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यहाँ पते तक नहीं पहुंच सकी 50 हज़ार से ज्यादा चिट्ठियां, डाकियों की लापरवाही से बन गईं रद्दी का ढेर

पिछले आठ महीने से यहाँ तैनात डाकिये चिट्ठी बांटने निकले ही नहीं।

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लखनऊ. समय कितना भी हाईटेक हो गया हो लेकिन आज भी डाक विभाग की उपयोगिता खत्म नहीं हुई है। बैंकों के एटीएम से लेकर सरकारी विभागों की नौकरियों के कॉल लेटर, बिजली के बिल, पत्रिकाएं, बैंकों और बीमा कंपनियों के दस्तावेज डाक विभाग के ही जरिये ही लोगों तक पहुंचते हैं। एक ओर जहाँ बहुत सारे पोस्टमैन हर चिट्ठी को उसके पते तक पहुंचाने के लिए मेहनत करते दिख जाते हैं तो कई ऐसे भी डाकघर हैं जहाँ के डाकियों की उदासीनता के कारण पिछले आठ महीने से चिट्ठियां नहीं बंट पा रही हैं। प्रदेश की राजधानी लखनऊ में निलमथा स्थित उप डाकघर में तैनात डाकियों ने हज़ारों चिट्ठियों को रद्दी के ढेर में डाल दिया। स्थानीय लोगों का कहना है कि पिछले आठ महीने से यहाँ तैनात डाकिये चिट्ठी बांटने निकले ही नहीं। अनुमान है कि पचास हज़ार से ज्यादा चिट्ठियां रद्दी में तब्दील हो गयीं। यह आलम तब है जब डाक विभाग के अफसरों को मामले की कई बार शिकायत भी की गई।

खुद चिट्ठी लेने जाते हैं लोग

इस डाकघर में सिर्फ साधारण चिट्ठियां ही नहीं बल्कि रजिस्टर्ड डाक से भेजे गये पत्रों को बांटने में भी पोस्टमैन रूचि नहीं दिखाते। हज़ारों की संख्या में बैंकों के एटीएम और अन्य जरूरी कागजात डाकघर में ही पड़े रहते हैं और उन्हें वापस लौटा दिया जाता है। लोग हर रोज अपनी जरूरी दस्तावेजों की तलाश में डाकघर में लाइन लगाए दिख जाते हैं। साधारण पत्रों का इस डाकघर में कहीं कोई हिसाब किताब तक नहीं है। बोरे में भरकर एक कोने में उन्हें रद्दी की तरह डाल दिया जाता है। हज़ारों जरूरी चिट्ठियां और सन्देश इस डाकघर में कर्मचारियों की उदासीनता के कारण रद्दी में बदल चुके हैं। बहुत सारे युवाओं को उनके कॉल लेटर नहीं मिले और वे जरूरी परीक्षा से वंचित रह गए। यहाँ चिट्ठियां छांटने के लिए हर रोज लोगों की लम्बी लाइन लगती है और अक्सर कर्मचारियों से तू-तू मैं-मैं भी होती है। बावजूद इसके व्यवस्था में कोई सुधार होता नजर नहीं आता।

उच्च अफसरों से शिकायत

स्थानीय लोगों का अनुमान है कि पिछले एक वर्ष में पचास हज़ार से अधिक जरूरी चिट्ठियां लोगों के घरों तक नहीं पहुंचाई गई और वे कूड़े के ढेर में तब्दील हो गई।बहुत सारे लोगों की जरूरी चिट्ठियां या तो वापस हो जा रही हैं या रद्दी में बदल जा रही है। डाकघर में हर रोज चिट्ठियों की तलाश में लोग सब्जी मंडी की तरह चिट्ठियां छांटते दिख जाते हैं। स्थानीय निवासी मनोज कुमार के मुताबिक डाक विभाग के उच्च अफसरों से लोगों ने कई बार शिकायत की, इसके बावजूद कार्यशैली में बदलाव नहीं आया। लोगों को अपने जरूरी काम छोड़कर अपनी चिट्ठी के लिए डाकघर के चक्कर काटने पड़ते हैं। डाकघर न पहुंचने पर चिट्ठी गायब हो जाती है। डाक विभाग के निदेशक राजीव उमराव कहते हैं कि वे इस मामले में जांच कराकर समस्या का समाधान कराएँगे।

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