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अस्तित्व को बचाने जूझ रहा आसफ खां का मकबरा

मुगलकालीन सेनापति ने किया था गोंडकालीन रानी दुर्गावती पर आक्रमण

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Asaf Khan's tomb battling for survival

Asaf Khan's tomb battling for survival

मंडला. मंडला-जबलपुर मार्ग पर स्थित आसफ खां का मकबरा अब अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए जूझ रहा है। आसफ खां एक उपाधि है जो मुगलकाल में मुगल सेना के सेनापतियों को दी जाती थी। इतिहास के जानकार एवं गल्र्स कॉलेज के प्रोफेसर एसएन खरे ने बताया कि सन १५६४ में मुगल सम्राट ने अपने प्रमुख सेनापति अब्दुल मजीद को आसफ खां प्रथम की उपाधि से नवाजा था और उसे गोंडवाना राज्य मंडला पर आक्रमण के लिए भेजा था। उस वक्त मंडला पर रानी दुर्गावती का शासन था। युद्ध में रानी दुर्गावती को शहादत मिली। गौंड राजाओं ने अपना राज्य बचाने के लिए अकबर से यह समझौता कर लिया कि वो हर साल अकबर को अपने राज्य से कर वसूल कर देंगे।
इस शर्त पर सम्राट अकबर राजी हो गया और उसने अपने सेनापति आसफ खां प्रथम को मंडला में रहने का आदेश दे दिया। आसफ हर साल गौंड राजाओं से कर वसूल कर अकबर को पहुंचाने लगा। लम्बे समय बाद आसफ खां की मौत हो गई और अकबर ने अपने सेनापति को दफनाकर वहां उसके नाम का मकबरा बनवा दिया।
अतिक्रमण की चपेट में विरासत
प्राचीन मकबरा आज प्रशासन की अनदेखी के चलते नष्ट होने की कगार पर है। इसके चारों ओर लोगों ने कब्जा कर अपने पक्के मकान बना लिए हैं। पर्यटन विभाग ने यहां अपना बोर्ड लगाकर अपनी औपचारिकता पूरी कर ली है और इसे पूरी तरह अतिक्रमणकारियों के हवाले कर दिया है। देखभाल के अभाव और आने जाने के लिए उचित मार्ग नहीं होने के कारण सैलानियों ने यहां आना बंद कर दिया है। यहां तक कि बहुत से शहरवासियों को इस बात की जानकारी भी नहीं कि यहां मुगलकालीन सेनापति का मकबरा भी है जिसका ऐतिहासिक रूप से बहुत महत्व है।