
पॉलिटिकल पार्टी
यशोदा श्रीवास्तव
महराजगंज। चुनाव चाहे विधानसभा के हों या लोकसभा के-अक्शर देखा जाता है कि मुस्लिम बाहुल्य सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवारों की भीड़ लग जाती है। और फिर यही वह कारण होता है कि विपक्ष जिसे हराने का ख्वाब देखता वही बाजी मार ले जाता है। विपक्ष का ख्वाब दिवास्वप्न बनकर रह जाता है। मुस्लिम बाहुल्य वाली पूर्वांचल मे लोकसभा की तीन ऐसी सीटें हैं जहां विपक्ष यदि किसी एक साझा उम्मीदवार को मैदान मे उतारे तो वह चुनाव जीतने मे कामयाब हो सकता है।ये सीटें हैं घोसी आजमगढ़ तथा डुमरियागंज।
इस बार भाजपा को सत्ता से दूर करने के लिए विपक्षी दलों के महागठबंधन की बात चल रही है। कहना न होगा कि भिन्न भिन्न कारणों से भाजपा से नाराज चल रहे वोटरों के एक विशाल वर्ग की भी गठबंधन पर नजर है लेकिन वह अपने बाहुल्यता वाली सीटों पर कई मुस्लिम उम्मीदवारों की दावेदारी देख नाउम्मीद है।
बात अगर डुमरियागंज संसदीय सीट की करें तो गठबंधन उम्मीदवार को लेकर जहाँ कुछ भी अभी साफ नहीं है वहीं इस सीट पर कांग्रेस बसपा के बाद पीसपार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष डा अयूब ने भी गठबंधन की ओर से दावा ठोंक दिया है। गौर करने की बात यह है कि यहाँ से कांग्रेस के मोहम्मद मुकीम के अलावा बसपा और पीसपार्टी के दावेदार बाहरी हैं।
पीसपार्टी के डॉक्टर अयूब की पहचान गोरखपुर जिले के बड़हलगंज से है जहां उनका अपना अस्पताल है और इसी के जरिए वे समाज सेवा भी करते हैं। कुछ साल पहले उन्होंने पीसपार्टी नाम से राजनितिक पार्टी बनाई।पिछले विधानसभा चुनाव मे यूपी मे करीब 50 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए जिसमें उनको लेकर चार प्रत्याशी जीतने मे सफल भी हुए थे जिसमें डुमरियागंज विधानसभा की सीट भी थी जहां से सपा के कद्दावर नेता व कई बार विधायक रहे कमाल युसूफ ने जीत हासिल की थी लेकिन वे बगावत कर फिर सपा मे चले गए थे।
डॉक्टर अयूब स्वयं संतकबीरनगर जिले के खलीलाबाद विधानसभा सीट से विधायक चुने गए थे। यह सीट डॉक्टर अयूब की बिरादरी अंसारी बाहुल्य है।डॉक्टर अयूब की नजर अब डुमरियागंज संसदीय सीट पर है जहाँ से वे गठबंधन से अपनी दावेदारी पक्की मान रहे हैं।
बसपा के दावेदार आफताब आलम की पहचान एक एनजीओ के बड़े संचालक के रुप मे हैं। पिछले विधानसभा चुनाव मे जनाब गोरखपुर जिले के पिपराइच विधानसभा सीट से बसपा के टिकट पर चुनाव लड़कर हार चुके हैं। चुनाव हारने के बाद बसपा ने इन्हें डुमरियागंज संसदीय सीट की जिम्मेदारी सौंपते हुए यहां का प्रभारी बना दिया है। अब इनके लोकसभा चुनाव लड़ने की चर्चा तेज है।
डुमरियागंज संसदीय सीट से 2004 मे बसपा से सांसद रह चुके मो मुकीम इसी संसदीय सीट के अंतर्गत आने वाले इटवा विधानसभा सीट से दो बार विधायक भी रह चुके हैं। वे कांग्रेसी पृष्ठभूमि के हैं।
फिलहाल गठबंधन की दशा मे विपक्ष के मुस्लिम चेहरों मे से उपरोक्त मे से कोई एक नाम आ सकता है। लेकिन सवाल उठता है की इस सीट का मुस्लिम वोटर बाहरी मुस्लिम उम्मीदवार को तवज्जो देगा?यह सवाल इसलिए है की अपने जमाने मे कांग्रेस की बड़ी नेता रहीं मोहिसना किदवई यहां बुरी तरह मुंह की खा चुकी हैं।
स्थानीय लोगों से इस बाबत बात करें तो उनका साफ कहना है कि सियासी पार्टियां उम्मीदवार थोपने से बाज आएं।गठबंधन न होने की दशा मे जाहिर है कि चुनाव लड़ने को बेताब अलग अलग दलों के सारे मुस्लिम चेहरे मैदान मे होंगे और तब किसे फायदा होगा यह बताने की जरुरत नही है।यदि गठबंधन की दशा मे यह सीट सपा बसपा या कांग्रेस के खाते मे जाती है और वे मुस्लिम उम्मीदवार ही उतारना चाहते हैं तो वे इसी संसदीय क्षेत्र के मुस्लिम चेहरे को ही मैदान मे उतारे। यहां भी मुस्लिम वर्ग मे हर दल मे अच्छे नेता मौजूद हैं।
Updated on:
09 Aug 2018 04:18 pm
Published on:
09 Aug 2018 03:11 pm

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