
वर्षों से पुरानी यादों को संजोए रखा है पुरातत्व संग्रहालय
मंडला. जिले का एक मात्र पुरातत्व संग्रहालय प्राचीन यादों को संजोए हुए है। जिसे देख कर हमारी पुरानी संस्कृति का पता चलता है तो छात्र-छात्राआें को नया सीखने को भी मिल रहा है। जिला पंचायत कार्यालय के सामने सिविल लाइन में स्थित पुरातत्व संग्रहालय की नींव तत्कालीन जिला सांख्यिकी अधिकारी डॉ धर्मेन्द्र प्रसाद एवं पुरातत्व संघ के सदस्यों ने वर्ष 1976 में रखी गई थी। जिसे 1979 में मप्र शासन ने अधिग्रहित कर लिया। इसके बाद इसे निरंतर विकसित किया जा रहा है।
हाल ही में भवन का जीर्णोद्धार किया गया है। जिसके बाद संग्रहालय की रौनक बढ़ गई है वहीं सामग्रियां भी पहले से अधिक सुरक्षित हैं। जानकारी के अनुसार संग्रहालय में 630 पुरावशेष संग्रहित करके रखे गए हैं। जिनमें पाषाण प्रतिमाओं के अतिरिक्त विविधि प्रकार के जीवाश्म, कल्चुरि नरेश विजयसिंह देव का ताम्रपत्र, हस्तलिखित ग्रंथ, पिपरहवा (बिहार) से प्राप्त बौद्धकालीन चांवल, आदिवासी, संस्कृति उपकरण, आभूषण, आयुध, धातु की प्रतिमाएं, तलवारें इत्यादि विविधता पूर्ण रोचक संकलन है।
7वीं से 19वीं शताब्दी ईसवी की सामग्री
संग्रहालय में 7 वीं शताब्दी ईसवी से 19 वीं शताब्दी ईसवी की सामग्री रखी हुई हैं। कल्चुरि राजाओं के संरक्षण में बलुआ पत्थर से निर्मित शैव, वैष्णव एवं जैन मूर्तियां अत्यंत आकर्षक है। रामनगर की कौमारी, निवास की विष्णु, मवई से प्राप्त गंधर्व तथा शहपुरा से प्राप्त तीर्थकर प्रतिमाएं कला के अद्वितीय नमूने है। यहां के मूर्ति शिल्प पर आदिवासी संस्कृति का भी वृहद प्रभाव है। क्षेत्र में नाग पूजा प्रचलित होने के कारण नाग प्रतिमाएं यहां संग्रहित है। यहां प्रदर्शित प्रतिमाएं शहपुरा, निवास, धनौली, बिझौली, मवई, रामनगर, हिरदेनगर, झूलपुर सूपखार आदि स्थानों से संग्रहित कर रखी गई हैं। प्रतिमा निर्माण में बलुआ पत्थर, ग्रेनाइट पत्थर, मुर्रम पत्थर चूना पत्थर का प्रयोग किया गया है। चूना एवं मुर्रम ज्यादा उचित माध्यम नहीं होने के कारण प्रतिमाएं क्षरित हो गई है।
संग्रहालय का मुख्य आकर्षण जीवाश्म
दस करोड़ वर्ष प्राचीन पादप जीवाश्म, डायनासोर का अस्थि जीवाश्म, शंख जीवाश्म नारियल का जीवाश्म, मछली का जीवाश्म आदि संग्रहालय में रखे हुए हैं। जो आकर्षण का केन्द्र हैं। जीवाश्म संग्रह की दृष्टि से यह प्रदेश का प्रथम संग्रहालय है। जीवाश्मों से ज्ञात होता है कि करोड़ों वर्ष पूर्व यह भू-भाग समुद्र तट का अंश रहा होगा और करोड़ों वर्ष की अश्मीकरण क्रिया के फलस्वरूप वृक्ष एवं जीव जंतु पाषाणों में परिवर्तित हो गए। जीवाश्म जिले के पारापानी, समनापुर, घुघवा, सिलठार, देवरी खुर्द, चरगांव, बरबसपुर तथा शंख जीवाश्म पालासुंदर से संग्रहित किए गए है। भारत के स्वतंत्रता संग्राम की 50वीं वर्षगांठ पर निर्मित एक दीर्धा, जिसमें जिले के स्वतंत्रता संग्राम के अभिलेख संकलित कर प्रदर्शित किए गए है। जिसमें स्वतंत्रता संग्राम की रोचक जानकारी प्राप्त होती है। संग्रहालय का उद्देश्य अपनी अमूल्य धरोहरों को संरक्षित रखते हुए अपनी स्वर्णिम संस्कृति को आगामी पीढ़ी तक पहुंचाना भी है।
Published on:
03 Jul 2022 09:08 pm
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