मंडला. हलषष्ठी पर्व में पुत्रवती महिलाओं ने व्रत धारण कर अपने पुत्रों के दीर्घायु होने की कामना की। महिलाओं ने भगवान विष्णु की पूजा अराधना की और पुत्रों का तिलक किया। पुत्रों ने माता के चरण छूकर आशीर्वाद लिया। हलषष्ठी पर्व शहर सहित ग्रामों में मनाया गया। पर्व के चलते बाजार में चहल पहल बढ़ गई है। खरीद करने लोग बाजार पहुंचे। हरछठ में गाय के दूध से बनी किसी भी वस्तु का सेवन नहीं किया जाता। इस दिन पसई के चावल खाये जाते हैं। महिलाएं हलषष्ठी पर्व में व्रत धारण कर भगवान विष्णु का पूजन किया। इस दिन गो माता की पूजा भी की जाती है। शाम के समय महिलाओं ने विविध उपचारों से पूजन संपन्न किया। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष में हलषष्ठी पर्व मनाया जाता है। शास्त्रो में बताया गया कि पुत्रवती स्त्रीयां अपने पुत्र की रक्षा एवं लंबी आयु के लिये यह व्रत करती है। वस्तुत यह गो-पूजा का पर्व है। बताया गया कि जिस प्रकार माता की तरह गाय अपने दूध से मनुष्य की रक्षा करती है उसी भाव से सभी को यह व्रत करना चाहिया। नगर में भैंस का दूध 200 रुपए लीटर तक विक्रय किया गया। अंजनिया, नारायणगंज, घुघरी, भुआबिछिया में भी अनुष्ठान किए गए।
पूजा में बांस का है विशेष महत्व
मवई. अधिकांश घरों के आंगन अथवा छत में कांस की हरछठ माता स्थापित की गई। प्राचीन परंपराओं के अनुरूप पूजन पाठ संपन्न हुआ। जिसमें महिलाओं ने प्रसाद चढ़ाकर ईश्वर से बच्चों के लिए प्रार्थना की। पूजन के लिए पुत्रवती महिलाओं ने कांश की हरछठ माता को आंगन में स्थापित किया। विधि विधान से पूजा की कथा सुनी। मवई के पंडित विजेन्द्र पाठक ने बताया कि इस दिन वंश पूजा का महत्व है। इसलिए बांस का पूजन किया जाता है। बांस से बनी सामग्री का उपयोग कर वंश सकुशल रखने के लिए महिलाएं व्रत करती हैं। सुबह से ही माताओं ने व्रत रखा। पूजन पाठ कर शाम को पलाश, कांस और बेर के वृक्ष का पूजन कर कथा सुनी। हल्दी, कुमकुम से वंदन कर माताओं ने बेटों की लंबी उम्र की कामना की। पुरानी मान्यता के अनुसार आम की लकड़ी से हवन और महुआ की पत्तल से पूजन की प्रक्रिया का समापन हुआ। पूजा-आराधना के बाद प्रसाद वितरण हुआ। व्रतधारी माताओं ने पसई के चावल और महुआ व दही आदि का सेवन किया।
पसई चावल व महुआ किया ग्रहण
निवास. निवास सहित आसपास के क्षेत्रों में माताओं ने पुत्रों की दीर्घायु और अच्छे स्वास्थ्य के लिए हलषष्टी व्रत रखकर घरों में ही पूजन किया। मंगलवार को भाद्रपद कृष्णपक्ष की षष्टी तिथि में हलषष्टी व्रत आस्था और भक्ति के साथ मनाया गया। इस व्रत को शास्त्रों में भी संतान की रक्षा के लिए सर्वोत्तम बताया गया है। इससे सुबह से ही घरों में आस्था और भक्ति का माहौल रहा घरों में पूजा-अर्चना भी हुई। इस व्रत में शक्कर और मिट्टी की चुकिया, सात प्रकार के अन्न (जौ, गेहूं, चना, धान, अरहर, मूंग, मक्का), पांच प्रकार की भाजी और महुआ, आम, पलास की पत्ती, कांसी के फूल, नारियल, मिठाई, रोली-अक्षत, फल, फूल से पूजन किया जाता है। साथ ही भैंस के दूध से बने दही और घी का भी विशेष महत्व है। व्रत में हल लगा अन्न और गाय के दूध से बनी खाद्य सामग्री निषेध है। इसी कारण व्रकधारी माताएं व्रत का परायण भैंस के दूध व उससे बने घी, दही के साथ पसी के चावल और बिना हल लगे अन्न, सब्जी और फलों को ग्रहण कर व्रत का परायण करती हैं।