
Rift Rumblings in UP BJP: उत्तर प्रदेश की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी के भीतर नेतृत्व की आंतरिक समीकरणों को लेकर चर्चाएं तेज हैं। मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष के बीच कथित दूरी को लेकर सियासी गलियारों में तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। सवाल यह उठ रहा है कि यदि शीर्ष स्तर पर समन्वय में दरार की धारणा मजबूत होती है, तो 2027 के विधानसभा चुनाव पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा?
हाल ही में प्रदेश अध्यक्ष और केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री पंकज चौधरी ने उत्तर प्रदेश विधानसभा के बजट सत्र की शुरुआत पर सोशल मीडिया के माध्यम से संदेश जारी किया। अपने संदेश में उन्होंने लिखा कि 2026–27 का बजट राज्य की प्रगति और समृद्धि के नए द्वार खोलेगा तथा ‘डबल इंजन की सरकार’ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन में उत्तर प्रदेश को देश का ग्रोथ इंजन बनाने के लिए निरंतर कार्य कर रही है। हालांकि, पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच चर्चा इस बात को लेकर रही कि संदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का उल्लेख नहीं किया गया। इसे लेकर राजनीतिक हलकों में तरह-तरह की व्याख्याए सामने आईं,क्या यह सामान्य चूक थी या किसी बड़े राजनीतिक संकेत का हिस्सा.
योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा ने 2017 में ऐतिहासिक जीत दर्ज की और 2022 में पुनः सत्ता में वापसी कर एक नया राजनीतिक मानक स्थापित किया। उत्तर प्रदेश जैसे विशाल और जटिल सामाजिक संरचना वाले राज्य में लगातार दूसरी बार बहुमत प्राप्त करना भाजपा के लिए बड़ी उपलब्धि माना गया।कानून-व्यवस्था, इंफ्रास्ट्रक्चर और हिंदुत्व की स्पष्ट राजनीतिक पहचान, इन तीनों स्तंभों पर योगी सरकार ने अपनी कार्यशैली को स्थापित किया। राष्ट्रीय स्तर पर भी कई राज्यों में चुनाव प्रचार के दौरान योगी की मांग प्रमुख प्रचारक के रूप में रही है। ऐसे में प्रदेश अध्यक्ष और मुख्यमंत्री के बीच सामंजस्य को लेकर उठती चर्चाएँ स्वाभाविक रूप से महत्व ग्रहण कर लेती हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग मानता है कि भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व हमेशा से संगठनात्मक संतुलन और शक्ति-वितरण की नीति पर चलता आया है। गुजरात से उभरे नेतृत्व का प्रभाव राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत है। ऐसे में उत्तर प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण राज्य में संगठन और सरकार के बीच शक्ति संतुलन बनाए रखना रणनीतिक दृष्टि से अहम माना जाता है। हालांकि, पार्टी के आधिकारिक सूत्र इन अटकलों को सिरे से खारिज करते हैं और कहते हैं कि भाजपा में संगठन और सरकार एक-दूसरे के पूरक हैं, प्रतिस्पर्धी नहीं।
पंकज चौधरी का एक कार्यक्रम में मंच से ही दो वरिष्ठ नेताओं को अनुशासन का संदेश देना चर्चा में रहा। इससे उनकी सख्त संगठनात्मक शैली का संकेत मिला। उन्होंने प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद कहा था,“कार्यकर्ताओं के लिए हम लड़ेंगे भी और अड़ेंगे भी।”राजनीतिक हलकों में यह सवाल उठाया जा रहा है कि यह ‘लड़ाई’ किससे है,विपक्ष से, संगठनात्मक चुनौतियों से या आंतरिक गुटबाजी से.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहले भी सार्वजनिक मंच से कह चुके हैं कि उत्तर प्रदेश के लिए “योगी ही उपयोगी” हैं। यह कथन भाजपा के भीतर योगी की राजनीतिक स्वीकृति और महत्व को रेखांकित करता है। योगी आदित्यनाथ जल्द ही लगातार दसवां बजट प्रस्तुत कर एक रिकॉर्ड बनाने जा रहे हैं,यह उपलब्धि उन्हें उत्तर प्रदेश की राजनीति में स्थायित्व का प्रतीक बनाती है।
