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किसान आंदोलन : दमन और शोषण से आजीवन लड़ती रही जनकिया

दिल्ली में चल रहे किसान आंदोलन के बीच यूपी के रायबरेली में 100 साल पहले किसानों के हित को लेकर हुए आंदोलन में तमाम किसान शहीद हो गए थे। 7 जनवरी 1921 को हुए इस वीभत्स गोलीकांड के 100 साल पूरे हो गये हैं। इसे मुंशीगंज गोलीकांड के नाम से भी जाना जाता है। पत्रिका के लिए शताब्दी वर्ष पर विशेष सामग्री उपलब्ध करा रहे हैं फिरोज नकवी...

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लखनऊ

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Hariom Dwivedi

Jan 07, 2021

किसान आंदोलन : दमन और शोषण से आजीवन लड़ती रही जनकिया

किसान आंदोलन के दौरान मुंशीगंज में शहीद बुधई पासी की विधवा जनकिया

पत्रिका न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ. आज के समय में जब आम लोग अदालती चक्करों से बचते बचाते नज़र आते है, कल्पना कीजिए एक शताब्दी पूर्व; ब्रिटिश दमन के दौर में एक महिला वह भी दलित वर्ग के पासी समाज की, गणेश शंकर विद्यार्थी के 'प्रताप मानहानि मामले' में बेधड़क अदालती दहलीज पर मज़बूती से खड़ी नज़र आती है। 'प्रताप मानहानि' मामले में गणेश शंकर विद्यार्थी के बचाव में राष्ट्रीय नेता, पत्रकार व वकीलों सहित 65 लोग अपने बयान दर्ज कराने अदालत पहुंचे थे। इनमें मैदान मोहन मालवीय, मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू आदि प्रमुख थे। इस भारी भरकम सूची में मात्र एक महिला का नाम दर्ज है, वह किसान आंदोलन के दौरान मुंशीगंज में शहीद बुधई पासी की विधवा जनकिया थी।

1894 के आसपास रायबरेली के ही कितूली गांव में शीतल पासी के घर जन्म लेने वाली बालिका का नाम जानकी रखा गया, किन्तु लाड़ प्यार में उसे जनकिया नाम से पुकारा जाने लगा और यही नाम उसकी पहचान बन गया। सयानी होने पर उसका ब्याह रायबरेली के ही कांटीहार गांव निवासी बुधई पासी के साथ हो गया।

7 जनवरी 1921 को जब किसानों के झुंड ज़िला मुख्यालय रायबरेली की ओर बढ़ रहे थे, तो उनमें जनकिया का पति बुधई और बुधई का ममेरा भाई बेनी भी शामिल था। रात गहराते बेनी तो घर लौट आया, किन्तु बुधई साथ न था। उसने ही जनकिया को यह हृदयविदारक सूचना दी, कि बुधई को गोली लगी और उसका प्राणान्त हो गया। इस सूचना पर भी जनकिया विचलित तो हुई, पर धैर्य बनाए रखा। अगले दिन जब गोली कांड के बाद किसान ब्रिटिश दमन के चलते छुपते फिर रहे थे, जनकिया रायबरेली पहुंची।

महज़ इतना भर नहीं, ये तो जनकिया के संघर्षों की शुरुआत भर थी। उसने पुरुष प्रधान समाज को स्त्री शक्ति का भरपूर एहसास करवा दिया था। जनकिया ने न तो अपने पति की लाश ही ली और न उसका अंतिम संस्कार ही कराया। उसने जीवन में पति के ही रास्ते को आगे बढ़ने के लिए चुना। निःसंतान जनकिया के आगे के जीवन में पीड़ित किसान ही उसका परिवार थे। जनकिया का यह रूप केवल क्षणिक आवेश भर न था, बल्कि इस घटना के पांच महीने बाद तब और भी उभर कर सामने आया, जब ताल्लुकेदार सरदार वीरपाल सिंह ने मुंशीगंज गोली कांड के लिए प्रताप समाचार पत्र में ज़िम्मेदार ठहराए जाने को लेकर अदालत में गणेश शंकर विद्यार्थी पर मुकदमा दायर कर दिया।

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कोर्ट में दी गवाही
जनकिया मुंशीगंज गोलीकांड की प्रत्यक्षदर्शी तो नहीं थी, किन्तु ताल्लुकेदार के इस कृत्य पर वह अपनी झोपड़ी में चुपचाप बैठी न रह सकी और अदालत गवाही देने जा पहुंची। एक सदी पूर्व उसके इस हौसले का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि 65 गवाहों की सूची में वह एकलौती महिला गवाह थी। भय, आतंक, उत्पीड़न और अत्याचारों के वातावरण के बीच जनकिया ने प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट मक़सूद अली ख़ां की अदालत में बेहिचक अपने बयान दर्ज कराए।

5 फरवरी 1921 को दायर इस मुकदमे में जनकिया ने अत्यंत साहस के साथ दिनांक 1 जून 1921 को अपना बयान देते हुये सिसकियों के बीच कहा, ....'मेरा आदमी बुधई, मुंशीगंज में जिस दिन गोली चली थी, उसी रोज, यह कहकर कि बाबा (जानकी दास) के दर्शन करने जा रहा हूं, सुबह दो आदमियों के साथ मुंशीगंज गया था। जिसमें बेनी भी था। बेनी मेरी 'मइया ससुर' का लड़का है। ..वे (बुधई) गजी की बंडी पहने थे और सिर पर सफेद कपड़ा बांधे थे। ... बेनी ने वापस आकर उसी दिन घड़ी भर रात बीते, घर पर आकर बताया कि तुम्हारे आदमी को गोली लग गई है। वह मर गया है। उसकी लहास (लाश) अस्पताल उठवा ले गये हैं। मैं लहास लेने नहीं गई। बेनी ने कहा था लहास नहीं मिलेगी।'

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तमाम जुल्म हुए, पर झोपड़ी में डटी रही
न्यायालय में दिये गये बयान के पीछे जनकिया के गांव में क्या-क्या भुगतना पड़ा? कौन-कौन से अत्याचार सहने पड़े? इसकी कल्पना मात्र से कोसी भी मानव का रोम रोम सिहर उठेगा। जनकिया की कहानी अत्यंत रोमांचकारी एवं हृदयविदारक है। अप्रतिम हौसले वाली यह दलित महिला अपनी आन पर डटी रही। सामंती अस्त्र का प्रयोग करते हुए इसका घर गिरवा दिया गया। गांव से निकाला मगर अपने पति बुधई के बलिदान की स्मृति संजोये यह अपनी झोपड़ी छोड़कर कहीं नहीं गई। ब्रिटिश गुलामी से लेकर आज़ाद भारत तक कहीं भी जनकिया को सुख और चैन नसीब न हुआ। 1975 के आस-पास इसका स्वर्गवास हो गया।

20 दिसंबर 1920 को किसानों के अयोध्या सम्मेलन में बड़ी संख्या में महिलाओं ने भी भागीदारी की थी। उस समय मंच से सत्यादेवी नामक महिला ने भरोसा दिलाया कि महिलाएं भी उनकी लड़ाई में पूरी तरह से साथ देंगी। जनकिया ने अपने जीवन के द्वारा सत्यादेवी की बातों पर मानो अंतिम मुहर लगा दी।

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