
शिक्षकों का कमाल: खेल-खेल में पढ़ना सीख गए छात्र, वेस्ट मैटेरियल के जरिए समझ रहे साइंस मॉडल
लखनऊ. एक तरफ शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठते रहते हैं तो दूसरी तरफ कई ऐसे शिक्षक भी हैं जो हालात बदलने में लगे हैं। शिक्षक दिवस के मौके पर हम आपको ऐसे प्रेरणादायी शिक्षकों की कहानी बता रहे हैं जिनके प्रयासों ने न सिर्फ पढ़ाई को आसान बना दिया बल्कि अटैंडेंस भी बढ़ा दी। हम आपको प्राइमरी शिक्षक क्षमा गौड़ व राधेकांत के बारे में बता रहे हैं। वे बच्चों को न सिर्फ खेल-खेल में पढ़ना सिखाते हैं बल्कि इनोवेशन के जरिए साइंस मॉडल भी समझाते हैं।
कठपुतली के खेल से समझाती हैं पाठ
कहते हैं कि बच्चों को खेल-खेल में आसानी से कई पाठ सिखाए जा सकते हैं। नियमताबाद ब्लॉक के प्राइमरी स्कूल में तैनात क्षमा गौड़ कठपुतली के जरिए पढ़ाने के लिए मशहूर हैं। दिलचस्प तरह से पढ़ाने के लिए कठपुतलियों का इस्तेमाल करती हैं। ये कठपुतियां उन्होंने वेस्ट मैटेरियल के जरिए तैयार की हैं। वह बैकग्राउंड में म्यूजिक चला देती हैं जिसके बाद कठपुतली का नाच देखते-देखते बच्चों को हिंदी, अंग्रेजी की गिनती, पहाड़ा व कविताएं सुनाती हैं। उनके मुताबिक ये इंफोटेंमेंट है। जिससे पढ़ाई के साथ-साथ बच्चों का मनोरंजन भी हो जाता है। पहले उनके स्कूल में औसतन 250 बच्चे रोजाना आते थे लेकिन अब रोजाना 390 बच्चे आते हैं।
हाल ही में मिला अवॉर्ड
क्षमा को हाल ही में दिल्ली में नेशनल स्मार्ट स्कॉच अवॉर्ड भी दिया गया है।
ऐसे तैयार करती हैं कठपुतली
कठपुतली से पढ़ाने से ज्यादा कठिन होता है उसे तैयार करना। पत्रिका से बातचीत में क्षमा के मुताबिक एक पुराने मोजे को बीच से काट कर दो हिस्सों में बांटा ताकि पपेट बन सके। एक मोजेे को लिया, एक पेपर को उंगली में मोड़कर फेविकोल से चिपका लिया अब उंगली वाले आकार के पपेट के चारों ओर रुई लपेट कर धागों से लपेट दिया। फिर मोजे को पहना दिया, फिर ऊन से बाल बनाया, नाक, कान, व मुंह बना दिया। फिर कपड़े से ड्रेस बनाकर पहना दिया।
साइंस मॉडड के जरिए पढ़ाते हैं गुुरुजी
छात्रों को साइंस मॉडल कई बार कठिन लगते हैं। ऐसे में उन्हें आसानी से समझाने के लिए लखनऊ के मोहनलालगंज के प्राथमिक स्कूल में तैनात राधेकांत चतुर्वेदी ने वेस्ट मैटेरियल के जरिए विज्ञान के कई मॉडल तैयार किए हैं जिससे वह छात्रों को पढ़ाते हैं। इसमें ब्लड सर्कुलेशन, पाचन क्रिया आदि के मॉडल शामिल हैं। इसके अलावा जीरो बजट लैब भी बनाया है जिसमें बच्चों को तोल-भाव आसानी से सिखाया जाता है।राधेकांत के मुताबिक, जब मैंने स्कूल जॉइन किया तो देखा स्टूडेंट्स का पढ़ाई में काफी कम दिलसच्पी है तो मैंने सोचा कि क्यों न पढ़ाई का तरीका बदला जाए। उनके मुताबिक जब मैंने बच्चों को हृदय व रक्त संचार के बारे में पढ़ाना शुरू किया तो बच्चे सुन तो रहे थे लेकिन समझ नहीं पा रहे थे फिर मैंने तय किया कि बच्चों को क्रियाशील मॉडल बनाकर और दिखाकर और सरल करूंगा
ये तरीका अपनाया
-कड़ी पॉलीथीन को हृदय जैसा आकार दिया
-खाली पेन की नली बनाकर फूंक मारकर बच्चों को दिल की धड़कन दिखाई थी।
-सभी बच्चों व शिक्षकों को बता दिया था कि यह मॉडल जो तैयार हो रहा है केवल धड़कता दिल ही नहीं होगा बल्कि खून की नलियों में बहता खून भी दिखेगा। उनके मुताबिक, इसके लिए उन्होंने बच्चों द्वारा लाई गई टॉफी की खाली पन्नी, प्लास्टिक की मोटी व पतली नलिकाएं, कैंची, फेविकॉल, लाल ऊन, लाल रंग पुरानी सिरिंज व सेलो टेप का उपयोग किया। इस इनोवेशन का यह प्रभाव हुआ कि स्कूल में स्टूडेंट्स की संख्या बढ़ गई। इसके अलावा स्टूडेंट्स में मॉडल के माध्यम से विषय को प्रस्तुत करने का छिपा हुआ गुण भी सामने आ गया।
Published on:
05 Sept 2018 01:09 pm
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