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vedio//मालवा-मेवाड़ की अर्थ व्यवस्था को मजबूत करने वाला ‘काला सोना खेतों में तैयार’

-सात जन्मों से लेकर संसदीय क्षेत्र की राजनीति से लेकर अर्थ व्यवस्था तय करती है अफीम

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मंदसौर.
मालवा-मेवाड़ की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने वाला काला सोना (अफीम) की फसल खेतों में तैयार हो गई है। अफीम कास्तकार खेतों में लुड़ाई-चिराई का कार्य कर रहे है। इस काला सोना को निकालकर अप्रेल माह तक अपने घरों में दिन-रात कड़ी सुरक्षा के बीच रखेगें और फिर नारकोटिक्स विभाग के तौल में किसान तौलेंगे। संसदीय क्षेत्र में सबसे प्रमुख और प्रतिष्ठा की फसल अफीम है। अफीम की फसल कितनी अहम है इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि सात जन्मों का रिश्ता के साथ ही नेताओं के राजनीति भविष्य से लेकर अर्थव्यवस्था को यह फसल तय करती है। वहीं दूसरी और अफीम की फसल के कारण प्रदेश में तस्करी का सबसे बड़ा गढ़ मंदसौर संसदीय क्षेत्र को माना जाता है। इस तस्करी पर रोक लगाने के लिए करीब तीन से चार विंग कार्य करती है।
मंदसौर जिला अफीम उत्पादक क्षेत्रों में अग्रणी क्षेत्रों में गिना जाता है। पीढ़ी दर पीढ़ी अफीम की खेती कर रहे है और वर्तमान में भी अफीम की खेती में किसान रात दिन खेत पर ही बिता रहे है। अफीम की खेती के साथ प्राचीन परंपराएं भी जुड़ी है। आधुनिक काल के साथ खेती के तरीके तो बदले लेकिन ब्रिटिश शासन काल से लेकर अब तक कई सालों के सफर में मंदसौर जिला काले सोने के उत्पादन का गढ़ बना हुआ है। केंद्र सरकार के वित्त मंत्रालय से इसकी नीति जारी होने के बाद नारकोटिक्स विभाग के अधीन किसान अफीम की खेती करते है। हालांकि इसमें परिवर्तन का दौर चलता रहताहै। वर्तमान में किसानो को १०-१० ऑरी के पट्टें विभाग ने दे रखे है। जिले में १७ हजार से अधिक अफीम के पट्टेधारी किसान है।
सफेद फुलों के साथ काले सोने की महक
ब्रिटिश समय के दौर से जिले में अफीम की खेती चली आ रही है और तभी से अफीम का बड़ा व्यापार का केंद्र मंदसौर जिला रहा है। समय के साथ सिस्टम बदला लेकिन अफीम की खेती जिले में होती रही। वर्तमान में पट्टे जारी होने से लेकर अफीम केंद्र पर आने तक किसान अफीम की खेती में पूरी तरह लगे रहते है। अफीम पर सफेद फुलों की बहार आने के साथ ही काले सोने की महक हर और फैल रही है। कालका की पूजा कर चीरा लगाने की परंपरा का भी वर्षों से जिले का किसान पालन करता आया है।
ऐसे मिलता है लाइसेंस
अफीम की खेती नारकोटिक्स विभाग की निगरानी में की जाती है। इसके लिए हर साल केंद्रीय वित्त विभाग द्वारा पॉलिसी निर्धारित कर जारी की जाती है। उसके तहत खेती होती है। विभाग इस पॉलिसी में लाइसेंस (पट्टा) देता है। पिछले दो सालों से जारी पॉलिसी में सीपीएस सिस्टम आया है। इसमें मार्फिन पूरी नहीं करने वाले के पट्टें बहाल करते हुए उन्हें सीपीएस में पट्टें जारी किए गए है। यानी नियमित में किसान को डोडे पर चीरा लगाने का अधिकार होता है और सीपीएस में उसे चीरा लगाने का अधिकार नहीं। नियमित में सिर्फ उसे विभाग को अफीम देना होती है और सीपीएस में विभाग को डोडा काटकर देना होता है।
१२० दिन में तैयार होती है फसल
अफीम की फसल औसतन १२० दिन में तैयार हो जाती है। सितबंर-अक्टूबर में इसकी पॉलिसी जारी होने के बाद नवंबर माह में दीपोत्सव के आसपास पट्टें जारी होती है। इसके बाद किसान निर्धारित ऑरी के लिए दिए पट्टें पर अफीम की बोवनी करता है। दिसंबर-जनवरी माह में अफीम की फसल पर सफेद फूल आने के साथ उन फूलों से डोडे भी निकलना शुरु हो जाते है। फरवरी माह में किसान अफीम के डोडे पर चीरा लगाकर अफीम लेने का काम शुरु करता है और मार्च में अफीम किसान के घर पहुंच जाता है और फिर अप्रेल में नारकोटिक्स विभाग तोल करता है वहां किसान अफीम देने के लिए पहुंचता है।