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#नमामिगंगेः तो अब गंगा नहीं होगी निर्मल!

गंगा की सफाई को लेकर बरती जा रही लापरवाही पर नेश्नल ग्रीन ट्रीब्यूनल (एनजीटी) ने कड़ा रुख अपनाया है और केन्द्रीय व राज्य स्तीरय प्रधिकरणों को फटकार लगाई है।

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Abhishek Gupta

Jan 13, 2016

लखनऊ.
भारत की सबसे महत्वपूर्ण नदीं गंगा
भारत और बांग्लादेश में मिलाकर
2,510
किमी की दूरी तय करती हुई उत्तरांचल में हिमालय से लेकर बंगाल की खाड़ी के सुंदरवन तक विशाल भू भाग को सींचती है। गंगा देश की प्राकृतिक संपदा ही नहीं, बल्कि जन जन की भावनात्मक आस्था का आधार भी है। लेकिन कुछ समय से गंगा अपना यही आधार खोती जा रही है। वजह एक नहीं है। लेकिन बढ़ता प्रदूषण गंगा नदी को अपनी आगोश में ले रहा है। एक समय में
पवित्र
कही जाने वाली गंगा का अस्तित्व अब खतरे में है।


इसके चलते गंगा की सफाई को लेकर बरती जा रही लापरवाही पर नेश्नल ग्रीन ट्रीब्यूनल (एनजीटी) ने कड़ा रुख अपनाया है और केन्द्रीय व राज्य स्तीरय प्रधिकरणों को फटकार लगाई है। एनजीटी ने सुनवाई के दौरान जल संसाधन मंत्रालय के जरिए नेशनल गंगा रिवर बेसिन अथॉरिटी को गोमुख से लेकर कानपुर तक गंगा की सफाई को लेकर यूपी और उत्तराखंड को फंड देने के लिए मना कर दिया है।


ग्रीन बेंच ने ये भी कह दिया है कि उनके आदेश के बगैर एनजीआरबीए फंड रिलीज नहीं करेगी। ये एनजीआरबीए का ही काम है कि वो गंगा को स्वच्छ बनाए और नदी का संरक्षण करें। इसे वर्ल्ड बैंक, केंद्र और राज्य सरकार फंड मुहैया कराती है। जस्टिस स्वतंत्र कुमार की अध्यक्ष्ता वाली बेंच ने मंगलवार को पर्यावरणविद व एडवोकेट एमसी मेहता की याचिका पर यह आदेश दिया। सुनवाई के दौरान एमसी मेहता ने कहा कि उत्तराखंड से निकलने वाले औद्योगिक अवशिष्ट और सीवेज गंगा को कितना प्रदूषित कर रहे हैं, इसकी कोई स्पष्ट जानकारी नहीं हैं।


जानकारी इस बात की भी नहीं है कि उत्तराखंड से निकलने वाले औद्योगिक अवशिष्ट यूपी में प्रवेश करने के बाद नदी के जरिए किन बिंदुओं पर जाकर मिलती है। यही नहीं, यूपी से निकलने वाली गंदगी उत्तराखंड से निकलने वाले औद्योगिक अवशिष्ट से मिलकर किन राज्यों में जाती है, इसका भी कोई सहीं आकलन नहीं किया गया हैं। इस दौरान एमसी मेहता ने कहा कि उत्रर प्रदेश और उत्रराखंड की सरकारों को अपने-अपने राज्यों में प्रदूषण पर नियंत्रण रखना चाहिए। औद्योगिक अवशिष्ट और सीवेज से निकलने वाली गंदगी को वे संभाले, साथ ही इसके लिए पर्यावरण मंत्रालय, जल संस्थान मंत्रालय, एनजीआरबीए, केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, राज्यों के प्रदूषण बोर्ड व अन्य प्राधीकरण मिलकर इसकी जांच करें। उन्होंने आगे कहा कि उत्रर प्रदेश और उत्रराखंड अब शहरीकरण की राह पर चल पड़े हैं, लेकिन इसकी कीमत गंगा को चुकानी पड़ रही है क्योंकि उद्योंगो से निकलने वाला कचरा गंगा में बहाया जा रहा है।


इस संबंध में कोई आंकड़ा अभी स्पष्ट रूप से सामने नहीं आया है और राज्य है कि एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप का खेल खेल रहा है। मेहता ने आगे कहा कि पर्यावरण मंत्रालय, राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और अन्य प्रधीकरण हर राज्य से निकलने वाली गंदगी का पता करे और जल्द से जल्द इसे निपटाने का प्रयास करें।


क्या है एनजीआरबीए-


जल संसाधन मंत्रालय ने गंगा को निर्मल करने के लिए एनजीआरबीए का गठन किया है। एनजीआरबीए गंंगा की सफाई का काम देखने वाली सर्वोच्च निकाए है। नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा यानी एनएमसीजी नमामि गंगा परियोजना को लागू करने वाली एजेंसी है। एनजीआरबीए का दायरा उत्रराखंड, उत्रर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल और अन्य दूसरे राज्यों तक है जहां गंगा और उसकी सहायक नदियां प्रवाहित होती है।


कई चरणों में बंटी है सफाई योजना-


एनजीटी ने गंगा सफाई के काम को कई चरणों में बांट दिया है। इसमें गोमुख से हरिद्वार, हरिद्वार से कानपुर, कानपुर से यूपी की सीमा, यूपी की सीमा से झारखंड और झारखंड से लेकर बंगाल की खाड़ी तक गंगा सफाई का काम शामिल है।


गंदगी फैलाने पर मिलेगा डंड-


गंगा को साफ रखने के मकसद से ट्रीब्यूनल 11 दिसम्बर, 2015 के एक फैसले में गोमुख से हरिद्वार तक प्लास्टिक के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया। ये प्रतिबंध 1 फरवरी, 2016 से लागू हो जाएगा। वहीं गंगा में गंदगी फेकने पर इस इलाके के होटलों, धर्मशालाओं और आश्रमों पर हर दिन 5000 रुपए जुर्माना लगाया जाएगा।