
लालचट्टान और कंदराओं के बीच स्थित प्राचीन माकड़ी माता मंदिर
शामगढ.
नवरात्र के इस दौर में माता की भक्ति का दौर चल रहा है। ऐसे में क्षेत्र में स्थित माकड़ी माता मंदिर पर भी दूर-दर्राज से भक्त पहुंच रहे है। तहसील मुख्यालय से 7 किमी दूर ग्राम पंचायत बरखेड़ा उदा के माकड़ी गांव के समीप घनी राड़ी के बीच लाल चट्टानों की कंदराओं में बसा अतिप्राचीन माकड़ी चामुंडा माताजी का मंदिर है। मान्यता है कि यहां मंदिर के सामने बना अति प्राचीन कुंड में स्नान करने और माताजी के दर्शन करने से बीमारियां दूर होती है। इसी आस्था के चलते दूर-दर्राज से नवरात्र के इस दौर में भक्त यहां पहुंच रहे है। रात में चोर व लुटेरो का भी यहां भय नहीं रहता है। कई किवदंतियों के कारण माता के इस मंदिर से भक्तों की आस्था की डोर जुड़ी हुई।
कालातंर में मंदिर के समीप गुफा भी थी
ग्राम के पूर्व सरपंच भगवानसिंह सिसौदिया ने बताया कि माताजी का इतिहास कितना पुराना है यह बताना तो संभव नहीं है। माकड़ी माताजी को चामुंडा माताजी नाम से भी जाना जाता है। पूर्वज बताते थे कि कालांतर में जहां माताजी का स्थान है उससे कुछ ही दूरी पर एक छोटी गुफा थी। इसमें माताजी की प्रतिमा विराजित थी। गांव की ही वृद्ध महिला भक्त रोज माताजी के दर्शन और पूजा करने आती थी। गुफा का द्वार छोटा होने के कारण अंदर जाते समय अक्सर उसके माथे सिर में लग जाती थी। एक दिन जब उसे माथे पर लगी तो उसने कहा माताजी आप तो डरती हो इसीलिए अंदर बैठी रहती हो यह कहकर वह अपने घर चली गई। जब अगले दिन आई तो माताजी की प्रतिमा गुफा के बाहर दिखी। तब से माताजी की प्रतिमा यहीं पर विराजित है। कालांतर में माता की मूर्ति के नीचे पेढ़ी थी। 25 साल पहले गांव के 10 सदस्यों की एक समिति बनाकर मंदिर नव निर्माण की रूपरेखा तैयार की थी। प्रचार प्रसार किया गया और जन सहयोग से यहां मंदिर का निर्माण किया गया एवं साथ में ही अब यहां कॉम्प्लेक्स व धर्माशाला का निर्माण चल रहा है। कई सालों से दोनों नवरात्रि पर यहां मेला लगता है एवं भंडारे का आयोजन होता है।
माकड़ी चामुंडा माताजी की प्रतिमा
कामना पूरी होने पर मां से जुड़ी कड़ी तो कहलाई माकड़ी माता। कंजर भी करते पूजा। पंडित शिवनारायण जोशी बताते हैं कि यहां विराजित माताजी की पहली पूजा गांव के सिसोदिया परिवार की लगती हैं इसके बाद ही अन्य भक्त यहां पूजा-अर्चना करते है। वही भक्तों की मुराद को जल्द पूरा करती है। जिसकी भी मुराद पूरी होती थी तो कहते थे कि इसकी मां से कड़ी जुड़ी है। इसी कारण माताजी को माकड़ी चामुंडा माताजी नाम से पुकारा जाता है। खास बात यह है कि माता रानी के दरबार में चोर, कंजर भी मां दरबार में आते हैं। आज भी रात या सुनसान राह में इस क्षेत्र या आस-पास कोई कहे की वह माकड़ी चामुंडा माताजी के दर्शन करने जा रहा है या दर्शन करके आ रहा है तो उसे कोई परेशान नहीं करता है।
Published on:
01 Oct 2022 10:27 am
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