
लखनऊ. राजधानी के पहले नागरिक कहलने के लिए छिड़ी इस जंग में 19 दावेदार ताल ठोक रहे हैं। ख़ास बात ये हैं कि जंग महिलाओं के बीच छिड़ी है। 100 सालों में ये पहली बार है कि राजधानी को कोई महिला महापौर मिलेगी। ये निर्णय 23.3 लाख जनता के हाथ है।
1916 में ब्रिटिशर्स के द्वारा यूपी नगरपालिका अधिनियम एक्ट बनाया गया था और 1917 में पहले भारतीय महापौर उन्ही द्वारा चुना गया। 1960 में नगर निगम क्षेत्र का गठन किया गया। तब से 18 लोग महापौर की कुर्सी पर बैठ चुके हैं। 21 नवंबर 2002 से पहले महापौर (मेयर) की जगह इन्हे नगर प्रमुख कहा जाता था।
महापौर पद पर विपक्ष का कब्ज़ा
बीते 20 वर्षों से राजधानी की महापौर की कुर्सी पर विपक्ष का कब्ज़ा रहा है। पिछले डेढ़ दशक से नगर निगम में भाजपा की सरकार रही। जबकि प्रदेश में सपा और बसपा की। 74 वें संशोधन के तहत 21 नवंबर 2002 से नगर प्रमुख का नाम बदलकर महापौर हो गया और सभासद का नाम पार्षद। यह व्यवस्था निगम में लागू हुई तो उस समय डॉक्टर एस सी राय नगर प्रमुख थे और वे ही पहले महापौर भी बने। इस दौरान प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार थी। फिर 2006 का चुनाव बसपा काल में और 2012 में समाजवादी पार्टी की सरकार में हुए। दोनों ही बार डॉ दिनेश शर्मा महापौर पद पर चुने गए। बाद में सुरेश चंद्र अवस्थी को कार्यवाहक महापौर बनाया गया।
साफ छवि की हैं करोड़पति उम्मीदवार
इस महिला सीट पर 53 प्रतिशत उमीदवार करोड़ों के मालिक हैं। 10 करोड़पति उम्मीदवारों के अलावा उम्मीदवारों की औसत संपत्ति 2.45 करोड़ की है। इनमें से कोई भी उम्मीदवार महापौर बने, राजधानी को साफ छवि की महिला मेयर ही मिलेगी। दरअसल इन उम्मीदवारों में से किसी भी उम्मीदवार पर कोई भी क्रिमिनल केस नहीं दर्ज है।
पहली बार ऐसी हाल में चलेगा सदन
चुनाव नतीजों के बाद पहली बार चलने वाला निगम सदन ऐसी हॉल में चलेगा। निगम सदन की कार्यवाही बाबू राजकुमार श्रीवास्तव सभागार में होती है। अभी तक यह एयर कंडीशंड नहीं था लेकिन अब इसका कार्य पूरा हो चुका है। हालाँकि इससे पहले डॉ अखिलेश दास के समय भी इसमें ऐसी लगाने के लिए निधि पास की गयी थी लेकिन वे हो नहीं सका।
Published on:
25 Nov 2017 07:26 pm
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