देश को 9 प्रधानमंत्री देने वाले यूपी में ‘मां’ की हालत गंभीर, यकीन न हो तो देखें आंकड़े

उत्तर प्रदेश, आबादी 20 करोड़। इतनी जनसंख्या वाले दुृनिया में 5 देश हैं। यानी एक देश के बराबर प्रदेश। भारत को प्रधानमंत्री दिए 9 और बदले में स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर मिला क्या?

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Aug 27, 2016
Women
पत्रिका विशेष
कौशलेंद्र विक्रम सिंह.
लखनऊ. उत्तर प्रदेश, आबादी 20 करोड़। इतनी जनसंख्या वाले दुृनिया में 5 देश हैं। यानी एक देश के बराबर प्रदेश। भारत को प्रधानमंत्री दिए 9 (पं. जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, चरण सिंह, राजीव गांधी, विश्वनाथ प्रताप सिंह, चंद्र शेखर, अटल बिहारी वाजपेयी और अब नरेन्द्र मोदी) और बदले में स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर मिला क्या... खोखली योजनाएं। यह सवाल हम नहीं कैग की रिपोर्ट खड़ा कर रही है। कैग की रिपोर्ट के मुताबिक यूपी में प्रसव के दौरान या प्रसव के पश्चात (42 दिनों के अंदर) 1 लाख में से कुल 285 महिलाएं दम तोड़ देती हैं। आंकड़े के मुताबिक यूपी इस मामले में देश का दूसरा राज्य है।

कोशिश हुई मगर... दिल से नहीं
साल 2010-12 में भारत की मातृ मृत्यु दर थी 178 जबकि, उत्तर प्रदेश में यही आंकड़ा 292 का था। यह आंकड़े एक लाख जीवित जन्म पर अनुमानित थे। 2001-03 में यह दर 517 थी जबकि 2004-06 के बीच घटकर यह दर 440 हुई। आंकड़ों को देखें तो हालत बदल तो रहे हैं लेकिन, हम लक्ष्य तक नहीं पहुंच रहे। संयुक्त राष्ट्र मिलेनियम डेवलपमेंट लक्ष्य के अनुसार मातृ स्वास्थ्य में सुधार हेतु वर्ष 2015 तक मातृ मृत्यु दर 109 मृत्यु प्रति एक लाख जीवित जन्म लाना था लेकिन यह हो नहीं पाया। उत्तर प्रदेश में मातृ मृत्यु दर संयुक्त राष्ट्र मिलेनियम डेवलपमेंट लक्ष्य 2015 के सापेक्ष दुगने से भी अधिक है। उत्तर प्रदेश के उच्च मातृ मृत्यु दर को देखते हुए यह साफ जाहिर है कि संयुक्त राष्ट्र मिलेनियम डेवलपमेंट लक्ष्य 2015 को हासिल करने हेतु राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन का लक्ष्य, पूर्ण रूप से अपर्याप्त प्रतीत होता है।

लक्ष्य पूरा होने में संदेह
अब राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन का लक्ष्य वर्ष 2017 तक मातृ मृत्यु दर को 200 मृत्यु प्रति एक लाख जीवित जन्म के सापेक्ष लाने का है। यह लक्ष्य पूरा हो पाएगा या नहीं ये तो आने वाला वक्त बताएगा लेकिन पिछला लक्ष्य क्यों अधूरा रह गया यह बात जानने वाली है। इसके पीछे जो खास वजहें रहीं उनमें जागरुकता की कमी, बजट व्यय और संस्थागत प्रसव की कमी प्रमुख रहीं।

इन पर दे सरकार ध्यान तो बदलेगी तस्वीर
मातृ पोषण में कमी की अधिकता, कम संस्थागत प्रसव, बिना पर्यवेक्षण के घरेलू प्रसव की अधिकता,उच्च मातृ मृत्यु दर, उचित परिवार नियोजन विधियों को न अपनाने, कम वजन के बच्चों की अधिकता और लड़कों के तुलना में लड़कियों में पोषण की कमी की अधिकता कुछ ऐसे अति महत्वपूर्ण विषय हैं जिन पर शासन को विशेष ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है।

