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दुनिया की छठी सबसे गंदी नदी है गंगा, अरबों रुपए खर्च होने के बाद भी नहीं हुई साफ

दशकों से गंगा की सफाई के लिए कई अभियान चलाए गए। अरबों रुपए खर्च हुए हैं। भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन ने इन स्कीम को और भी बेकार कर दिया है।

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लखनऊ

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Nazia Naaz

Dec 01, 2022

 गंगा में  3000 मिलियन लीटर गंदगी हर दिन बह रही है

वाराणसी के गंगा नदी के अलग-अलग घाटों पर आए तीर्थ यात्री और सैलानियों के लिए घाट के किनारे गंदगी देखना एक आम बात हो गई है। इन घाटों की साफ-सफाई के लिए स्वच्छ गंगा' परियोजना पर करोड़ों खर्च किए गए है, लेकिन इसका फायदा कम ही हुआ है। करीब 100 मिलियन लीटर सेमी ट्रीटेड गंदगी अभी भी नदियों में बह रही है।

इतनी गंदी क्यों है बनारस की पवित्र नदियां

गंगा नदी में प्लास्टिक की थैलियां, बोतलें, कैमिकल, मूर्तियां, गाय का गोबर, आंशिक रूप से जलाए गए शव, मानव अवशेष, साड़ी कारखानों से निकलने वाले रासायनिक रंग नदी को प्रदूषित कर रहे हैं। अगस्त के महीने में गंगा नदी के पानी का रंग कांसे के रंग की तरह हो जाता है।

20 या 30 साल में नदियां भी बर्बाद होंगी और हम भी- नाविक

संडे मॉर्निग हेराल्ड में छपी रिपोर्ट के मुताबिक नाविक विरेंद्र निशाद अस्सी घाट की तरफ इशारा कहते हैं, “ अगर कुछ नहीं बदला तो 20 या 30 साल में गंगा भी ऐसी ही हो जाएगी। अगर हम अपनी नदियों को ऐसे ही गंदा करते रहे तो नदियां तो बर्बाद होंगी ही, हम बभी बर्बाद हो जाएंगे।”

निषाद सरकार की तरफ से चलाए जा रहे स्कीम को लेकर भी विरेंद्र नाखुश भी हैं। वो कहते हैं कि हर कोई जानता है कि समस्या क्या है और इसे ठीक कैसे किया जा सकता है। इस ओर कोई सरकार और अफसर कुछ करना नहीं चाहता।

निषाद घाट पर ही पले बढ़े हैं। वो कहते हैं कि जब मैं छोटा था तब नदी का पानी पिया करता था। निषाद कहते हैं कि 34 साल पहले भारत सरकार ने नदियों की सफाई के लिए प्रोजेक्ट की शुरूआत की थी, लेकिन नदियां अभी भी साफ नहीं हुई है।

एक दशक के अभियान में अरबों डॉलर खर्च

दशकों से गंगा की सफाई के लिए कई अभियान चलाए गए। अरबों डॉलर खर्च हुए हैं। भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन ने इन स्कीम को और भी बेकार कर दिया है। प्रदूषण और उसकी वजहों का नए सिरे से विश्लेषण किया गया है। फिर भी बनारस की नदियां पहले से ज्यादा गंदी हैं।

गंगा में 3000 मिलियन लीटर गंदगी हर दिन बह रही है

गंगा हिमालय से 2500 किलोमीटर तक चार राज्यों से होकर बहती है। पूर्वी तट से होते हुए बंगाल की खाड़ी में गिरती है। इन राज्यों में लोगों की कुल आबादी 400 मिलियन है। गंगा नदी में ही 400 मिलियन आबादी के मानव और औद्योगिक कचरे बह रहे हैं।

विशेषज्ञों के मुताबिक गंगा के किनारे बसे इन शहरों से प्रतिदिन 3000 मिलियन लीटर से ज्यादा सीवेज नदी में बहाया जाता है। वाराणसी पहुंचने पर इन सिवेज का ज्यादातर हिस्सा पानी में पंप किया जाता है। तब गंगा नदी दुनिया की छठी सबसे प्रदूषित नदी बन जाती है।

