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मंदसौर की हवेली में 18 वी शताब्दी के भित्ति चित्र आज भी आकर्षण का केंद्र

मंदसौर की हवेली में 18 वी शताब्दी के भित्ति चित्र आज भी आकर्षण का केंद्र

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मंदसौर की हवेली में 18 वी शताब्दी के भित्ति चित्र आज भी आकर्षण का केंद्र

मंदसौर की हवेली में 18 वी शताब्दी के भित्ति चित्र आज भी आकर्षण का केंद्र

मंदसौर.
शहर के पुराने किले पर स्थित हवेली है जो उस समय के सज्जनलाल सागरमल पोरवाल की थी। इसमें आज भी १8 वी 19 वीं शताब्दी की आकर्षक चित्रकला उस युग को जानने और उस समय की किस्तों को हर किसे के जेहन में ताजा करती है। उस युग की ऐसी 14 हवेलियां शहर में होना बताई जाती है। जिस समय उस काल खंड की बेहद आकर्षक चित्रकला भी इन हवेलियों में होना बताया गया है। अब देखरेख के अभाव में यह धुमिल हो गई है। लेकिन सज्जनलाल कि हवेली में आज भी यह चित्रकला स्पष्ट दिखाई देती है।


डॉ शर्मा ने शहर की हवेलियों मे भित्ति की चित्रकला पर की पीएचडी
किले पर सकरी गली में स्थित इस हवेली में 75 कमरे बताए जाते है। कुछ कमरे तो कमरों के अंदर कमरे इस प्रकार के बने हुए है मानो भूल भुलैया जैसे हो। हवेली में एक तल घर और एक ऐसा स्ट्रांग रूम जिसमें लोहे की तिजोरी विशेष प्रकार के तरीके से ही खुलना बताई जाती है। इस हवेली और इसके एक कमरे में भित्ति चित्रों को लेकर पुरातत्व के जानकार कैलाश पांडे ने बताया कि 18 वी 19 वी शताब्दी के इन भित्ति चित्रों पर पदम श्री वीश्री वाकणकर और डॉ रघुवीरसिंह ने इन पर अध्ययन किया है। आगे चलकर गिरजाशंकर रुनवाल को इसके लिए निर्देशित किया था। उन्होंने नगर की ऐसी 14 हवेलियों को खोजकर विवरण लिखा। डॉ दुर्गा शर्मा ने दशपुर क्षेत्र की भित्ति चित्रकला विषय पर पीएचडी की उपाधि प्राप्त की।


पुरवेत्ता पांडे ने बताया कि हवेली की चित्रकला जैसी अविभाजित मंदसौर जिले के जमुनियरावजी, पिपलिया रावजी की हवेली, नीमच सिटी में चौधरी की हवेली, डीकेन, कदवासा में स्थित हवेलियों में भी चित्र प्राप्त हुए। इस हवेली में बने चित्रों में कई चित्र राजस्थान होने से वहां के राजा रजवाड़ो की झलक भी इनमे दिखाई देती है। इस हवेली में उस काल बने चित्र आज भी स्पष्ट है।


१८५७ की क्रांति के मराठा शिविरों के चित्र भी इसमें है
जानकारी बताते है कि इन चित्रों में 1857 की क्रांति मराठा शिविरों भी चित्र है। मालवा की शैली में नील वर्ण की प्रधानता आज भी स्पष्ट है। हवेली के जिस कमरे में यह चित्र कला है वह सुंदरलेखा प्लास्टर पर है। 36 रागिनियों के हर पहर कोन सा गीत गाना है वह लिखा चित्रों पर पढ़ा जा सकता है। सैन्य संचालन, युध्द आखेट के चित्र जिज्ञासा को बढ़ाते रहते है।
१७ वीं शताब्दी के होल्करों की राजवाड़ा इमारत का भी है चित्र
इन चित्रों में एक चित्र होल्करो की इमारत राजवाड़ा जो 17 वी शताब्दी के अंत मे निर्माण होना प्रारभ हुई थी। इसकी भी चित्रकारी यहां बनी है। इसमें एक चित्र महाराजा तुकोजीराव होल्कर के दरबार का भी है जिसमे वे ब्रिटिश अधिकारी एव उनके सामंतों के साथ इस दरबार में मौजूद थे। पांडे ने बताया कि यशवंतराव होल्कर की छत्री मंदसौर जिले के भानपुरा में भी बनी हुई है। इसी जिले के सुवासरा में स्व त्रयंबकराव यावलकर ने चित्रकला व मूर्ति कला के अध्ययन के लिए कला केंद्र की स्थापना की। इसी कला केंद्र में पदमश्री विष्णु श्रीधर वाकणकर ने प्रारंभिक अध्ययन किया। आगे चलकर वे शेल चित्रों के विश्व विख्यात अध्येता बने। उनकी खोज भीम बेटका विश्व की सबसे बड़ी शेल चित्र वीथिका का समूह है। वर्तमान में यह यूनेस्को द्वारा संवरक्षित स्थान है।


चित्र के नीचे बादशाह तबुर सारा लिखा है
इस हवेली के इस पीढ़ी के महेश पोरवाल ने इस कमरे के चित्रकला को बताते हुए कहा कि एक चित्र राजा महाराजाओं की सवारियां निकलती है। एक चित्र के नीचे बादशाह तबुर सारा लिखा है। एक चित्र 36 रागिनियों का है जिसमे हर चित्र के साथ हर पहर कोनसा गीत रागिनियों को गाना है वह लिखा है। दरवाजों के बाहर हाथी व तोते बने हुए है। कई पीढिय़ों से वे इस हवेली में रहे लेकिन स्वयं वर्ष 2000 में इसे खाली कर नगर के अन्य क्षेत्र में रह रहे है। अभी एक किराएदार है। उनका यह कहना है कि इतने वर्षों बाद भी चित्रकला की वह पेंटिंग खराब नहीं हुई है।