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KGMU में बवाल: रेजिडेंट डॉक्टर की शिकायत पर अतिरिक्त प्रोफेसर सस्पेंड, विशाखा समिति ने शुरू की जांच

Sexual Harassment Case: लखनऊ स्थित किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी में एक अतिरिक्त प्रोफेसर को रेजिडेंट डॉक्टर की यौन उत्पीड़न संबंधी शिकायत के बाद निलंबित कर दिया गया है। आरोप है कि प्रोफेसर ने कथित तौर पर पीछा किया, आपत्तिजनक संदेश भेजे और अनुचित व्यवहार किया। मामला विशाखा समिति के पास जांच के लिए भेजा गया है।

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लखनऊ

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Ritesh Singh

Feb 13, 2026

यौन उत्पीड़न आरोप, रेज़िडेंट की शिकायत पर अतिरिक्त प्रोफेसर निलंबित (फोटो सोर्स : Ritesh Singh )

यौन उत्पीड़न आरोप, रेज़िडेंट की शिकायत पर अतिरिक्त प्रोफेसर निलंबित (फोटो सोर्स : Ritesh Singh )

Sexual Harassment Row Rocks KGMU: प्रदेश की राजधानी स्थित किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) एक बार फिर गंभीर आरोपों के कारण सुर्खियों में है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने एक रेजिडेंट डॉक्टर की शिकायत पर एक अतिरिक्त प्रोफेसर को निलंबित कर दिया है। शिकायत में प्रोफेसर पर कथित तौर पर पीछा करने (स्टॉकिंग), अनुचित संदेश भेजने और कार्यस्थल पर आपत्तिजनक इशारे करने के आरोप लगाए गए हैं। विश्वविद्यालय के प्रवक्ता डॉ. के. के. सिंह के अनुसार, “रेज़िडेंट डॉक्टर ने बुधवार को लिखित शिकायत दी थी। प्रारंभिक स्तर पर आरोप यौन उत्पीड़न की श्रेणी में आते हैं। निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने और किसी भी प्रकार के प्रभाव से बचाने के लिए संबंधित अतिरिक्त प्रोफेसर को तत्काल प्रभाव से निलंबित किया गया है।”

शिकायत में क्या हैं आरोप

शिकायतकर्ता रेजिडेंट डॉक्टर ने आरोप लगाया है कि पिछले कुछ दिनों से अतिरिक्त प्रोफेसर उन्हें लगातार परेशान कर रहे थे। विभाग के भीतर और बाहर उनका पीछा करना,निजी मोबाइल पर आपत्तिजनक संदेश भेजना,कार्यस्थल पर इशारों और व्यवहार के माध्यम से असहज स्थिति उत्पन्न करना। डॉक्टर का कहना है कि इन हरकतों से उनके मानसिक स्वास्थ्य और पेशेवर वातावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। उन्होंने विश्वविद्यालय प्रशासन से सुरक्षा और निष्पक्ष कार्रवाई की मांग की।

‘विशाखा समिति’ के समक्ष मामला

प्रशासन ने बताया कि मामले को विश्वविद्यालय की आंतरिक शिकायत समिति, जिसे प्रचलित रूप से ‘विशाखा समिति’ कहा जाता है, के समक्ष भेज दिया गया है। यह समिति कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न की रोकथाम, निषेध और प्रतितोष अधिनियम, 2013 के तहत गठित की जाती है। डॉ. सिंह ने स्पष्ट किया कि निलंबन का उद्देश्य केवल यह सुनिश्चित करना है कि शिकायतकर्ता बिना किसी दबाव या बाधा के अपना बयान दर्ज करा सके। अतिरिक्त प्रोफेसर को जांच पूरी होने तक विभाग या परिसर में आने से मना किया गया है।

पिछले मामलों से जुड़ी पृष्ठभूमि

केजीएमयू में यह घटना ऐसे समय सामने आई है जब हाल ही में दो अन्य मामलों ने विश्वविद्यालय की छवि को झकझोर दिया था।

1. जूनियर रेजिडेंट की गिरफ्तारी

9 जनवरी को जूनियर रेजिडेंट डॉक्टर रमीज़ुद्दीन को लखनऊ पुलिस ने गिरफ्तार किया था। उन पर दो महिलाओं के साथ कथित जबरन धार्मिक परिवर्तन और यौन शोषण के आरोप लगे थे।

2. इंटर्न पर आरोप

उसी महीने एक इंटर्न को भी गिरफ्तार किया गया था। उस पर विवाह का झूठा वादा कर एक नर्सिंग छात्रा का कथित शोषण करने के आरोप हैं। यह कार्रवाई कैसरबाग पुलिस द्वारा की गई थी। इन दोनों घटनाओं के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन पर सुरक्षा और अनुशासन को लेकर सवाल उठे थे।

