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हायर सेकंडरी के बच्चों को पढ़ा रहे बारहवीं पास

शासकीय विद्यालयों की अव्यवस्थाओं से गिरा शैक्षिक स्तर

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Twelfth pass teaching higher secondary children

Twelfth pass teaching higher secondary children

मंडला. हायर सेकंडरी स्कूल परीक्षा पास स्कूल मदर्स के जिम्मे दर्जनों शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों की पढ़ाई को सौंपकर रखा गया है। इससे न केवल शासकीय स्कूलों की पढ़ाई बुरी तरह से प्रभावित हो रही है बल्कि साथ ही बच्चों का शैक्षणिक स्तर भी लगातार नीचे आ रहा है। यह मामला है बिछिया विकासखंड के 38 शासकीय विद्यालयों का। जिनमें प्राथमिक शाला, माध्यमिक शाला, हाइस्कूूल और हायर सेकंडरी स्कूल शामिल हैं। इन शैक्षणिक संस्थाओं में जिन सहायक शिक्षकों पर बच्चों को पढ़ाने का जिम्मा है वे सहायक शिक्षक मूलत: शिशु शिक्षा केंद्रों की स्कूल मदर्स हैं। जिन्हें वर्ष 2002 में आदिवासी विकास विभाग द्वारा विकासखंड के 38 शासकीय विद्यालयों में पढ़ाने की जिम्मेदारी दी गई थी।
विभागीय सूत्रों के मुताबिक शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 के लागू होने के बाद स्कूल मदर्स को वापस उनके मूल पदों पर भेजा जाना था लेकिन वे अब भी अपने अपने पदों पर डटे हुए हैं। जानकारी के अनुसार, बिछिया के 56 शिशु शिक्षा केंद्रों में स्कूल मदर्स कार्यरत है, इन ग्रामों में महिला एवं बाल विकास विभाग की आंगनबाड़ी कार्यकर्ता कार्यरत रहीं। शिशु शिक्षा केंद्र एवं आंगनबाडिय़ों में 6 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को प्रवेश दिया जाता है। आंगनबाडिय़ों में बच्चों की दर्ज संख्या एवं उपस्थिति कम होने के कारण वर्ष 2002 में जिला योजना समिति एवं आदिवासी विकास विभाग द्वारा उक्त शिशु शिक्षा केंद्रों में कार्यरत हायर सेकंडरी परीक्षा उत्तीर्ण स्कूल मदर्स को सहायक शिक्षक के पदों पर पदांकित किया गया और वर्ष 2009 में शिक्षा का अधिकार अधिनियम लागू होने के बाद भी इन स्कूल मदर्स को अपने मूल पदों पर नहीं भेजा गया है।
गिर रहा पढ़ाई का स्तर
बिछिया विकासखंड के 3 उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, 2 माध्यमिक विद्यालय एवं 33 प्राथमिक विद्यालयों में स्कूल मदर्स द्वारा बच्चों को पढ़ाया जा रहा है। चूंकि इनमें से अधिकतर स्कूल मदर्स स्वयं सिर्फ हायर सेकंडरी उत्तीर्ण कर, बिना विशेष दक्षता अथवा योग्यता के बच्चों को पढ़ा रहे हैं, इसलिए विद्यार्थियों के शैक्षणिक स्तर पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। इस बारे में जानकारों का कहना है कि वर्ष 2002 की तुलना में वर्ष 2019 में सिलेबस में अत्यधिक बदलाव किए गए हैं। ऐसे में विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए वर्तमान मापदंडों एवं नियमों पर खरे उतरने वाले शिक्षकों पर ही अध्ययन का दायित्व होना चाहिए अन्यथा विद्यालय के शैक्षिक स्तर में गिरावट स्वाभाविक है।