
sanyukta bhatia
लखनऊ. इंतजार खत्म हुआ। 100 साल में पहली बार भाजपा की संयुक्ता भाटिया महिला मेयर के तौर पर जनमत से चुनी गयीं। संयुक्त भाटिया ने पत्रिका संवाददाता के द्वारा किये गए एक सवाल के जवाब में कहा कि वन्देमातरम गाना अच्छी चीज़ है। इसे लागू करने में कोई हर्ज नहीं है। हम हर काम से पहले वन्दे मातरम गाते हैं। इसे लागू किया जाता है तो गलत नहीं होगा लेकिन फिलहाल अभी इस बारे में उन्होंने कोई निर्णय नहीं लिया है।
भाजपा ने 1,31,356 वोटों से जीत हासिल की है उन्हें लगभग 42 प्रतिशत वोट मिले। भाजपा की संयुक्ता भाटिया ने 3,77,166 वोट हासिल किए। वहीं सपा की मीरावर्धन दूसरे स्थान पर रहीं। मीरा वर्धन को 2,45,810 वोट मिले। इनके बाद कांग्रेस प्रत्याशी प्रेमा अवस्थी, बसपा प्रत्याशी बुलबुल गोदियाल और फिर आप प्रत्याशी प्रियंका माहेश्वरी रहीं। इसके साथ ही 110 सीटों में भाजपा के पास 58, सपा के पास 28, कांग्रेस की 8, बसपा की 2 और 14 निर्दलीयों के खाते पहुंची।
किसको कितने वोट
संयुक्ता भाटिया - भाजपा - 2,43,169
मीरा वर्धन - समाजवादी पार्टी - 1,58,247
'विपक्ष' के हाथ से फिसला मेयर पद
बीते 20 वर्षों से राजधानी की महापौर की कुर्सी पर विपक्ष का कब्ज़ा रहा है। इस दौरान नगर निगम में भाजपा की सरकार रही। जबकि प्रदेश में सपा और बसपा की। अब लगभग दो दशक बाद ऐसा हुआ है कि राज्य और निगम में एक ही पार्टी काबिज़ है।
जीत के बावजूद भाजपा को है चिंता
इस खबर के बाद से भाजपा कार्यालय में ख़ुशी का माहौल है। लेकिन जानकार इस जीत के बावजूद इसे खतरे की घंटी मानते हैं। दरअसल 2012 में डॉ दिनेश शर्मा महापौर के रूप में चुने गए थे। उनके लगातार ये दूसरा कार्यकाल था जिसमें उन्हें जीत मिली। 2012 में दिनेश शर्मा ने कांग्रेस के नीरज बोरा को 1,71,824 वोटों से हराया था। जबकि 2017 में 39.99 प्रतिशत वोट पड़े थे जो कि 2012 से 5 प्रतिशत अधिक था।
कौन हैं संयुक्ता
संयुक्ता भाटिया के परिवार की पृष्ठभूमि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़ी रही है। उनके पति सतीश भाटिया दो बार लखनऊ कैंट से भाजपा विधायक रहे हैं। पहली बार उन्होंने ही इस सीट पर भाजपा को जीत 1991 में जीत दिलाई थी।
संयुक्त के बेटे प्रशांत भाटिया राष्ट्रीय स्वयं संघ के विभाग कार्यवाह (लखनऊ विभाग) हैं। चुनाव की घोषणा से पहले हुए इंटरव्यू के दौरान 80 फीसदी वॉर्ड संयोजकों और प्रभारियों ने उनके पक्ष में समर्थन दिया था। अगस्त 2017 में संयुक्ता को महिला आयोग का सदस्य भी नामित किया गया था। चर्चाएं थी कि पार्षद उम्मीदवारों के चयन में आरएसएस की ख़ास नहीं चली जिसके चलते भाजपा पर ख़ासा दबाव था।
पहले हुआ करते थे नगर प्रमुख
74 वें संशोधन के तहत 21 नवंबर 2002 से नगर प्रमुख का नाम बदलकर महापौर हो गया और सभासद का नाम पार्षद। यह व्यवस्था निगम में लागू हुई तो उस समय डॉक्टर एस सी राय नगर प्रमुख थे और वे ही पहले महापौर भी बने।
Updated on:
01 Dec 2017 07:21 pm
Published on:
01 Dec 2017 03:35 pm
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