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पत्रकारिता छोड़ यूपी के हस्तशिल्प के संरक्षण का जुनून

ई कामर्स वेबसाइट्स पर हिट हो रहे मूंज के बने प्रोडक्ट विदेशों से भी आ रही इको फ्रेण्डली मूंज प्रोडक्ट की मांग

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Mahendra Pratap Singh

Jul 04, 2016

rekha sinha

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पत्रिका इनोवेशन न्यूज
लखनऊ। लखनऊ की रेखा सिनहा ने 25 वर्षों के पत्रकारिता के कॅरियर को छोड़ कर उत्तरप्रदेश के लुप्त होते हस्तशिल्प के संरक्षण का काम शुरू करते समय ये सोचा भी नहीं था कि दो वर्ष पहले गठित संस्था के बनाये प्रोडक्ट इतने लोकप्रिय हो जाएंगे। केवल 10 कारीगरों और 10 हजार रुपये से शुरू हुए रेखाकृति संगठन के साथ आज पूरे प्रदेश के अलग-अलग जनपदों के दो सौ से अधिक कारीगर जुड़े हैं। ये कारीगर लगभग दो सौ तरह के सामान बना रहे हैं। इनकी स्नैपडील, अमेजान, पेटीएम, शॉपक्लूज, ईबे, क्राफ्ट्सविला, लाइमरोड समेत कई ई कामर्स पोर्टल पर काफी मांग है। यही नहीं यूएसए, यूएई, ब्रिटेन, फ्रांंस समेत कई देशों से बड़े आर्डर भी मिल रहे हैं।



इत्तेफाक से हुई शुरू रेखाकृति
अपने काम के बारे में रेखा सिनहा बताती हैं कि पत्रकारिता के दौरान एक स्टोरी कवर करने वह देवरिया गयी थीं। वहां बाढ़ प्रभावित गांव की गरीब महिलाओं से बातचीत कर रही थीं। खेत-खलिहान पानी में डूबे थे। उन्होंने एक महिला से कहा- खेती के अलावा कोई और काम क्यों नहीं करती? जवाब मिला-और कुछ नहीं आता। तभी एक बुजुर्ग महिला पर उनकी नजर पड़ी। वह बहुत सुंदर मूंज की डलिया बना रही थीं। उन्होंने महिलाओं से कहा- ये भी तो एक काम है। महिलाएं चौंक पड़ीं। एक ने पूछा- कौन सा काम? उन्होंने मूंज की डलिया की ओर इशारा किया। बुजुर्ग महिला ने कहा कि ये तो पोती को शादी में देने के लिए बना रही हूं। दूसरी ने कहा- कौन खरीदेगा?, इस काम से पेट कैसे भरेगा? तब सुश्री सिनहा ने कहा- बहुत खरीदार मिलेंगे। अभी आपके पास जितने हैं, मैं खरीद लूंगी। उनके कहने की देर थी कि महिलाएं मूंज की डलिया, पिटारा आदि लेकर आ गयीं। साइज के अनुसार 50 से 200 रुपये प्रति सामान भुगतान कर उन्होंने सब ले लिया। वह बताती हैं कि इन महिलाओं के चेहरे की खुशी आज भी स्मृति में ताजा है। फिर आने का वादा कर वह लखनऊ लौट आयीं और अपनी नौकरी में व्यस्त हो गयीं। इस दौरान लुप्त होती कलाओं पर एक फीचर करने के उद्देश्य से वह वाराणसी गयीं। वहां लकड़ी के खिलौने बनाने वालों की बदहाली और शोषण ने उन्हें उद्वेलित कर दिया। वहां से लौटने के बाद उन्होंने तय किया कि लुप्त होती कलाओं और कलाकारों के लिए कुछ काम किया जाना चाहिए। पति पंकज सिनहा ने भी सहयोग का वादा किया। परिचितों ने इसके लिए एक संगठन बनाने का सुझाव दिया और जन्म हुआ रेखाकृति का। 10 हजार की पूंजी से काम की शुरुआत हुई। इस तरह मूंज कला, लकड़ी के खिलौने और परम्परागत सजावटी सामानों के संरक्षण और संवर्धन पर काम शुरू हुआ।
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इलाहाबाद,देवरिया और लखीमपुर में जीवित है मूंज कला
उत्तरप्रदेश के ग्रामीण इलाकों में ज्यादातर महिलाएं मूंज से मौनी, सेनी, डलवा आदि बनाती थीं लेकिन समय के साथ ये कला सिमटती गयी। प्लास्टिक के डिब्बे और बर्तनों ने मूंज को पीछे कर दिया। ऐसे में मूंज का सामान बनाने के लिए महिलाओं को प्रेरित करने में बहुत मुश्किलें आयीं। लेकिन, इलाहाबाद, देवरिया, भदोही और लखीमपुर में महिलाओं के छोटे-छोटे ग्रुप बनाए गए। यहां महिलाएं मूंज के इको फ्रेंडली यूटिलिटी बॉक्स, फ्रूट बाउल, रोटी सर्वर, कोस्टर सेट, टेबल मैट, कटलरी स्टैण्ड, पेन स्टैण्ड, फ्लावर वास, ट्रे, घड़ा, डस्टबिन, वॉल हैंगिंग आदि की खूब मांग है। शुरुआत में वाराणसी व चित्रकूट के लकड़ी के बने 2 खिलौनों की डिमांड आई। आज खिलौनों की कैटेगरी में 50 से ज्यादा प्रोडक्ट शामिल हैं। होम डेकोर कैटेगरी में हैण्डमेड व हैंण्डपेंटेड वुडेन कर्टेन हैंगिंग, विंड चाइम, कार हैंगिंग, की रिंग, पेन्सिल कैप, फोटो फ्रेम, वुडेन पेन,वुड कार्विंग लालटेन, डिब्बे, धार्मिक मूर्तियां, नाव बॉक्स आदि की विदेशों में भी डिमांड है।

