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#WorldHeritageDay: ये हैं लखनऊ की खूबसूरत इमारतें

18 अप्रैल को पूरे देश में वर्ल्ड हेरिटेज डे मनाया जा रहा है। इस मौके पर यदि पुरानी और ऐतिहासिक धरोहरों की बात करें, तो लखनऊ में बेशकीमती और अद्भुत स्मारकें हमेशा से ही आर्कषण का केंद्र रही हैं

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Ruchi Sharma

Apr 19, 2016

world Heritage Day

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लखनऊ.18 अप्रैल को पूरे देश में वर्ल्ड हेरिटेज डे मनाया जा रहा है। इस मौके पर यदि पुरानी और ऐतिहासिक धरोहरों की बात करें, तो लखनऊ में बेशकीमती और अद्भुत स्मारकें हमेशा से ही आर्कषण का केंद्र रही हैं। लखनऊ में इमामबाड़ा, रेजीडेंसी, भुलभुलैया और जामा मस्जिद जैसी शानदार स्मारकें हैं। लोगों कों ऐतिहासिक इमारतों की सुरक्षा और रख-रखाव पर हमेशा से ध्यान देना चाहिए ताकि आगे आने वाली पीढ़ियां भी हमारे पूर्वजों की शानदार इमारतों को देख सके।

ये हैं लखनऊ के प्रसिद्ध ऐतिहासिक इमारतें

बड़ा इमामबाड़ा लखनऊ

इमामबाड़ा का निर्माण लखनऊ नवाब आसफ़उद्दौला ने 1784 में कराया था। उनके बारे में कहा जाता था 'जिसको न दे मौला, उसको दे आसिफउद्दौला'। नवाब द्वारा अकाल राहत कार्यक्रम में निर्मित यह किला विशाल और भव्य संरचना है। इसे 'असाफाई इमामबाड़ा' भी कहते हैं। इस संरचना में गोथिक प्रभाव के साथ राजपूत और मुगल वास्तुकला का मिश्रण दिखाई देता है। यह न तो मस्जिद है और न ही मकबरा। इमामबाड़े का केंद्रीय कक्ष लगभग 50 मीटर लंबा और 16 मीटर चौड़ा है। स्तंभहीन इस कक्ष की छत 15 मीटर से अधिक ऊंची है। यह हॉल लकड़ी, लोहे या पत्थर के बीम के बाहरी सहारे के बिना खड़ी विश्व की अपने आप में सबसे बड़ी रचना है। इसकी छत को किसी बीम या गर्डर के उपयोग के बिना ईंटों को आपस में जोड़ कर खड़ा किया गया है। अत: इसे वास्तुकला की एक अद्भुत उपलब्धि के रूप में देखा जाता है।
भूलभुलैया

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इस भवन में तीन विशाल कक्ष हैं, इसकी दीवारों के बीच छुपे हुए लंबे गलियारे हैं, जो लगभग 20 फीट मोटी है। यह घनी, गहरी रचना भूलभुलैया कहलाती है। इसमें 1000 से अधिक छोटे-छोटे रास्तों का जाल है। इनमें से कुछ के सिरे बंद हैं जबकि कुछ अन्य प्रवेश या बाहर निकलने के बिन्दुओं पर समाप्त होते हैं।
छोटा इमामबाड़ा

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हुसैनाबाद इमामबाड़े का निर्माण 'मोहम्मद अली शाह' ने करवाया था। हुसैनाबाद इमामबाड़ा का निर्माण 1837 ई. में करवाया गया था। यह छोटा इमामबाड़ा के नाम से अधिक प्रसिद्ध है। ऐसा माना जाता है कि मोहम्मद अली शाह को यहीं पर दफनाया गया था। छोटे इमामबाड़े में ही मोहम्मद अली शाह की बेटी और दामाद का मकबरा भी बना हुआ है। छोटे इमामबाड़े की मुख्य चोटी पर एक सुनहरा और बड़ा गुंबद है।

सतखंडा

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इस इमारत को अली शाह और उसकी मां का मकबरा माना जाता है। मकबरे के विपरीत दूसरी दिशा में 'सतखंडा' नाम का एक अधूरा घंटाघर है। कहा जाता है कि 1840 ई. में मोहम्मद अली शाह की मृत्यु के बाद इसका निर्माण कार्य रोक दिया गया था। उस समय तक 67 मीटर ऊंचे इस घंटाघर की चार मंजिल ही बन पायी थी। मुस्लिम त्योहार मोहर्रम के अवसर पर इस इमामबाड़े की आर्कषक सजावट की जाती है और पर्यटक उसे देखने आते हैं।
जामा मस्जिद
jama majid

उत्तर प्रदेश के लखनऊ शहर में स्थित है और इसे जामी मस्जिद भी कहा जाता है। जामी मस्जिद लखनऊ की सबसे बड़ी मस्जिद है। इस मस्जिद का निर्माण मोहम्मद शाह ने शुरू किया था लेकिन 1840 ई. में उनकी मृत्यु के बाद उनकी पत्नी मलका जहां ने इसे 1845 में पूरा करवाया। जामी मस्जिद की छत के अंदरुनी हिस्से में ख़ूबसूरत चित्रकारी देखी जा सकती है। छोटा इमामबाड़े के पश्चिम दिशा में जामी मस्जिद स्थित है।
दिलकुशा कोठी
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लखनऊ के दिलकुशा क्षेत्र में गोमती नदी के तट पर स्थित है। इस कोठी को 1800 में एक ब्रिटिश मेजर गोरे ऑस्‍ले ने बनवाया था। जो अवध के नवाब के दोस्‍त हुआ करते थे। वर्तमान में यह एक खंडहर में तब्‍दील हो चुका है।

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इस इमारत की वास्‍तुकला डिजायन में इंग्‍लैंड के नॉर्थम्‍बरलैंड के सिटॉन डेलावल हॉल के पैटर्न की स्‍पष्‍ट झलक देखने को मिलती है। इसे वास्‍तव में नवाबों के शिकार लॉज के रूप में बनवाया गया था लेकिन बाद में इसे गर्मियों में रहने वाले घरों के तौर पर इस्‍तेमाल किया जाने लगा।
हैरत की बात यह है कि इस कोठी में कोई भी आंगन नहीं है। पुराने जमाने के राजाओं या नवाबों को घरों में खुलापन की आदत थी। इस कोठी का इस्‍तेमाल भारत की आजादी की पहली लड़ाई के दौरान स्‍वतंत्रता सेनानियों द्वारा किया गया था। हालांकि, भारी बमबारी के बाद ब्रिटिश सेना ने इस पर कब्‍जा कर लिया था और फलस्‍वरूप यह कोठी अपनी भव्‍यता और महिमा खोती चली गई।
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रूमी दरवाज़ा
यह दरवाजा लखनऊ का हस्ताक्षर शिल्प भवन है। अवध वास्तुकला के प्रतीक इस दरवाजे को तुर्किश गेटवे कहा जाता है। 1784 में नवाब आसफउद्दौला ने रूमी दरवाजा और इमामबाड़ा बनवाना शुरू कर दिया था। इनका निर्माण कार्य 1786 में पूरा हुआ। कहते हैं इनके निर्माण में उस ज़माने में एक करोड़ की लागत आई थी।

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