
भारत में इन देशों से हो रही है गोल्ड तस्करी, सुनकर उड़ जायेंगे आपके होश
यशोदा श्रीवास्तव की रिपोर्ट...
महराजगंज. देश की सरकार और जांच एजेंसियां कितनी भी सख्ती का दावा कर रही हों पर तस्करों का जाल हर नियम कानून को दरकिनार कर अपने मंसूबे में कामयाब होता दिख रहा है। बात करें गोल्ड तस्करी की स्वीटजरलैंड से नेपाल और नेपाल से भारत के कई हिस्सों में फैले इस रैकेट से गोल्ड तस्करी का धंधा खूब फल-फूल रहा है। पर ये बात तो तय है कि अगर इसी तरह से सोने की तस्करी कारोबार बढ़ता रहा तो भारत सरकार को इसका बड़ा नुकसान होता दिख रहा है।
इसकी वजह चौंकाने वाली है। गोल्ड की तस्करों का बड़ा नेटवर्क सोनौली बार्डर से लेकर गोरखपुर, दिल्ली तथा मुंबई तक फैला हुआ है। इस धंधे के पीछे दरअसल रूपयों की अदला बदली का खेल है जो गोल्ड की तस्करी के जरिए फलफूल रहा है।
नेपाल में मुख्यत स्वीटजेरलैंड से गोल्ड तस्करी के जरिए आ रहा है। यहां से तस्करी के जरिए ही भारत के गोल्ड बाजार में इसका खपत हो रहा है। स्वीटजरलैंड से गोल्ड की तस्करी के पीछे भी भारत के तस्कर हैं जो काठमांडू में बैठकर इस धंधे को अंजाम दे रहे हैं। इसके लिए दिखावे में कई तस्कर तो काठमांडू में बाकायदे ज्वेलरी की दुकान तक खोल रखे हैं।
इन तस्करों का नेटवर्क भारत के स्वर्णव्यवसायियों से सीधे से जुड़ा हुआ है। जिसमें गोरखपुर का भी एक बड़ा गोल्ड व्यवसायी है। बताते हैं कि अकेले यही व्यवसायी प्रतिदिन तीन से चार किलो तस्करी का गोल्ड खरीदने का माद्दा रखता है। तस्करी का गोल्ड खरीदने से दुनियां भर के कागजात से फुर्सत मिल जाता है।
खासतौर पर जीएसटी आदि के लफड़ा नहीं रहता। बड़े गोल्ड व्यवसायियों को यह एक बड़ी राहत है भले ही उन्हें तस्करी का गोल्ड खरीदने में कोई फायदा न होता हो। गोल्ड की तस्करी में तस्करों को सुविधा यह है कि इसे जेब में भी छिपाकर आधा एक किलो तक लाया जा सकता है। स्वीटजरलैंड का गोल्ड प्रति दस ग्राम महज सौ रूपये सस्ता ही पड़ता है। लेकिन एक दो किलो की खरीद में यह फायदा दो चार हजार रूपये में हो जाता है। तस्कर दो चार हजार रूपये की के लिए इतना बड़ा रिस्क नहीं लेते। इसके तस्करी के पीछे असल खेल भारतीय रूपयों के बदले नेपाली रूपयों के एक्सचेंज का है।
एक किलो गोल्ड ही नेपाल से सोनौली बार्डर पारकर तस्कर गोरखपुर तक पहुंचाने में ही सफल हो गए तो उसे करीब 25 लाख रूपये मिल जाते हैं। इन रूपयों को नेपाली रूपयों में एक्सचेंज करने के बदले तीन प्रतिशत बट्टे के हिसाब से ही करीब 75 हजार का शुद्ध फायदा होता है। दोनों देशों के रूपयों के बदलने की जरूरत इसलिए पड़ती है कि नेपाल में खरीददारी के लिए जहां नेपाली रूपयों की जरूरत पड़ती है वहीं भारत में खरीदारी के लिए भारतीय रूपयों की जरूरत पड़ती है।
तस्कर गोल्ड की तस्करी से जहां प्रति किलो दस पांच हजार रूपये उसे बेंचकर बचाते हैं वहीं दोनों देशों के रूपयों के एक्सचेंज कर 60 से 70 हजार बनाते हैं। नेपाली रूपयों का बजार वाराणसी तक फैला हुआ है। यहां से प्रतिदिन सैकड़ों विदेशी टूरिस्ट काठमांडू आते हैं। इन्हें नेपाली रूपयों की जरूरत पड़ती है। टूरिस्ट एजेंसियां उन्हें बनारस में ही भारी बट्टे पर नेपाली रूपये उपलब्ध करा देते हैं। भारत में नया नोट चलन में आने से अभी नेपाल में इसे लेने से लोग कतराते हैं।
नेपाल सीमा पर स्थित सोनौली तथा नौतनवा में गोल्ड तस्करों का नेटवर्क फैला हुआ है। इनके माध्यम से प्रतिदिन करीब चार से पांच किलो गोल्ड की तस्करी गोरखपुर तक होती है। तस्कर इसे मेटल डिटेक्टर की जांच में पकड़ से बचने के लिए इसके टुकड़ों को कारबन में लपेटकर टेप के कई परत से चिपकाते हैं। बताते हैं कि ऐसा करने से मेटलडिटेक्टर अथवा एक्स-रे मशीन की जांच में इसका पता नहीं चल पाता।
इसे बहुत ही सटीक मुखबिरी से ही पकड़ा जा सकता है। मुखबिरी के जरिए ही अप्रेल 2017 से अब तक नेपाल सीमा के बढ़नी और सोनौली में करीब 58 किलो गोल्ड की बरामदगी हो सकी है। 21 फरवरी को नौतनवा में पकड़े गए गोल्ड के पीछे भी मुखबिरी ही रही। मुखबिरी तब होती है जब इस धंधे में लिप्त सरगना दूसरे सरगने को धोखा दिया होता है।
काठमांडू में बैठे इसके सरगनाओं के बीच वर्चस्व की जंग खूब चल रही है। इस धंधे के मुख्य सरगनाओं का पकड़ पाना मुश्किल होता है क्योंकि वे काठमांडू में आराम से बैठे हुए होते हैं। मौके पर इनके कैरियर ही पकड़े जाते हैं जो प्रति फेरा पांच से आठ हजार रूपये के मेहनताने पर अपनी जान को जोखिम में डालकर यह काम कर रहे हैं।
Published on:
24 Feb 2018 02:19 pm
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