पहली प्रदर्शनी से ही मिला बेहतर रिस्पांस
रेखाकृति संगठन ने महिलाओं को समूह तो बना लिया लेकिन सबसे बड़ी समस्या आई इन सामानों को कहां और कैसे बेचा जाए। रेखा सिनहा कहती हैं-जीवन भर पत्रकारिता की। व्यवसाय की एबीसीडी नहीं आती थी। लेकिन, मन में कुछ करने की चाह थी इसलिए दुर्गापूजा पर पहली प्रदर्शनी लगायी। इसमें उम्मीद से कहीं ज्यादा बिक्री हुई। फिर सोल प्रोपराइटरशिप कम्पनी के तहत संगठन का रजिस्ट्रेशन कराया गया। इससे ऑनलाइन सेल का रास्ता खुला। ई कामर्स वेबसाइट स्नैपडील पर छह माह में ही प्रोडक्ट को फाइव स्टार रेटिंग मिल गई। इसके बाद तो अमेजान, ईबे, पेटीएम, शॉपक्लूज, क्राफ्टविला आदि ई कामर्स वेबसाइट पर भी बिक्री का रास्ता खुल गया। बी2बी पोर्टल इण्डिया मार्ट, ट्रेड इण्डिया व एक्सपोर्टर्स इण्डिया पर प्रोडक्ट प्रमोशन किया गया। जब काम बढ़ा और लगा कि कला के संरक्षण के लिए फुलटाइम समय देने की जरूरत है तो रेखा ने पत्रकारिता को तिलांजलि दे दी। इसके बाद दो सालों में देशभर में दो दर्जन प्रदर्शनी सह सेल लगाई। इस बीच कैलीफोर्निया में दो इंटरनेशनल प्रदर्शनी लगाने का भी मौका मिला।

सफलता का मूलमंत्र
रेखाकृति की सफलता का मूल मंत्र है- बड़े आर्डर के साथ ही छोटे-छोटे आर्डर को महत्ता और गुणवत्ता को बनाए रखना। आने वाले समय में लुप्त होती मंूज कलाओं के डाक्यूमेंटेशन और किताब का प्रकाशन,डाक्यूमेंट्री शामिल है।