिए। तीन माह बाद यानि कि नवम्वर के अंतिम सप्ताह में फसल तैयार होगी। इसकी सिंचाई के लिए खेतों में पानी न लगे लेकिन नमी हमेशा बनी रहे। बीच में दो गुड़ाई भी जरूरी है।
कैसे निकलेगा पिपरमिंट का तेल
किसान सन्तोष कुमार ने अपने घर तेल निकालने का प्लांट लगाया है। प्लांट के टैंक में एक ट्राली मेंथा और 50 लीटर पानी को पकाया जाता है। इस दौरान टैंक से भाप के सहारे निकले तेल को एक बर्तन में इकट्ठा करते हैं। चार घंटे के अंदर एक ट्राली मेंथा से 25 से 30 लीटर तेल तैयार हो जाता है।
बाजार में ये हैं दाम
पिपरमेंट का तेल तैयार होने के बाद 1200 से 1800 रुपए प्रति किलोग्राम के हिसाब से तेल बिक जाता है। यदि एक साल तेल को रोक दिया जाए तो यही तेल अच्छे दानों में बिक जाता है। यह क्षेत्रीय बाजारों का हाल है। किसान अगर सीधे कंपनी को अपना उत्पाद दे तो और अधिक लाभ मिल सकता है।
बीज का दाम भी है कम
पिपरमेंट का अच्छी किस्म की जड़ बाजार में 900 से 1300 सौ रुपए कुंतल है। एक बीघे में 80 किलो जड़ का प्रयोग होता है। यानि की चार कुंतल जड़ में पांच बीघा खेत के लिए पिपरमेंट की जड़ डाली जाएगी।
एकदम नकदी खेती है पिपरमिंट
पिपरमेंट की पौधों से निकाले गए तेल को बाजार में चाहे जब बेचे उसका नकदी पैसा मिलता है। किसान सन्तोष कुमार का कहना है कि जालौन में उत्पादन देने के तुंरत बाद भुगतान हो जाता है। इसलिए यह डर नहीं रहता कि उन्हें भुगतान के लिए परेशान होना पड़ेगा।
विविध उपयोग
टेस्टी टाफी, पान, साबुन, ठंडा तेल, टूथ पेस्ट आदि से लेकर विभिन्न औषधीय निर्माण में इसका उपयोग किया जाता है।
संकलन - Neeraj Patel (Konch, Jalaun)
Updated on:
14 Nov 2017 09:53 am
Published on:
13 Nov 2017 01:54 pm
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