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सपा-कांग्रेस की दुर्दशा, निर्दलीयों से भी पीछे

विधानसभा चुनावों में बुरी तरह हारने के बाद नगर निकाय चुनावों में भी पार्टी औंधे मुंह गिरी है।

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लखनऊ

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Abhishek Gupta

Dec 01, 2017

Akhilesh Yadav

Akhilesh Yadav

लखनऊ. निकाय चुनाव यूं तो किसी भी पार्टी के राजनीतिक भविष्य का आइना नहीं होते। लेकिन, उप्र में सत्तारूढ़ रही समाजवादी पार्टी का निराशाजनक प्रदर्शन चिंतनीय बात है। पिछले दो सालों में पार्टी पारिवारिक कलह की वजह से रसातल की ओर बढ़ी है। विधानसभा चुनावों में बुरी तरह हारने के बाद नगर निकाय चुनावों में भी पार्टी औंधे मुंह गिरी है। नगर पालिका चुनावों में पार्टी तीसरे स्थान पर फिसल गयी है। मुख्य विपक्षी दल होने के बावजूद पार्टी को 16 महापौरों में से एक में भी सफलता नहीं मिली। जबकि, बसपा अप्रत्याशित रूप से मुख्य विपक्षी दल बनकर उभरी है। कांग्रेस को भी करारी शिकस्त मिली है। वह खात्मे की ओर बढ़ चली है।

अखिलेश को भारी पड़ा बड़बोलापन
निकाय चुनावों के परिणाम बताते हैं कि समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव का बड़बोलापन भारी पड़ा। मतदाताओं ने पार्टी को नकार दिया। पारिवालिक कलह का असर भी नतीजों में साफ दिख रहा है। इटावा में शिवपाल समर्थक प्रत्याशी जीतने में सफल रहे हैं। अहमद हसन और आजम खान जैसे दिग्गज मुस्लिम नेताओं की अपील को भी मुस्लिम मतदाताओं ने नकार दिया और सपा से नाराज हो गए।

अमेठी में भी नहीं बची लाज
निकाय चुनावों में कांग्रेस पार्टी को करारी हाल मिली है। पार्टी अमेठी तक में भाजपा के हाथों बुरी तरह से पराजित हुई है। महापौर के चुनावों में उसके प्रत्याशी कहीं तीसरे तो कहीं चौथे स्थान पर रहे। नगर पालिका की 198 सीटों में से कांग्रेस को सिर्फ 06 सीटें ही मिली हैं। जबकि, सपा 20 सीटों पर कब्जा जमा सकी। इन दोनों दलों से बेहतर स्थिति में बसपा रही। मायावती के 42 प्रत्याशी जीतने में सफल रहे। इसी तरह नगर पंचायत की कुल 438 सीटों में बसपा 108 सीटें जीतकर दूसरे स्थान पर रही। सपा को 60 और कांग्रेस को सिर्फ 14 सीटों से संतोष करना पड़ा।

बसपा ने सबको चौकाया

सबसे चौकाने वाली स्थिति बहुजन समाज पार्टी की रही। विधान सभा चुनाव के नतीजे और इसके बाद बसपा में हुई बड़ी संख्या में टूट के बाद यह माना जाने लगा था कि पार्टी में बसपा सुप्रीमो मायावती का जादू अब खत्म हो चला है। नसीमुद्दीन सिद्दिकी जैसे कद्दावर मुस्लिम नेताओं के पार्टी छोडऩे के बाद प्रचारित किया गया कि मुसलमानों ने भी बसपा का साथ छोड़ दिया है। लेकिन, पहली बार निकाय चुनावों में पार्टी सिंबल के साथ उतरी बसपा ने धमाकेदार वापसी की है। महापौर की दो सीटों पर पार्टी ने कब्जा जमाया ही नगर पंचायत की 108 सीटें जीतकर पार्टी ने अपनी स्थिति मजबूत की है। बसपा की जीत बताती है कि गांवों में ही नहीं शहरों में भी बसपा का तेजी से जनाधार बढ़ रहा है।
आप का पहली बार यूपी में खुला खाता

उप्र के चुनावों में पहली बार आप का भी खाता खुला है। नगर निगम और नगर पालिका में पार्टी का भले ही सफलता नहीं मिली लेकिन बड़ी संख्या में आप के पार्षद जीते हैं।