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ओशो के मृत्यु विवाद की हो निष्पक्ष जांच- स्वामी अंतर्यात्री

- पुण्यतिथि पर ओशो प्रेमियों ने लिखी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को चिट्ठी - गुरू को श्रद्धा सुमन अर्पित करने अनशन स्थल पहुंचे ओशो प्रेमी

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Osho

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महोबा. पृथक बुंदेलखंंड राज्य की मांग को लेकर पिछले 571 दिन से अनशन पर बैठे बुंदेली समाज के संयोजक तारा पाटकर व उनके सहयोगियों ने आज अनशन स्थल पर ओशो की पुण्यतिथि मनायी एवं उनकी मृत्यु पर छिड़े विवाद को शांत करने के लिए केन्द्र सरकार से निष्पक्ष जांच कराने की मांग की। उन्होंने इसके लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को चिट्ठी भी लिखी। इस मौके पर तमाम ओशो प्रेमी भी गुरू को अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करने के लिए अनशन स्थल पर उपस्थित हुए।

तारा पाटकर खुद ओशो सन्यासी हैं और स्वामी अंतर्यात्री उनका सन्यास का नाम है। आज अनशन स्थल पर उन्होंने अपने अन्य साथियों के साथ सबसे पहले ओशो की तस्वीर पर माल्यार्पण किया और कहा कि ओशो की मृत्यु पूना आश्रम में 19 जनवरी, 1990 को संदेहास्पद परिस्थितियों में हुई थी। इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। हमने इसके लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को एक खत भी लिखा है। उन्होंने कहा कि सरकार हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त जज की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाकर सच्चाई को उजागर करें। स्वामी अंतर्संतोष ने कहा कि जो तथ्य उभरकर सामने आ रहे हैं, उससे सभी ओशो प्रेमी दुखी हैं। देश भर में ओशो के करोड़ो प्रेमी हैं। ओशो के निजी चिकित्सक डा.गोकुल गोकाणी आरोप लगा चुके हैं कि ओशो की मृत्यु के वक्त मैं आश्रम में मौजूद था, लेकिन मुझे मिलने नहीं दिया गया। ओशो की मां भी वहीं थीं, उनको भी नहीं मिलने दिया गया। मुझसे जबरदस्ती मृत्यु सर्टिफिकेट जारी करवाया गया।

स्वामी अरूण ने कहा कि मृत्यु की सार्वजनिक घोषणा के बाद एक घंटे के अंदर उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया। पुणे के सन्यासी योगेश ठक्कर ने मौत की निष्पक्ष जांच के लिए 2017 में मुंबई हाईकोर्ट में एक याचिका भी दायर की जिसमें डा. गोकुल गोकाणी ने हलफनामा देकर इन तथ्यों का खुलासा किया। बुंदेली समाज के महामंत्री डा. अजय बरसैया ने कहा कि ओशो की मृत्यु से जुड़े विवादों का पटाक्षेप करने के लिए पत्रकार अभय वैद्य ने "हू किल्ड ओशो" किताब भी लिखी। ओशो की मृत्यु के 23 साल बाद जब उनकी वसीयत खुली तो पता चला कि भारत, यूरोप और अमरीका में ओशो की बौद्धिक संपदा से होने वाली करोड़ों की आय पर कुछ लोगों की निगाहें थी। इतना ही नहीं ओशो की मित्र निर्वाणो की भी 41 दिन बाद मौत हो गयी थी। इस मौके पर डा. प्रभु दयाल, दीपेन्द्र सिंह परिहार, सौरभ गुप्ता, कल्लू चौरसिया, अमरचंद विश्वकर्मा, इकबाल भाई, हरगोविंद समेत तमाम लोग मौजूद रहे।