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#World Earth Day : पृथ्वी दिवस पर ही क्यों याद आती हैं धरती माता

आज शुद्ध जल, शुद्ध मिट्टी और शुद्ध वायु हमारे लिए अपरिचित हो गए हैं। मनुष्य अपने लिए विकास की राह बना रहा है, सबसे बड़ी बात यह है कि उसके इस राह में प्रकृति कहीं नहीं है।

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Ashish Kumar Pandey

Apr 22, 2016

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लखनऊ.
मनुष्य इतना स्वर्थी हो गया है कि उसे सारे एेशो-आराम आैर सुख-सुविधाएं चाहिए। वह इसके लिए अधिकाधिक भौतिक सुविधाएं जुटाकर अपनी जिंदगी आरामतलब आैर वैभवशाली तरीके से बिताना चाहता है। इस तरह की चाहत रखते हुए सभी विकास आेर प्रगति की दौड़ में आगे निकलना चाहते हैं, जिससे प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन करना आम बात हो गई है। आज शुद्ध जल, शुद्ध मिट्टी और शुद्ध वायु हमारे लिए अपरिचित हो गए हैं। आज मनुष्य अपने लिए विकास की राह बना रहा है, सबसे बड़ी बात यह है कि उसके इस राह में प्रकृति कहीं नहीं है।


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हम जानते हैं कि पृथ्वी हमे बहुत कुछ देती है या यूं कहें की सबकुछ यही देती है, लेकिन हम उसे इसके बदले में क्या देते हैं, यह हम सभी बेहतर जानते हैं। जो पृथ्वी हमारा लालन-पालन और पोषण करती है, आज हम उसी पृथ्वी को अपने द्वारा पैदा किए गए प्रदूषण नामक राक्षस से उसके सारे इको सिस्टम को नष्ट करने पर तुले हुए हैं। हम अपनी मनमानी इतनी करते जा रहे हैं कि पृथ्वी अब मानों नाराज होने लगी है।


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जीवन भी प्रदान करती है

पृथ्वी ही एक एेसा अनोखा ग्रह है जो सुंदर हाेने के साथ-साथ जीवन भी प्रदान करता है। सौरमंडल का तीसरा ग्रह पृथ्वी आज से लगभग साढ़े चार अरब वर्ष पहले अस्तित्व में आया। इस पृथ्वी पर वैसे तो बहुत से जीव-जन्तु हैं जो अपना जीवन आनंद के साथ जी रहे है, लेकिन मानव इस पर सबसे बुद्धिमान जीव है। जैसे-जैसे मानव सभ्यता की आेर बढ़ता गया वैसे-वैसे उसकी जरूरतें भी बढ़ती गर्इं। अपनी आवश्यकताआें को पूरा करने के लिए मानव इस पृथ्वी के प्राकृतिक संपदा का दोहन करने लगा, उसे अपनी आवश्यकता ही जरूरी दिखती है शायद यह जीवन प्रदान करने वाली पृथ्वी नहीं। आज जरूरत से ज्यादा प्राकृतिक संपदा के दोहन ने इस ग्रह के नाजुक संतुलन को बिगाड़ दिया है।




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पर पहले से सुखी नहीं हुआ इंसान

मनुष्य अपनी आवश्यकताआें के लिए प्राकृितक संपदा का दोहन तो करता गया, लेकिन उसके बावजूद भी वह आज पहले से अधिक सुखी नहीं हुआ। विकास विकास की हर कोर्इ बात करता रहा, लेकिन पृथ्वी की चिंता किसी को भी नहीं रही। जब बीसवीं सदी में पूरी दुनिया विकास की रेस में दौड़ लगा रही थी तो उस समय पर्यावरण के बारे में किसी को चिंता नहीं था, या यह कहें कि पर्यावरण किसी के चिंता का बिषय नहीं था। सबकी रट एक ही थी विकास-विकास आैर विकास। हमने विकास तो काफी कर लिया आैर हम सब इक्कीसवीं सदी में अब जी रहे हैं। हम जी तो रहे हैं आैर हमने विकास भी कर लिया है, लेकिन हम शुद्ध वातावरण में सांस नहीं ले रहे हैं। एेसा इसलिए है क्योंकि हमने पिछली शताब्दी में विकास हासिल करने के लिए पर्यावरण का जमकर दोहन किया आैर उसी के कीमत पर हमने विकास किया। हमें तो केवल विकास करना था, लेकिन यह नहीं पता था कि जिस विकास के खातिर हमने अपने पर्यावरण और जैव विविधता की अनदेखी किया है, आज उसी के कारण पूरी दुनिया को ग्लोबल वार्मिंग जैसी चुनौती का भी सामना करना पड़ रहा है।