‘लव जिहाद’ विवाद और राजनीतिक प्रतिक्रिया

हालिया घटनाओं के बाद विश्वविद्यालय पर “लव जिहाद” जैसे आरोपों की चर्चा भी तेज हुई। कुछ संगठनों और राजनीतिक नेताओं ने दावा किया कि परिसर में एक सुनियोजित नेटवर्क सक्रिय है। इसी संदर्भ में भाजपा नेता और उत्तर प्रदेश राज्य महिला आयोग की उपाध्यक्ष अपरना यादव ने विश्वविद्यालय प्रशासन से मुलाकात की थी। उनकी विश्वविद्यालय की कुलपति सोनिया नित्यानंद से हुई तीखी बहस ने मामले को और तूल दे दिया।अपर्णा यादव ने आरोप लगाया था कि प्रशासन शिकायतों को गंभीरता से नहीं ले रहा। वहीं कुलपति ने स्पष्ट किया कि हर मामले में कानून और विश्वविद्यालय नियमों के अनुसार कार्रवाई की जा रही है।

आत्महत्या के प्रयास से उजागर हुआ मामला

रमीज़ुद्दीन से जुड़े मामले में एक महिला रेजिडेंट डॉक्टर ने आरोप लगाया था कि आरोपी ने उनसे संबंध बनाते समय अपनी शादीशुदा स्थिति छिपाई और कथित तौर पर जबरन धर्म परिवर्तन का दबाव बनाया। 17 दिसंबर को महिला के आत्महत्या के प्रयास के बाद यह मामला विश्वविद्यालय प्रशासन और पुलिस के संज्ञान में आया। कुलपति सोनिया नित्यानंद ने उस समय कहा था कि विश्वविद्यालय ने आरोपी को निष्कासित करने का निर्णय लिया है।

विश्वविद्यालय प्रशासन की चुनौती

लगातार सामने आ रहे मामलों ने केजीएमयू की प्रतिष्ठा पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। देश के प्रतिष्ठित चिकित्सा शिक्षण संस्थानों में गिने जाने वाले इस विश्वविद्यालय से उच्च नैतिक मानकों की अपेक्षा की जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि चिकित्सा शिक्षा संस्थानों में शक्ति-संतुलन (पावर डायनामिक्स) की समस्या अक्सर जूनियर और सीनियर के बीच असमानता पैदा करती है, जिसका दुरुपयोग होने की आशंका रहती है। ऐसे में सख्त आंतरिक तंत्र और पारदर्शी जाँच प्रक्रिया बेहद आवश्यक है।

क्या कहता है कानून

भारत में कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न से संबंधित मामलों के लिए 2013 का अधिनियम लागू है। इसके तहत प्रत्येक संस्थान में आंतरिक शिकायत समिति (Internal Complaints Committee - ICC) का गठन अनिवार्य है। यदि आरोप सिद्ध होते हैं, तो दोषी के खिलाफ सेवा नियमों के तहत सख्त कार्रवाई,निलंबन, पदावनति या सेवा समाप्ति की जा सकती है। साथ ही, गंभीर मामलों में आपराधिक प्रावधान भी लागू हो सकते हैं।

पीड़िता की सुरक्षा और मनोवैज्ञानिक सहयोग

सूत्रों के अनुसार, शिकायतकर्ता डॉक्टर को परामर्श (काउंसलिंग) और सुरक्षा संबंधी आश्वासन दिया गया है। प्रशासन ने यह भी कहा है कि जाँच प्रक्रिया गोपनीय रखी जाएगी ताकि पीड़िता की पहचान और गरिमा सुरक्षित रहे।

विशेषज्ञों की राय

महिला अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि किसी भी संस्थान की साख उसके द्वारा की गई त्वरित और निष्पक्ष कार्रवाई से तय होती है। उनका मानना है कि केवल निलंबन पर्याप्त नहीं है; दीर्घकालिक समाधान के लिए संस्थागत सुधार आवश्यक हैं, जैसे नियमित लैंगिक संवेदनशीलता कार्यशालाएं,शिकायत तंत्र की पारदर्शिता,गुमनाम शिकायत की सुविधा,मनोवैज्ञानिक सहायता सेल की मजबूती

फिलहाल अतिरिक्त प्रोफेसर के खिलाफ जांच प्रारंभ हो चुकी है। समिति की रिपोर्ट आने के बाद आगे की कार्रवाई तय की जाएगी। लगातार तीन मामलों के सामने आने से केजीएमयू प्रशासन पर दबाव बढ़ा है कि वह न केवल दोषियों पर सख्त कार्रवाई करे, बल्कि एक सुरक्षित और सम्मानजनक कार्य वातावरण सुनिश्चित करने के लिए ठोस कदम भी उठाए। प्रदेश और देश की निगाहें इस जांच के निष्कर्ष पर टिकी हैं। चिकित्सा शिक्षा के इस प्रतिष्ठित संस्थान के लिए यह समय आत्ममंथन और सुधार का है, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो और विद्यार्थियों व चिकित्सकों का भरोसा कायम रह सके।

(नोट: मामला जांच के अधीन है। आरोप सिद्ध होने तक संबंधित व्यक्ति दोषी नहीं माना जाता।)