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बरगद का पेड़ आज भी बयां कराती है आजादी के परवानों के किस्सों को याद

इसी पेड़ में 23 लोगों क्रांति के दौरान दी गई थी फांसी

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बरगद का पेड़ आज भी बयां कराती है आजादी के परवानों के किस्सों को याद

बरगद का पेड़ आज भी बयां कराती है आजादी के परवानों के किस्सों को याद

मंडला. अंग्रेजी हुकूमत की क्रूरता बयां करता वटवृक्ष आज अपना अस्तित्व बचाने के लिए संषर्घ कर रहा है। जिला मुख्यालय के बड़ चौराहा में स्थिति बरगद के पेड़ को संरक्षण की दरकार है। पेड़ के आसपास चबूतरा बना कर मिट्टी भर दी जाए तो इसकी उम्र बढ़ सकती है। दरअलस यह बरगद का पेड़ आजादी की लड़ाई में शहीद हुए देशभक्तों की यादें संजोए हुए है। लेकिन बढ़ते अतिक्रमण और प्रशासनिक लापरवाही से यह वृक्ष अपनी अंतिम सांसें गिन रहा है। यह बरगद का पेड़ अंग्रेजों के जुल्मों और आजादी के परवानों के किस्सों की याद दिलाता है। सन 1857 की क्रांति से लेकर अंग्रेजों के जुल्मों की यादों को संजोये हुए हैं। 1857 की क्रांति के दौरान यहां 23 लोगों को फांसी दी गई थी। इतिहासकार प्रो शरद नारायण खरे ने बताया कि 1857 की क्रांति के दौरान जिले में रामगढ़ की रानी अवंती बाई का राज्य था। अंग्रेजाें से बगावत के बाद चार लोगों को अंग्रेज सरकार ने गिरफ्तार किया था जिसमें से दो लोगों को फांसी दे दी गई व अन्य दो लोगों को इसलिए छोड़ दिया गया ताकि वे दूसरे बगावत करने वालों को बता सकें। इसके दूसरे सप्ताह फिर 21 लोगाें को फांसी दे दी गई थी। जानकारों की माने तो इसके पूर्व व बाद में भी अंग्रेज सरकार से बगावत करने वाले देशभक्तों को इस बरगद के पेड़ में फांसी दी जाती थी। पेड़ में फांसी के फंदे के काम आने वाले लोहे के मोटे शिकंजे कसे हुए हैं। जिससे रस्सी बांधी जाती थी। जिसे आज भी बरगद के पेड़ में देखा जा सकता है। बड़ चौरहा शहर के हृदय स्थल है। वट वृक्ष रोजना छलनी हो रहा है। वट वृक्ष के तनों पर बोर्ड लगाने के लिए दर्जनों कीलें लगाई गई हैं। वहीं आस पास काबिज अतिक्रमण भी परेशानी का सबब बना हुआ है। वृक्ष से सटकर लगी दुकानें वृक्ष को नुकसान पहुंचा रहीं हैं। जिसकी सुध लेने की फिक्र न तो नगरीय प्रशासन को है और न ही जिला प्रशासन को। पर्यावरण प्रेमी भी वृक्ष को लेकर उदासीन बने हुए हैं। वट वृक्ष प्रदेश का राजकीय वृक्ष है।

देशभक्तों में डर देखना चाहते थे अंग्रेजप्रो डॉ शरद नारायण खरे का कहना है कि अम्बेडकर चौराहे या बड़ चौराहे पर स्थित वट वृक्ष दो सौ वर्ष से अधिक पुराना है। इतिहास के संदर्भों के अनुसार यहां 1842 के बुंदेला विद्रोह, 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम व 1930 के जंगल सत्याग्रह के समय अनेक स्वतंत्रता सेनानियों व देशभक्तों को इसलिए सार्वजनिक रूप से फांसी देकर इस पेड़ से लटकाया गया था, जिससे भारतीय देशभक्तों में डर व आतंक की भावना उत्पन्न हो। ऐतिहासिक स्रोत तो यह भी कहते हैं कि सत्याग्रहियों के फांसी पर लटके शरीर कई दिनों तक लटकाकर रखे जाते थे। दरअसल यह ब्रिटिश हुकूमत की दमनकारी नीति का अंग था। देशभक्त इस बलिदान स्थल को श्रद्धा, सम्मान व आस्था की नजर से देखते हैं एवं प्रणाम निवेदित करते हैं।