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पूरी दुनिया के लिए है चुनौती

पर्यावरण और जैव विविधता की अनदेखी आज पूरी दुनिया के लिए भारी पड़ रहा है। ग्लोबल वार्मिंग विश्व के लिए एक भयानक चुनाैती बन कर खड़ा है। ग्लोबल वार्मिंग आैर इससे संबंधित विभिन्न समस्याओं जैसे प्रदूषित होता पर्यावरण, जीवों व वनस्पतियों की प्रजातियों का विलुप्त होना, उपजाऊ भूमि में होती कमी, खाद्यान्न संकट, तटवर्ती क्षेत्रों का क्षरण, ऊर्जा के स्रोतों का कम होना और नर्इ-नर्इ बीमारियों का फैलना आदि संकटों से पृथ्वी पर विनाश के बादल मंडरा रहे हैं।


सबसे पहले अमेरिका में मनाया गया था

पृथ्वी दिवस को सबसे पहले 22 अप्रैल 1970 को पूरे अमेरिका में मनाया गया। फिर तो स्वच्छ पर्यावरण के लिए जागरूकता बढ़ाने के लिए पूरे विश्व में प्रतिवर्ष पृथ्वी दिवस मनाया जाने लगा। पृथ्वी दिवस के अवसर पर प्रत्येक व्यक्ति को प्राकृतिक संसाधनों का सोच समझ कर उपयोग करना सीखना होगा। तभी यह धरती हमारी आवश्यकताओं को पूरा कर सकेगी।


लेकिन उस पर अमल नहीं होता

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पृथ्वी दिवस पर तो हमारे देश में कर्इ कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, भाषणबाजी होती है। लेकिन उस पर अमल नहीं होता। हम केवल पृथ्वी को इसी दिन याद करते हैं उसके बाद तो भूल ही जाते हैं। अगर हम पृथ्वी का ख्याल रखते तो शायद यह दिन देखने को नहीं मिलता जो आज मिल रहा है। पृथ्वी दिवस को लेकर देश और दुनिया में जागरूकता का अभाव है। सामाजिक या राजनीतिक दोनों ही स्तर पर इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाए जाते। कुछ पर्यावरण प्रेमी अपने स्तर पर कोशिश करते रहे हैं, किंतु यह किसी एक व्यक्ति, संस्था या समाज की चिंता तक सीमित विषय नहीं होना चाहिए। सभी को इसमें कुछ न कुछ योगदान देना होगा तभी बात बनेगी।


क्या करें

-जब भी बाजार जाएं अपने साथ कपड़े का थैला, जूट का थैला या बॉस्केट ले जाएंं।

-हम सप्ताह में कितने कितने पॉलीथिन थैलों का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसका हिसाब रखें और इस संख्या को कम से कम आधा करने का लक्ष्य बनाएं।

-यदि पॉलीथिन थैले के इस्तेमाल के अलावा कोई और विकल्प न बचे तो एक सामान को एक पॉलीथिन थैले में रखने के स्थान पर कई सामान एक ही में रखने की कोशिश करें।

-अक्सर देखा गया है कि घर पर पॉलीथिन थैलों का काफी उपयोग किया जाता है, जैसे लंच पैक करना, कपड़े रखना या कोई अन्य घरेलू सामान रखना, इनमें से कुछ को कम करने का प्रयास करें।

-पॉलीथिन के थैलों से जितना बच सकते हैं बचेंं।

-लोगों में जागरूकता फैलाने का काम करें।

-बच्चों को प्रोत्साहित करें कि वे अपने पुराने खिलौने तथा गेम्स ऐसे छोटे बच्चों को दे दें जो कि उपयोग कर सकते हैं।


करना होगा चिंतन

विश्व पृथ्वी दिवस केवल एक दिन मनाने का नहीं है। आज के दिन हमें चिंतन आैर मनन करना चाहिए की हम पृथ्वी को कैसे बचा सकते हैंं। अगर पृथ्वी सही सलामत रहेगी तभी आप भी रहेंगे। एेसे बहुत से तरीके हैं जिसे हम अकेले और सामूहिक रूप से अपनाकर धरती को बचाने में योगदान दे सकते हैं। हमे हर दिन को पृथ्वी दिवस मानना होगा। पृथ्वी के संरक्षण के लिए हमें रोजाना कुछ न कुछ करते रहना चाहिए। आज आप चाहे जितने भी व्यस्त हों लेकिन रोजाना कुछ न कुछ समय अपनी इस धरती को दें, अगर आप अपनी मां को समय नहीं देंगे तो मां भी तो कभी न कभी रूठ जाएगी आैर जब मां रूठ जाएगी तो सोचिए क्या होगा।