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महिला शक्ति की मिसाल बनी चार बच्चियों की मां जानकी

पति की मृत्यु के बाद टूटी नहीं, बच्चियों को दी परवरिश

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Janaki, the mother of four girls became an example of women power

Janaki, the mother of four girls became an example of women power

मंडला. नारी अबला नहीं, बल्कि शक्ति स्वरूप है और चाहे तो अपनी संकल्प शक्ति से किसी भी परेशानी को अवसर में बदल सकती है। इस उक्ति को चरितार्थ किया निवास के थानम गांव की सुखमंती मार्को ने। जिसे वक्त ने इतने बेरहमी से घाव दिए जिससे उबर पाने में उस क्षेत्र की और महिलाएं सक्षम नहीं हो पाईं। सुखमंती का वक्त ने पढऩे लिखने का मौका नहीं दिया। गांव की रूढि़वादिता में पलकर बड़ी हुई सुखमंती का विवाह उसके माता पिता ने बसंतलाल से कर दिया। गृहस्थी में अपनी जिम्मेदारियों को निभाते हुए उसने एक के बाद एक चार पुत्रियों को जन्म दिया। इसके बाद बीमारी के चलते पति बसंत की मृत्यु हो गई। अशिक्षित सुखमंती के पास चार पुत्रियों की परवरिश का दारोमदार आ पड़ा।
हर राह पर कांटे
पति की मृत्यु के बाद हर राह पर उसकी अशिक्षा एवं रूढि़वादी परिपाटियां बाधा बनकर रोड़ा लगाती रहीं लेकिन उसने हार नहीं मानी। सुखमंती बताती हैं कि मंैने संकल्प लिया, मैंने तो बिना पढ़े लिखे अपना जीवन बिता दिया लेकिन अपनी चारों बेटियों को पढ़ाउंगी। मजदूरी करने के दौरान स्व सहायता समूह से जुड़ी। अपनी कमाई की बचत और लोन लेकर बड़ी बेटी सरस्वती का विवाह किया और इस दौरान अपनी तीन पुत्रियों को पढ़ाती रहीं। सुखमंती कहती हैं कि आज जब मैं अपनी सभी बेटियों को पढ़ते देखती हूं तो मेरा सिर गर्व से ऊंचा हो जाता है कि अशिक्षा के चलते जो मेरे साथ हुआ वह मेरी बेटियों के साथ कभी नहीं होगा। मेरी बेटियां अपने पैरों पर खड़े होकर अपनी जिम्मेदारियों को निभाएंगी और अन्य घर की बेटियों को पढ़ाने में मदद करेंगी।
हुनर पर किया भरोसा
निवास के जंगलिया गांव की अनीता झारिया का विवाह महज 16 वर्ष की उम्र में कर दिया गया। जब उसकी पुत्री मात्र 10 वर्ष की थी अनीता को पति ने पुत्री सहित त्याग दिया। अनीता हताशा और निराशा से जीवन गुजार रही थी तभी उसे उसके हुनर पर भरोसा आया और उसने कपड़े सिलाई का काम शुरू कर दिया। धीरे-धीरे कपड़े सिलने लगी और उसका व्यवसाय बढऩे लगा। 4-5 गांव की महिलाएं अपना ब्लाउज और कपड़ा सिलवाने के लिए आने लगी। इस तरह दिन भर में 400 से 500 कमाने लगीं। अब वह मायके में ही रहने लगी। अनीता बताती हैं कि उन्होंने संकल्प ले रखा था कि अपनी बेटी को पढ़ाएंगी और यह कर दिखाया। बेटी को बीए फाइनल तक की शिक्षा दिलाई और स्वयं उसक विवाह कराया। मायके के गांव में अपना मकान बनाया और अब गांव की अन्य महिलाओं को मुसीबत से लडऩे का हौसला दे रही हैं।