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संजय दत्त का क्या है चिलबिला से नाता, क्यों इस गांव को लेना चाहते हैं गोद

संजय दत्त का क्या है चिलबिला से नाता, क्यों इस गांव को लेना चाहते हैं गोद  

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लखनऊ

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Ruchi Sharma

Jun 09, 2018

sanjay dutt

संजय दत्त का क्या है चिलबिला से नाता, क्यों इस गांव को लेना चाहते हैं गोद

रुचि शर्मा

लखनऊ. मशहूर फिल्म अभिनता संजय दत्त ने शनिवार को उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात की। इस मौके पर उन्होंने यूपी में फिल्म निर्माण पर चर्चा की। इसके साथ हीप्रतापगढ़ स्थित अपने ननिहाल चिलबिला गांव को गोद लेने की इच्छा जताई। इस तरह एकाएक चिलबिला चर्चा में आ गया। सोशल मीडिया पर चिलबिला को लेकर चचाएं चल पड़ीं। चिलबिला की गूगल सर्च बढ़ गयी। पत्रिका ने भी चिलबिला और संजय दत्त की नानी को लेकर पड़ताल किया। जानने की कोशिश की आखिर चिलबिला से संजय दत्त का इतना जुड़ाव क्यों है। पता चला संजय दत्त की नानी ने बड़े संघर्षों के बीच जीवन जिया। और अपनी बेटी को लेकर मुंबई पहुंचीं। इस तरह संजय दत्त का परिवार फिल्मों से जुड़ा। संजय दत्त अपनी नानी के संघर्ष से इन्सपायर होते हैं। इसीलिए अपनी नानी के संघर्षों को याद करने के लिए वह चिलबिला गांव को गोद लेना चाहते हैं। आइए जानते हैं संजय दत्त के नानी की कहानी-

दद्नबाई थीं संजय दत्त की नानी


संजय की नानी व नरगिस दत्त की मां का नाम जद्दन बाई था। इनका निवास यूं तो कई जगहों पर था। लेकिन मूल घर चिलबिला प्रतापगढ़ में था। चिलबिला जिला प्रतापगढ़ मुख्यालय से दो किमी उत्तर बेल्हा मंदिर से थोड़ा दूर नदी उस पार स्थित है। यह कस्बा अब प्रतापगढ़ शहर का उपशहर बन गया है। यहीं जद्दन बाई का खंडहर नुमा मकान है। जनश्रुति है कि जद्दन बाई का जन्म उप्र के एक गांव गोशवारा किसी ठाकुर परिवार में हुआ था। उनके बचपन का नाम दलीया था। कच्ची उम्र में है दलीया की शादी कर दी गई। लेकिन, कुछ ही समय बीता था कि विधाता ने बड़ी निर्दयता से दलीया की मांग का सिंदूर पोंछ दिया। तब हिंदू परिवार में बालिका-वधू का विधवा होने का अर्थ पाप था। दूसरी शादी का तो सवाल ही नहीं उठता। बालिका को जीवन भर विधवा के रूप में जीना पड़ता। बताया जाता है कि इसीलिए उनके घरवाले एक दिन उन्हें अपने साथ बनारस ले गए।

वाराणसी में मोछ प्राप्ति के लिए तब हजारों महिलाएं रह रही थीं। यहां मेले की भीड़ में उन्हें अकेला छोडकऱ परिवार वाले चले आए। बताया जाता है कि वाराणसी में कई दिनों भटकने के बाद जद्दनबाई यहां की प्रसिद्ध नर्तकी और तवायफ दलीपाबाई के ठिकाने पर पहुंच गयीं। दलीपाबाई ने इनको आश्रय दिया। दलीपाबाई ब्राह्मण थीं। इस तरह दलीपाबाई की दत्तक पुत्री होने की वजह से जद्दनबाई को ब्राह्मण विधवा भी कहा गया है। जद्दनबाई आगे चलकर दुनिया की पहली महिला संगीतकार-गायिका बनीं।। जिन्होंने फिल्मों में संगीत दिया। यह वाराणसी, इलाहाबाद, कलकत्ता और फिर मुबंई में भी रहीं। प्रतापगढ़ के चिलबिला में इन्होने अपने जीवन का लंबा समय बिताया।


संजय दत्त की जड़ों की तलाश


जद्दनबाई का गाया हुआ गाना लागत करेजवा में चोट आज भी लोग दिल थाम के सुनते हैं। जद्दन बाई अपने जवानी के दिनों में बेहद सुन्दर थीं। बनारस में चौक थाने के पास जद्दन कि महफि़ल सजती थी। जद्दन बाई ने संगीत की शिक्षा दरगाही मिश्र और उनके सारंगी वादक बेटे गोवर्धन मिश्र से ग्रहण की थी। बनारस की नर्तकी दलीपाबाई के दरबार की यह शान थीं। जद्दनबाई दुनिया की पहली महिला संगीतकार-गायिका थीं जिन्होंने फिल्मों में संगीत दिया। जद्दनबाई इलाहाबाद में भी रहीं। यह यहां मकान नंबर 77 मीरगंज में रहती थीं। इनके परिचितों में पंडित मोतीलाल नेहरू भी शामिल थे। जद्दनबाई के तीन शादियां कीं। इनकी पहली शादी नरोत्तमदास खत्री से हुई। जो बाद में मुसलमान बन गए। इन्हें लोग बच्ची बाबू कहते थे। दूसरी शादी उस्ताद मीर खान से हुई। जिससे फिल्म एक्टर अनवर हुसैन पैदा हुए। जद्दनबाई की तीसरी शादी उत्तमचंद मोहनचंद से हुई। यह डॉक्टर थे।

जिसे लोग मोहन बाबू कहते थे। यह भी बाद में मुसलमान बन गए। इनका नाम हुआ अब्दुल रशीद। इसी शादी से जो तीन बच्चे हुए उनमें सबसे बड़ी का नाम फ़ातिमा ए.रशीद था। 1 जून 1929 को कलकत्ता में जन्मीं फातिमा आगे चलकर नरगिस नाम से मशहूर हुईं। इनकी शादी स्वर्गीय सुनील दत्त से हुई। यही संजय दत्त की मां बनीं। जबकि संजय के पिता सुनील दत्त हुसैनी ब्राह्मण थे। हुसैनी ब्राह्मणों ने यज़ीद की सेना के खिलाफ़ कर्बला की लड़ाई में हिस्सा लिया था।

जद्दन हिन्दू-मुस्लिम एकता की मिसाल थीं


जद्दनबाई की गिनती श्रेष्ठ तवायफों में होती थी। लेकिन इनका हिंदू और मुसलमान दोनों बहुत सम्मान करते थे। ये ऐसी पहली अवधी गायिका थीं जिनके गाए गए गाने फिल्मों में खूब चले। हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल जद्दनबाई अपनी बेटी के साथ मुबंई में कुछ दिनों तक रहीं थीं।