
सत्तारूढ़ दल भारतीय जनता पार्टी हो या फिर सपा, बसपा या कांग्रेस सभी अपने संगठन में जातीय समीकरणों को तरजीह दे रहे हैं
लखनऊ. उत्तर प्रदेश का आगामी विधानसभा चुनाव (UP Vidhan Sabha Chunav 2022) इस बार भी मुद्दों पर नहीं बल्कि जातिगत समीकरणों पर ही लड़ा जाएगा। केंद्र में पिछड़ा (OBC) और ब्राह्मण (Brahman) मतदाता हैं। इनकी गोलबंदी भी शुरू हो चुकी है। सत्तारूढ़ दल भारतीय जनता पार्टी (BJP) हो या फिर सपा (Samajwadi Party), बसपा (BSP) या कांग्रेस (Congress) सभी अपने संगठन में जातीय समीकरणों को तरजीह दे रहे हैं। साथ ही इन जातियों को लुभाने के लिए तरह-तरह घोषणाएं की जा रही हैं। भगवान परशुराम के सहारे सपा-बसपा ने ब्राह्मण कार्ड खेल दिया है, वहीं कांग्रेस भी यूपी में ब्राह्मण नेता को सीएम उम्मीदवार बनाकर मास्टर स्ट्रोक खेलने की तैयारी में है। इस बीच भारतीय जनता पार्टी ने राज्यसभा उपचुनाव के लिए जय प्रकाश निषाद को उम्मीदवार घोषित कर संकेत दिये कि पार्टी इस बार भी पिछड़ों पर दांव लगाएगी।
उत्तर प्रदेश की 22 करोड़ आबादी में करीब 11 फीसदी ब्राह्मण हैं, जबकि करीब 43 फीसदी ओबीसी मतदाता हैं। विस चुनाव में भले ही अभी करीब डेढ़ वर्ष का समय बचा है, सभी दलों जातीय समीकरण दुरुस्त करने शुरू कर दिये हैं। 25 जुलाई को फूलन देवी की पुण्यतिथि पर अखिलेश यादव ने पहली बार उन्हें न केवल श्रद्धांजलि अर्पित की, बल्कि उनके जीवन पर आधारित वृत्तचित्र का प्रोमो साझा कर अति पिछड़ा समुदाय को राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की। लखनऊ में भगवान परशुराम की 108 फीट ऊंची मूर्ति लगवाने की बात कहकर ब्राह्मणों को रिझाने की कोशिश की। बसपा प्रमुख मायावती ने भी खुद को ब्राह्मण हितैषी बताते हुए कहा कि सत्ता में आते ही हम समाजवादी पार्टी से भी बड़ी और भव्य परशुराम की मूर्ति लगवाएंगे। इसके अलावा सपा-बसपा और कांग्रेस पार्टी संगठन के पुनर्गठन में ब्राह्मण और पिछड़ों को तरजीह दे रही है।
ओबीसी हर दल की जरूरत क्यों?
आगामी विधानसभा चुनाव में अपने नफा-नुकसान को देखते हुए सभी दल सियासी गुणा-भाग में जुटे हैं। हर पार्टी की नजर उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े जाति समूह ओबीसी को लुभाने की है। प्रदेश में ओबीसी वोटरों की संख्या कुल आबादी की करीब 42-45 फीसदी है। इनमें यादव 10 फीसदी, लोधी 3-4 फीसदी, कुर्मी-मौर्य 4-5 फीसदी और अन्य का प्रतिशत 21 फीसदी है। दूसरी जातियों में दलित वोटर 21-22 फीसदी, सवर्ण वोटर 18-20 फीसदी और मुस्लिम वोटर 16-18 फीसदी हैं। ऐसे में ओबीसी यूपी में सबसे बड़ा जाति समूह है। यह अकेले किसी को जिताने-हराने में सक्षम हैं। इसलिये हर दल गुणा-भाग के जरिये इन्हें अपने खेमे में रखना चाहता है। खासकर बीजेपी और समाजवादी पार्टी की नजर ओबीसी पर है।
ब्राह्मण क्यों जरूरी?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संख्या भले ही कम हो ब्राह्मण किसी भी दल के पक्ष में राजनीतिक हवा बनाने में सक्षम हैं। इसीलिए हर राजनीतिक पार्टी अपनी रणनीति ब्राह्मण वोटरों को ध्यान में रखते हुए बना रही है। बीजेपी, कांग्रेस और बसपा पहले ही ब्राह्मणों के सहारे जीत का स्वाद चख चुकी है। एक बार फिर भी कवायद इन्हें अपने खेमे में लाने की है। आजादी के बाद से अब तक उत्तर प्रदेश में 6 ब्राह्मण मुख्यमंत्री बने हैं। हालांकि, 1990 के मंडल आंदोलन के बाद यूपी को कोई ब्राह्मण मुख्यमंत्री नहीं मिला। इसकी सबसे बड़ी वजह यूपी की सियासत पिछड़े, मुस्लिम और दलित पर केन्द्रित हो गई। इसके बाद मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने। 1991 में जब पहली बार बीजेपी की सरकार बनी, तब बीजेपी ने पिछड़ी जाति के कल्याण सिंह को मुख्यमंत्री बनाया। उसके बाद बीएसपी और सपा ने मिलकर सरकार बनाई। उस समय ब्राह्मणों का महत्व यूपी की राजनीति में थोड़ा कम हुआ। सियासत में यहे सिलसिला वर्ष 2007 तक मायावती के मुख्यमंत्री बनने तक जारी रहा।
Updated on:
12 Aug 2020 06:03 pm
Published on:
12 Aug 2020 05:55 pm
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