मनुष्य अपनी आवश्यकताआें के लिए प्राकृितक संपदा का दोहन तो करता गया, लेकिन उसके बावजूद भी वह आज पहले से अधिक सुखी नहीं हुआ। विकास विकास की हर कोर्इ बात करता रहा, लेकिन पृथ्वी की चिंता किसी को भी नहीं रही। जब बीसवीं सदी में पूरी दुनिया विकास की रेस में दौड़ लगा रही थी तो उस समय पर्यावरण के बारे में किसी को चिंता नहीं था, या यह कहें कि पर्यावरण किसी के चिंता का बिषय नहीं था। सबकी रट एक ही थी विकास-विकास आैर विकास। हमने विकास तो काफी कर लिया आैर हम सब इक्कीसवीं सदी में अब जी रहे हैं। हम जी तो रहे हैं आैर हमने विकास भी कर लिया है, लेकिन हम शुद्ध वातावरण में सांस नहीं ले रहे हैं। एेसा इसलिए है क्योंकि हमने पिछली शताब्दी में विकास हासिल करने के लिए पर्यावरण का जमकर दोहन किया आैर उसी के कीमत पर हमने विकास किया। हमें तो केवल विकास करना था, लेकिन यह नहीं पता था कि जिस विकास के खातिर हमने अपने पर्यावरण और जैव विविधता की अनदेखी किया है, आज उसी के कारण पूरी दुनिया को ग्लोबल वार्मिंग जैसी चुनौती का भी सामना करना पड़ रहा है।