21 जनवरी 2026,

बुधवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

कार्तिक माह में आराधना कर रही महिलाएं

ये कथा है प्रचालित

3 min read
Google source verification
कार्तिक माह में आराधना कर रही महिलाएं

कार्तिक माह में आराधना कर रही महिलाएं

मंडला. कार्तिक के महीने में चंद्रमा अपनी किरणों को जमीन पर सीधी डालता है इसलिए वैज्ञानिकों का कहना है कि जो मनुष्य इस महीने में चंद्रमा द्वारा अमृत के समान प्रसारित की हुई किरणों से निर्मल और अमृत के समान बनाए जल में सुबह काल जाकर डुबकी लगाता है वह अन्य प्रकार के रोगों से रहित होकर सुंदर और बलिष्ठ हो जाता है। क्योंकि चंद्रमा की किरणें रात भर जिस कंदमूल फल भोज्य पदार्थ और जल पर पड़ती हैं वह अमृत के समान रोग हरता है और पौष्टिक बन जाता है। इसलिए मनुष्य को सुखी और निरोग रहने के लिए कार्तिक माह का महत्व बताया गया है कार्तिक के महीने में बादल भी पानी का रूप हो जाते हैं निर्मल वायु भी बहकर जल को निर्मल कर दिया करती है और चंद्रमा की किरणें भी पूर्ण रूप से अमृत वर्षा कर जल को अमृत मय बना दिया करती है। इसलिए कार्तिक में जलाशयों इत्यादि में स्नान करना उत्तम माना गया है। साथ ही कार्तिक स्नान को लेकर बहुत सी कथाएं भी प्रचलित है जिनमें से प्रमुख हैं कृष्ण एवं सत्यभामा की कथा तथा तुलसी माई की कथा जो कुछ इस प्रकार से है तुलसी जी की कहानी एक बूढ़ी माई की जुबानी है। कार्तिक महीने में एक बुढिय़ा माई तुलसीजी को सींचती और कहती कि है तुलसी माता ! सत की दाता मैं तेरा बिड़ला सीचती हूँ, मुझे बहु दे, पीताम्बर की धोती दे, मीठा मीठा गास दे, बैकुंठा में वास दे, चटक की चाल दे, पटक की मोत दे, चंदन का काठ दे, रानी सा राज दे, दाल भात का भोजन दे। ग्यारस की मौत दे, कृष्ण जी का कन्धा दे, तब तुलसी माता यह सुनकर सूखने लगी तो भगवान ने पूंछा की हे तुलसी! तुम क्यों सुख रही हो, तुलसी माता ने कहा कि एक बुढिय़ा रोज आती है और यही बात कह जाती है। में सब बात तो पूरा कर दूंगी लेकिन कृष्ण का कन्धा कहा से लाऊंगी। तो भगवान बोले जब वो मरेगी तो में अपने आप कंधा दे आऊंगा, तू बुढिया माई से कह देना। बाद में बुढिय़ा माई मर गई । सब लोग आ गये। जब माई को ले जाने लगे तो वह किसी से न उठी। तब भगवान एक बारह बरस के बालक का रूप धारण करके आये। बालक ने कहा में कान में एक बात कहूँगा तो बुढिय़ा माई उठ जाएगी। बालक ने कान में कहा, बुढिया माई मन की निकाल ले, पीताम्बर की धोती ले, मीठा मीठा गास ले, बैंकुंठा का वास ले, चटक की चल ले, पटक की मौत ले, कृष्ण जी का कन्धा ले यह सुनकर बुढिया माई हल्की हो गई। भगवान ने कन्धा दिया और बुढिया माई को मुक्ति मिल गई। इसी आस्था एवं वैज्ञानिक कारणों के चलते तथा कथा किंवदंतियों की मान्यता के आधार पर देखा जा रहा है कि मंडला जिले में कार्तिक माह के प्रारंभ होते ही ब्रह्म मुहूर्त में सुबह 4 बजे मंडला जिले के विभिन्न नगर एवं वार्ड से मातृशक्तियां नर्मदा जी में इक_े होकर सुबह 4.30 बजे स्नान आदि से निवृत्त होकर पूर्ण मनोयोग एवं भक्ति भाव से लगभग 2 घंटे तक रिपटा घाट स्थित विष्णु भगवान मंदिर के समक्ष सामूहिक रूप से बैठकर कान्हा की पूजा अर्चना करती हैं। उन्हें नित्य नए भोग लगाती हैं महिलाओं ने कान्हा को 56 प्रकार का भोग लगाया। खास बात यह है कि प्रतिदिन के भोग की व्यवस्था महिला स्वयं करती है इसके लिए पर्ची उठाकर प्रसादी तय की जाती है। प्रत्येक पर्ची में अलग-अलग प्रकार की प्रसादी लिखी होते हैं। जिसे जिस आइटम की पर्ची मिलती है वह एक दिन पूर्व उस प्रसाद की व्यवस्था कर लेती हैं तथा दूसरे दिन साथ में लेकर आती हैं और यह क्रम पूरे कार्तिक मास तक चलता है। इतना ही नहीं यह सभी मातृ शक्तियां प्रतिदिन घाट बदल-बदल कर स्नान करती हैं और हर घाट में इसी प्रकार से पूर्ण भक्ति भाव एवं पूरे मनोयोग के साथ कान्हा जी की पूजा अर्चना के उपरांत भोग लगाती देखी जाती हैं।