
टूटी 180 साल पुरानी परंपरा, हुसैनाबाद ट्रस्ट में रजिस्टर्ड ही माने जाएंगे 'लखनऊ के नवाब'
लखनऊ. अवध नवाबों के वंशजों ने मुहर्रम से संबंधित 180 वर्षीय परंपरा को तोड़ने के हुसैनाबाद और सहयोगी ट्रस्ट (एचएटी) पर आरोप लगाया है। दरअसल एक से नौ मोहर्रम तक ट्रस्ट की ओर से नावबीनों के घर तबर्रुक (खाना) भेजता है। यह प्रथा अवध के तीसरे राजा किंग अमजद अली द्वारा शुरु की गई थी, जब उन्होंने 1839 में हुसैनबाद एंडोमेंट डीड की शुरुआत की थी। लेकिन इस परंपरा को तोड़ कर ट्रस्ट अब सिर्फ उन्ही के घर तबर्रुक भेज रहा है, जो ट्रस्ट में रजिस्ट्रड हैं। यहां तक कि ट्रस्ट के संस्थापक मोहम्मद अली शाह के वंशजों समेत कई नवाबीन से यह हक छीन लिया गया है। इस बात से खफा कुछ वंशजों ने गवर्नर से इसकी शिकायत करेंगे।
नवाबों ने जताया ऐतराज
पीढ़ी के नवाब बदरुल बादुर उर्फ पप्पू पॉलिस्टर का कहना है कि शाही तबर्रुक हमारे बुजुर्गों की सौगात है। यह 180 साल पुरानी परंपरा है और ट्रस्ट का यह कदम नवाबीन की शान के खिलाफ है। इस सिलसिले में बेगमात रॉयल फैमिली ऑफ अवध की अध्यक्ष फरहाना मालिकी ने ऐतराज जता कर सवाल उठाया है कि आखिर ट्रस्ट कब से नवाबी खानदान का सर्टिफिकेट देने लग गया। उन्होंने कहा है कि पिछले साल तक सभी वंशज, जो कि पेंशन होल्डर थे उन्हें छोटा इमामबाड़ा और शाहनजह की रॉयल कम्युनिटी से चना दाल, खमिरी तोई, बकरखानी और आलू दिया जाता था। लेकिन इस साल मोहर्रम पर कई नवाबीनों को तबर्रुक नहीं मिला।
हुसैनाबाद एेंड अलाइड ट्रस्ट के तहत नवाबीनों के घर पर पांच दिन हंडिया में दाल और दस रोटी भेजा जाता था। इसके अलावा एक बड़ी रोटी जिसे शीरमालनुमा कहा जाता है, वो भी होती थी।
नासिर हुसैन नकवी ओएसडी, हुसैनाबाद ऐंड एलाइड ट्रस्ट ने कहा कि सूची के तहत तबर्रुक भेजा जाता है। इस बार 300 नवाबों की सूची हमारे पास है। इसी के तहत तबर्रुक भेजा जाता है। ऐसे तो कई लोग दावा कर सकते हैं कि वे नवाबीन के वंशज हैं लेकिन सभी को नवाब नहीं मान लिया जाएगा। नवाब सिर्फ उन्हें ही माना जाएगा जो कि ट्रस्ट में रजिस्टर्ड हैं, अब सिर्फ उन्हें ही तबर्रूक दिया जाएगा।
एचएटी के अधिकारियों के मुताबिक पहले तबर्रुक भेजने के लिए दो किचन का इस्तेमाल किया जाता था। लेकिन अब सिर्फ एक ही किचन से तबर्रुक भेजा जाएगा। एचएटी सचिव और एडीएम संतोष कुमार वैश ने कहा कि ''छोटा इमाम्बारा से सभी सूचियों और भोजन को भेजा जा रहा है। यह एक परंपरागत बात है और परिवारों को दो जगहों से भोजन प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं है। "

Updated on:
15 Sept 2018 05:25 pm
Published on:
15 Sept 2018 01:26 pm
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