
समाजवादी पार्टी ने मैनपुरी लोकसभा चुनाव के लिए डिंपल यादव को प्रत्याशी बनाया है। मैनपुरी सीट सपा संस्थापक मुलायम सिंह के निधन से खाली हुई है। मैनपुरी में सपा के कई दशकों के इतिहास को देखते हुए कहा जा रहा है कि डिंपल यादव आसानी से जीत जाएंगी। लेकिन ये इतना सीधा भी नहीं है। डिंपल का सियासी सफर मुलायम की बहू और अखिलेश यादव की बीवी होने के बावजूद बहुत आसान नहीं रहा है।
डिंपल का पहला चुनाव हारना मुलायम परिवार के लिए था झटका
डिंपल यादव ने 1999 में अखिलेश यादव से शादी की। उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े सियासी कुनबे में आने के बावजूद उन्होंने एक दशक राजनीति से दूरी बनाए रखी। 2009 में उन्होंने राजनीति में एंट्री की लेकिन उनकी एंट्री बहुत सुखद नहीं रही।
2009 में अखिलेश यादव फिरोजाबाद और कन्नौज से लोकसभा चुनाव लड़े। अखिलेश दोनों सीट जीते तो फिरोजाबाद सीट उन्होंने छोड़ दी और डिंपल को मैदान में उतार दिया। डिंपल के सामने थे कभी मुलायम सिंह के बेहद करीबी रहे राज बब्बर।
जिस सीट पर अखिलेश ने आसानी से चुनाव जीता था, उसी सीट पर कांग्रेस के राज बब्बर ने डिंपल यादव को हरा दिया। डिंपल की हार ने उस वक्त के पॉलिटिकल पंडितों को चौंका दिया था।
2012 में बना दिया रिकॉर्ड
2012 में सपा ने विधानसभा चुनाव जीता तो अखिलेश यादव सीएम बने और कन्नौज सीट उन्होंने खाली कर दी। उपचुनाव हुए तो मुलायम की रणनीति ने ऐसा काम किया कि डिंपल के सामने कोई उम्मीदवार ही नहीं आया।
कन्नौज से डिंपल निर्विरोध चुनाव जीतीं। उत्तर प्रदेश में डिंपल यादव अकेली ऐसी महिला हैं, जो निर्विरोध लोकसभा पहुंची हैं। उनसे पहले ना बाद में कोई महिला नेता ये कर पाई है।
2014 में डिंपल यादव फिर कन्नौज से उतरीं और चुनाव जीत गई। 2019 में डिंपल को फिर बड़ा झटका लगा जब बसपा के साथ गठबंधन के बावजूद कन्नौज से हार गईं।
2022 में फिर बनेगा 2012 जैसा संयोग
2009 में चुनाव हारने के बाद 2012 में डिंपल ने निर्विरोध जीत दर्ज की थी। 2019 में भी वो चुनाव हारीं और 2022 में फिर एक उपचुनाव में हैं। इस बार जाहिर है कि निर्विरोध जैसा कोई चांस नहीं है, चुनाव तो होगा ही। इस बार उनकी किस्मत क्या करवट लेती है, ये देखना दिलचस्प होगा।
Published on:
11 Nov 2022 07:47 am
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