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बारिश का डर, टपकती है छत, दीवार भी जर्जर

जोखिम उठा कर जिन्दगी काट रहे बैगा परिवार

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बारिश का डर, टपकती है छत, दीवार भी जर्जर

बारिश का डर, टपकती है छत, दीवार भी जर्जर

मंडला. आदिवासी बहुल्य जिले में राष्ट्रीय मानव कहे जाने वाले बैगा को मूलभूत सुविधाओं से वंचित रहना पड़ रहा है। शासन की योजनाओं का लाभ भी उन्हें नहीं मिल पा रहा है। ऐवा वनांचल क्षेत्र में नहीं बल्कि मंडला जबलपुर मुख्य मार्ग में बसे फूलसागर ग्राम पंचायत का है। जहां बैगाओं को सिर छिपाने के लिए सुरक्षित स्थान भी नहीं मिल पा रहा है। 600 आबादी वाले पौषक ग्राम सिझारी में 41 बैगा परिवार निवासरत हैं। जिनमें से 3 बैगा परिवार को ही प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ मिल सका। प्रदेश सरकार बैगाओं के उत्थान के लिए बहुत सारी योजनाएं चला रही है, लेकिन योजनाओं का क्रियान्वयन करने वाले जिम्मेदार अधिकारियों की उदासीनता के चलते सरकारी प्रयास सिफर साबित हो रहे है। यहां रहने वाले बैगा परिवारों को प्रधानमंत्री आवास योजना की छत नसीब नहीं हो पाई है। ऐसे में बैगाओं को झोपड़ी में जीवन बीताना पड़ रहा है। आदिवासियों ने पीएम आवास का लाभ लेने के लिए अनेक बार जनप्रतिनिधियों से लेकर अफसरों से मांग की है। बावजूद इसके गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है।


बाराती बैगा, रामप्यारी बैगा, जमुना बाई, चेत राम, कमल सिंह आदि ने बताया कि जब से प्रधानमंत्री आवास योजना चालू हुई है। उसके बाद से उनके सिझारी में तीन बैगाओं के आवास स्वीकृत हुए है। जिनका निर्माण पंचायत के द्वारा करवाया जा रहा है, अन्य बैगाओं को झोपड़ी में रहना पड़ रहा है। इतना ही नहीं यहां कई बार ऐसा होता है कि बिजली जाती है तो एक सप्ताह तक बिजली नहीं आती। यहां के बैगा लकड़ी बेंच कर जीवन यापन कर रहे हैं। कुछ लोग मजदूरी के लिए 18 किलोमीटर दूर मंडला भी जाते हैं। स्थानीय लोगों ने बताया कि यहां पीने के लिए शुद्ध पानी भी नसीब नहीं हो रहा है। लोगों के पास खेती के योग्य जमीन भी नहीं है। यहां जनप्रतिनिधियों से लेकर अफसर निरीक्षण करने नहीं आते है। जिसके परिणामस्वरूप बैगाओं को शासन की कई सारी योजनाओं से वंचित होना पड़ रहा है। इसके अलावा रोजगार के अभाव में सदियों पुरानी कोदो कुटकी के भरोसे जीविका चलाना मजबूरी बन गई है। पंचायत में काम खुल जाते है वहां भी काम करने पर समय में मजदूरी नहीं मिल पाती है। इसके कारण बैगा लोग जंगल से लकड़ी बिन कर जीवन यापन कर रहे हैं।
दीवार जर्जर, छत से टपकता है पानी
स्थानीय लोगों का कहना है कि यहां वे वर्षों से रह रहे हैं। लेकिन वर्ष 2011 की जनगणना में यहां सर्वे नहीं हुआ। जिसके कारण यहां के लोगों को शौचालय, आवास जैसी शासन की योजनाओं से वंचित रहना पड़ रहा है। पंचायत प्रतिनिधि भी ध्यान नहीं दे रहे हैं। बारिश के समय कच्चे मकान से पानी टपकता है। दीवारों की हालत भी जर्जर है। कब कौन सी दीवार गिर जाएगा इसका पता नहीं चलता है। कुछ घरों में तो दीवार गिरने के बाद भी दूसरे कमरे में बैगा रहने को मजबूर हैं।


इनका कहना

गांव में मूलभूत सुविधाओं का आभाव है। मजूदरी के लिए मंडला जाना पड़ता है। वहीं गांव के किशोर जंगल से लकड़ी लाकर आसपास गांव में बेंचने जाते हैं। जिससे परिवार का गुजर बसर हो पा रहा है।
बराती बैगा, स्थानीय निवासी


यहां पंचायत प्रतिनिधियों का ध्यान नहीं है। आवास प्लस के लिए दोबारा सर्वे होने के बाद भी बैगा परिवारों को आवास से वंचित रहना पड़ रहा है। बारिश के समय तो जान भी जोखिम में डालनी पड़ रही है।
कमल सिंह, स्थानीय निवासी

सर्वे सूची में जिनका नाम था उनका मकान बनवा दिया है। जो सर्वे से छूटे हुए थे उनका नाम सर्वे कर आवास प्लास में जोड़ा गया है। वर्तमान में सभी के पास रहने के लिए मकान है।
देवसिंह कछवाहा, सचिव फूल सागर