गंगा में हर दिन बह रहा 1.5 मिलियन से ह्यूमन वेस्ट

द संडे मॉर्निग हेराल्ड को डॉक्टर विश्वाभंर नाथ मिश्रा ने बताया कि शहर के 33 स्थलों से लगातार गंदा पानी नदी में बहाया जाता है। डॉ. विश्वंभर नाथ मिश्रा का परिवार 13 पीढ़ियों से मंदिर का पुजारी रहा है।

मिश्रा संकट मोचन फाउंडेशन चलाते हैं, ये फांउडेशन गंगा नदी को साफ करने का अभियान चलाती है। इस फाउंडेशन के प्रयोगशालाओं में वैज्ञानिकों ने पाया है नदी में प्रति 100 मिलीलीटर पानी में 1.5 मिलियन से ह्यूमन वेस्ट पाया जाता है। इसलिए गंगा में पवित्र स्नान करने वाला यो तो कोई मजबूत दिल वाला ही होगा, या फिर अंधविश्वास में डूबा कोई भक्त।

नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा यानी एनएमसीजी के महानिदेशक राजिव रंजन मिश्रा ने द हिंदू को बताया कि दशकों से चल रहे गंगा क्लीन अप प्रोजक्ट के सामने कई तरह की चुनौतियां हैं।

2014 के बाद से, सरकार ने गंगा की सफाई को अपने बड़े मिशनों में से एक बना दिया है। इसके लिए 20,000 करोड़ रुपए निर्धारित किए हैं।

यूपी में गंगा क्लीनअप के लिए 60 प्रतिशत काम ही हुआ

राजिव रंजन मिश्रा ये बताते हैं कि हमारे पास अलग-अलग तरह की 350 के करीब परियोजनाएं हैं और लगभग 160 सीवेज उपचार संयंत्र हैं। उत्तराखंड और झारखंड में सभी परियोजनाएं पूरी हैं। दो साल में इन प्रोजेक्ट का 70 प्रतिशत काम खत्म हो जाना चाहिए था, लेकिन यूपी में 60 प्रतिशत काम भी नहीं हुआ है।

राजिव रंजन मिश्रा ने कहा कि ये प्रोजेक्ट नए हैं। हमें उम्मीद है कि आने वाले दो साल में 70%काम पूरे होंगे। पहला फोकस यूपी ही होगा।

20,000 करोड़ की परियोजना के बाद क्या गंगा पहले से साफ है?

राजिव रंजन मिश्रा ने बताया कि हमने 15 साल के लिए 30,000 करोड़ रुपये की परियोजनाओं को मंजूरी दी है। 1985-2014 तक,गंगा की सफाई पर केवल 4,000 करोड़ रुपये खर्च किए गए थे। मिशन पूरा नहीं हुआ है,लेकिन नदी के बड़े हिस्से साफ हैं। उत्तराखंड में सभी परियोजनाएं पूरी हो चुकी हैं और हरिद्वार के पानी की गुणवत्ता में तत्काल बदलाव आया है।

नमामी गंगे के तहत प्लास्टिक फिशर नाम की कंपनी गंगा को कर रही साफ

पीएम मोदी ने साल 2014 में गंगा की सफाई के लिए नमामी गंगे प्रोजेक्ट की शुरूआत की थी। इस प्रोजेक्ट में ढाई अरब की लागत से प्लास्टिक फिशर नाम की जर्मन कंपनी गंगा से प्लास्टिक निकालने का काम कर रही है। गंगा में जाने वाली ज्यादातर गंदगी सहायक नदी अस्सी से ही होकर गुजरती है। इसलिए प्लास्टिक फिशर अस्सी नदीं की सपाई के लिए ट्रेक बूम लगा रही है।

कैसे काम करता है ट्रेस बूम

ट्रेस बूम प्लास्टिक की गंदगी को रिसाइकल नहीं होता है। इसमें सिंगल यूज प्लास्टिक , थर्मोकॉल , सैंडल, रबर के चप्पल मिलते हैं।अस्सी नदी का पानी कचरों से इतना प्रदुषित हो चुका है कि लोग अब इसे अस्सी नाला कहने लगे हैं। अनुमान के मुताबिक अस्सी नदी से 315 टन प्लास्टिक कचरा गंगा में गिरता है।

प्लास्टिक पिशर का कहना है कि उसके ट्रेस बूम वाराणसी की दो नदियों से हर दिन 200 से 300 प्लास्टिक जमा करते हैं। कंपनी का जोर गंगा की सहायक नदियों को प्लास्टिक से चुटकारा दिलाने पर है।