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किसानों ने जाना मृदा का महत्व

विश्व मृदा स्वास्थ्य दिवस के अवसर पर किसानों को दी गई जानकारी

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किसानों ने जाना मृदा का महत्व

किसानों ने जाना मृदा का महत्व

मंडला। कृषि विज्ञान केंद्र मंडला के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ विशाल मेश्राम के मार्गदर्शन में केंद्र के वैज्ञानिक डॉ प्रणय भारती एवं विजय सिंह सूर्यवंशी द्वारा विश्व मृदा स्वास्थ दिवस के अवसर पर कृषक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। जिसमें जिले के लगभग 75 किसानों ने भाग लिया। विश्व मृदा दिवस के उपलक्ष्य में केन्द्र के प्रमुख ने कहा कि मिट्टी है तो हमारा जीवन है, पानी के साथ साथ मृदा भी हमारा जीवन है। यह मिट्टी प्रकृति की देन है, इसे हमे स्वस्थ बनाये रखना है एवं भविष्य में इसको बचाना है। मृदा स्वास्थ्य कार्ड हर किसान को बनवाना चाहिए जिससे हम मिट्टी को स्वस्थ रख सकते है, मृदा को स्वस्थ बनाने के लिए मृदा का कटाव रोकना चाहिए। कटाव रोकने के लिए उतनी ही जुताई करे जितनी आवश्यकता है। उक्त कार्यक्रम में बताया गया कि किसान ज्यादा उपज होनी चाहिए यह सोचकर तय मात्रा से ज्यादा खाद डाल देते है जो कि गलत है साथ ही जैविक खाद, गोबर खाद, केचुआ खाद भी भूमि में डालनी चाहिए ये सभी खाद मिट्टी के 17 पोषक तत्वों की जरूरत पूर्ण करने में सक्षम है जिससे स्वस्थ फसल तैयार हो सकेगी। जब किसी फसल को समान उर्वरक डालकर भिन्न-भिन्न खेंतो में उगाया जाता है तो भी उपज में अंतर पाया जाता है। क्योकि पौधे के लिए पोषक तत्वो को प्रदान करने की क्षमता सभी मिट्टीयों में समान होना आवश्यक नही है। मिट्टी परीक्षण के आधार पर उर्वरको को संतुलित प्रयोग अत्यावश्यक है अन्यथा मिट्टी में और तदनुसार पौधो में पोषक तत्वो की आशंका बढ जाएगी जिसका कुप्रभाव मिट्टी तथा फसलोत्पादन दोनो पर पडेगा। अत: मृदा उर्वरता को बनाये रखने के लिए मिट्टी परीक्षण अति आवश्यक है। केन्द्र के वैज्ञानिक डॉ प्रणय भारती ने कहा कि वर्तमान समय में किसान भाई अधिक उपज लेने के लिए केवल रासायनिक उर्वरकों पर ही निर्भर है जबकि हमारा भारतीय परंपरा अनुसार माता पिता के द्वारा आने वाली पीढ़ीयों को अपनी संपत्ति हस्तांतरित करते है जिससे उनकी संताने अपना भविष्य सुरक्षित रखते हुए उनका मान सम्मान करती है परंतु किसान केवल रासायनिक खादों का ही अंधाधुंध प्रयोग करेंगे तो भविष्य में उनकी भूमि बंजर हो जायेगी और ऐसी बंजर भूमि जब वे अपनी पीढ़ी को धरोहर के रूप में हस्तांतरित करेंगे तो उनकी पीढ़ी का भविष्य सुरक्षित नही हो सकेगा फलस्वरूप वे अपने पूर्वजों का मान सम्मान नहीं करेंगे अत: आवश्यकता यह है कि प्रत्येक किसान अपने खेत की मिट्टी का परीक्षण करवाकर अनुसंशित मात्रा का ही प्रयोग करे व रासायनिक एवं जैविक खादों का संतुलन बनाकर प्रयोग करें। जिससे टिकाउ खेती का परिकल्पना साकार हो सके। इस के लिए डॉ प्रणय भारती ने वर्मीकम्पोस्ट, वर्मीवास, नॉडेप आदि से निर्मित उच्च गुणवत्ता युक्त जैविक खाद के उत्पादन करने पर जोर देते हुए कहा कि हर किसान के पास पशुधन के रूप में गाय भैंस अथवा बकरियां होती है जिनसे काफी मात्रा में गोबर प्राप्त होता है साथ ही उनके आहार का अवशेष भी निकलता है जिसे उपयोग कर उपरोक्त विधियों से जैविक खाद बनाई जा सकती है। केन्द्र के विशेषज्ञ विजय सिंह सूर्यवंशी ने मिट्टी परीक्षण को विस्तार से समझाते हुए बताया कि भूमि में भौतिक, रसायनिक तथा उपलब्ध पौषक तत्वों की स्थिति को ज्ञात करने के लिए मिट्टी का विश्लेषण करना ही मिट्टी परीक्षण कहलाता है। मिट्टी विश्लेषण का मुख्य उद्देश्य यह है कि कृषक सही मात्रा में फसल के अनुसार पोषक तत्व डालें। पोषक तत्व की मात्रा सही हो। मिट्टी कि आवश्यकता के अनुसार सही प्रकार का रसायनिक खाद् का उपयोग हो। मिट्टी के रसायनिक विश्लेषण से मिट्टी उपयुक्ता के आधार पर फसल की अधिक पैदावार के लिए बिलकुल सही अनुमान लगाया जा सकता है। साथ ही नमूनो के संकलन के लिए विषेष बातें ध्यान में रखते हुए कहा कि जिस कृषक के खेत की मिट्टी का नमूना लेना है उसे यह भी कहे की अपने साथ एक फावडा, खुरपी या सब्बल लेकर चलना है या अपने साथ लेकर जाना चाहिए। प्रत्येक खेेत में मिट्टी के अलग-अलग नमूने लिए जाये। नमूना लेते समय मिट्टी की ढलान, रंग, मृदा, गठन, फसल चक्र आदि कारकों पर सावधानीपूर्वक ध्यान देना चाहिए। यदि इसके कारण खेत कि मिट्टी में असमानता है तो जितने क्षेत्रफल में समानता हो उसी से संयुक्त नमूना लेना चाहिए। कभी -कभी एक ही खेत की मिट्टी में जगह -जगह अंतर दिखाई पडता है और उगाई गई फसल भी अलग -अलग तरह की दिखाई देती है। ऐसा उन भागो की मिट्टी की सतह असमान होने के कारण होता है। इन खेतो के विभिन्न भागो की मिट्टी के अलग -अलग नमूने लेेने चाहिए। उक्तकार्यक्रम में बालाघाट कृषि महाविद्यालय के राबे के कृषि छात्रों की भी उपस्थिति रही।