2027 का विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए केवल एक राज्य चुनाव नहीं होगा, बल्कि 2024 लोकसभा के बाद राष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय करने वाला भी माना जा रहा है। उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों के कारण यह राज्य भाजपा के लिए रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि संगठन और सरकार के बीच तालमेल मजबूत रहता है, तो भाजपा के लिए राह अपेक्षाकृत आसान मानी जा सकती है। लेकिन यदि मतभेदों की धारणा गहराती है, तो विपक्ष इसे मुद्दा बनाने में देर नहीं करेगा।
राजनीतिक इतिहास गवाह है कि भाजपा में संगठनात्मक संतुलन को साधने वाले नेताओं ने लंबी पारी खेली है। केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह इसका उदाहरण हैं। उत्तर प्रदेश की राजनीति से राष्ट्रीय पटल तक उनका सफर इस बात का प्रमाण है कि विवादों से दूरी और संगठनात्मक संतुलन राजनीतिक उन्नति की कुंजी है। इसी प्रकार पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर का राजनीतिक जीवन यह दर्शाता है कि सही समय पर सही रणनीति कितनी महत्वपूर्ण होती है।
पार्टी के भीतर ‘कान भरने’ वाली राजनीति को लेकर भी चर्चाएँ होती रही हैं। वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि किसी भी बड़े संगठन में कुछ तत्व ऐसे होते हैं जो व्यक्तिगत लाभ के लिए भ्रम और अविश्वास का माहौल बनाते हैं। राजनीतिक विश्लेषक इसे ‘हरिराम नाई’ की उपमा देते हैं,ऐसे लोग जो कान के रास्ते दिल में जगह बनाने की कोशिश करते हैं। यदि नेतृत्व सतर्क न रहे, तो यह प्रवृत्ति दीर्घकालिक नुकसान पहुंचा सकती है।
भाजपा की कार्यशैली में संगठन सर्वोपरि माना जाता है। सरकार संगठन की नीतियों का क्रियान्वयन करती है। परंतु जब दोनों के बीच सामंजस्य की कमी का आभास होता है, तो संदेश कार्यकर्ताओं तक नकारात्मक रूप में पहुँच सकता है। प्रदेश अध्यक्ष और मुख्यमंत्री के बीच तालमेल केवल व्यक्तिगत संबंधों का विषय नहीं, बल्कि लाखों कार्यकर्ताओं के मनोबल से भी जुड़ा होता है।
समाजवादी पार्टी और कांग्रेस जैसी विपक्षी पार्टियां पहले ही भाजपा में कथित अंतर्विरोधों को मुद्दा बनाने की कोशिश कर रही हैं। यदि यह धारणा बनी रहती है कि शीर्ष नेतृत्व में मतभेद हैं, तो विपक्ष इसे 2027 में चुनावी हथियार बना सकता है।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में प्रतीकों और संकेतों का महत्व हमेशा से रहा है। एक सोशल मीडिया पोस्ट, एक मंचीय टिप्पणी या किसी नाम का उल्लेख ये सभी बातें राजनीतिक विश्लेषण का विषय बन जाती हैं। फिलहाल भाजपा के भीतर किसी आधिकारिक मतभेद की पुष्टि नहीं है। परंतु राजनीतिक धारणा की दुनिया में ‘संदेश’ उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं जितनी ‘मंशा’। 2027 की राह लंबी है। यदि संगठन और सरकार एक सुर में आगे बढ़ते हैं, तो भाजपा की स्थिति मजबूत रह सकती है। लेकिन यदि दूरी की चर्चा हकीकत में बदलती है, तो इसका असर चुनावी गणित पर पड़ना तय है। राजनीति में कहा जाता है,एकता शक्ति है और विभाजन अवसर। उत्तर प्रदेश में भाजपा किस रास्ते पर चलेगी, यह आने वाला समय तय करेगा।
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Published on:
13 Feb 2026 08:59 am
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