ये रही असफलता की असली वजह
अगर तह तक जाएं तो क्या पता चलता है कि सरकार ने आवंटित धन राशि खर्च ही नहीं की। यानि उनकी प्राथमिकता में बेहतर स्वास्थ्य था ही नहीं। वर्ष 2010-15 के अवधि में जननी सुरक्षा योजना पर 2,380.11 करोड़ के आवंटन के सापेक्ष कुल 2196.56 करोड़ का व्यय किया गया।

यह कहती है कैग की रिपोर्ट
- लेखा परीक्षा में पाया गया कि प्रदेश में मातृ और शिशु मृत्यु दर, राष्ट्रीय औसत और संयुक्त राष्ट्र मिलेनियम डेवलपमेंट लक्ष्य की तुलना में काफी अधिक होने के बावजूद भी इस योजना के अन्तर्गत विगत पांच वर्षों के दौरान किया गया वार्षिक व्यय लगभग स्थिर था। इस योजना के अन्तर्गत आवंटित धनराशि का पूर्ण उपयोग भी नहीं किया गया था और वर्ष 2012-13 और 2014-15 की अवधि के दौरान विशेष कमी थी।

- सरकारी संस्थाओं में वर्ष 2010-15 की अवधि में संस्थागत प्रसव हेतु कुल 266.01 लाख पंजीकृत गर्भवती महिलाओं में से मात्र 123.52 लाख (46 प्रतिशत) के संस्थागत प्रसव का लक्ष्य रखा गया था। लेकिन, कुल उपलब्धि 93 प्रतिशत थी, यानि लक्ष्य से थोड़ा पीछे। आंकड़ों को टटोलने पर पता चला कि अम्बेडकर नगर, आजमगढ़, बरेली, मेरठ और वाराणसी में लक्ष्य के सापेक्ष उपलब्धि में विशेष रूप से कमी थी।

-संस्थागत प्रसव हेतु वार्षिक लक्ष्य निदेशालय परिवार कल्याण द्वारा निर्धारित किया जाता है और जिलों के मुख्य चिकित्सा अधिकारियों को सूचित किया जाता है।

- लेखापरीक्षा में पाया गया कि ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी स्वास्थ्य केन्द्रों की कमी थी, वर्ष 2011 की जनसंख्या की जनगणना के आधार पर निर्धारित मानकों के अनुसार 1,555 सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों, 5,183 प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों और 31, 100 उपकेंद्रों की आवश्यकता के सापेक्ष मार्च 2015 तक राज्य में मात्र 773 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, 3,538 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और 20,521 उपकेन्द्र ही संचालित थे।

- 90 प्रतिशत से अधिक संस्थागत प्रसव ग्रामीण क्षेत्रों से सम्बंधित थे। अपर्याप्त सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं, सरकारी स्वास्थ्य केन्द्रों पर पहुंच की कमी और प्राइवेट नर्सिंग होम, चिकित्सालयों के व्यय को वहन न कर पाने के कारण गरीब ग्रामीण अकुशल जन्म सेवा सहायक द्वारा कराये जाने वाले घरेलू प्रसव पर निर्भर थे।

प्रदेश की खस्ता हाल स्वास्थ्य सेवा
2011 की जनगणना के मुताबिक प्रदेश की जनसंख्या 19.98 करोड़ है। यानि तकरीबन 20 करोड़। इस 20 करोड़ की आबादी को संभालने के लिए कुल छोटे-बड़े 24832 अस्पताल हैं। जबकि कैग का मानना है यूपी को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए 37,738 अस्पताल चाहिए।
-प्रदेश में पुरुषों के लिए कुल 78 बड़े अस्पताल हैं जिनमें कुल 13257 बेड हैं। जबकि महिलाओं के लिए 53 बड़े अस्पताल हैं जिसमें सिर्फ 4503 बेड।

-एक और आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि भारत में 61011 लोगों पर 1 अस्पताल है और 1833 लोगों पर एक बेड। जबकि उत्तर प्रदेश में 8054 लोगों पर 1 अस्पताल है।

फैक्ट फाइल
यूपी में अस्पतालों की संख्या
जिला एवं अन्य अस्पताल (पु.)- 78
जिला एवं अन्य अस्पताल (म.)- 53
सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र- 773
प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र- 3538
उप स्वास्थ्य केन्द्र- 20521
Published on:
27 Aug 2016 07:34 pm
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