
मंडला- यदि किसी जीवित व्यक्ति को प्रशासनिक दस्तावेज पर मृत घोषित कर दिया जाए तो उस पर और उसके परिवार पर क्या बीत रही होगी? यह कोई सहदेव मार्को और उसके परिवार से पूछे। जिंदा व्यक्ति का मृत पंजीयन कर दिए जाने के कारण न केवल उस व्यक्ति को शासन की किसी योजना का लाभ मिल पा रहा है और न ही उस व्यक्ति को कोई जिंदा मानने को तैयार है।
अपनी सलामती की दुहाई देते हुए सहदेव दफ्तरों के चक्कर काटते हुए लगभग चार वर्ष बिता चुका है लेकिन कहीं भी उसकी सुनवाई नहीं हो रही है। मामला बिछिया विकासखंड के माधोपुर पंचायत का है। यहां का निवासी और अनुसूचित जनजाति समुदाय के सहदेव पिता गुड्डा मार्को को समग्र पोर्टल में मृत घोषित कर दिया गया है। जिसके बाद वह अपनी जीवित अवस्था का प्रमाण देने के लिए कार्यालयों और पंचायत अधिकारियों के पास लगातार चक्कर लगा रहा है। आदिवासी बहुल्य जिले के आदिवासी और पिछड़े जाति- जनजाति के लोगों को विकास की मुख्यधारा से जोड़े जाने के कारण भले ही दर्जनों योजनाएं शासन की ओर से चलाई जा रही हों लेकिन वास्तविकता के धरातल पर न केवल योजनाएं कागजों पर सिमटती जा रही हैं बल्कि स्थानीय प्रशासन के कारण कहीं लोग मानसिक रूप से प्रताडि़त हो रहे हैं तो कहीं योजनाओं से वंचित हो रहे हैं।
2014 में किया मृत घोषित
पीडि़त सहदेव का कहना है कि उसे समग्र पोर्टल की जानकारी के अनुसार, मृत बताया जा रहा है। 59 वर्ष की उम्र में उसे पंचायत के रिपोर्टिंग अथॉरिटी ने न केवल मृत घोषित किया बल्कि उक्त जानकारी को
बकायदा पोर्टल में दर्ज भी कर दिया। पोर्टल के अनुसार, सहदेव की मृत्यु की तारीख 28 अगस्त 2014 दर्शाई गई है और इसकी रिपोर्टिंग तारीख 13 दिसंबर 2014 दर्शाई गई है। पोर्टल में रिपोर्टिंग अथॉरिटी का नाम धनीराम बताया गया है। यही कारण है कि पीडि़त सहदेव को न केवल शासन की किसी योजना का लाभ मिल पा रहा है और न ही शासकीय दस्तावेजों में हुई त्रुटि को सुधारने का कार्य किया जा रहा है।
Published on:
05 May 2018 05:26 pm
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