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प्राचीनकाल में युद्ध विजय का पहला कीर्ति स्तंभ पहली बार दशपुर में बना

प्राचीनकाल में युद्ध विजय का पहला कीर्ति स्तंभ पहली बार दशपुर में बना

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मंदसौर.
मंदसौर शहर का अपना गौरवमयी इतिहास है। जिस पर आज भी हम गौरव कर सकते है। ८ दिसंबर को मंदसौर शहर अपना गौरव दिवस मनाएगा और इसकी तैयारियंा चल रही है। ओलिकर वंशज के राजाओं के बीच सम्राट यशोधर्मन की हुणों पर विजय का प्रतीक इस दशपुर नगर में इतिहास को कई अनुठे रत्न दिए है। प्राचीनकाल में ही युद्ध विजय का पहली कीर्ति स्तंभ भी इसी दशपुर नगरी में पहली बार बनाया गया था।
प्रख्यात पुरात्तववेत्ता डॉ विष्णु श्रीधर वाकणकर पद्मश्री के अनुसार इस नगर की स्थापना ताम्राश्म काल 2000 ई पूर्व में हो चुकी थी। अभिलेखिक साक्ष्यों के आधार पर ईसा से लगभग 200 वर्ष पहले इस नगर का नामकरण दशपुर के रूप में हो चुका था। इसका प्राचीनतम प्रमाण अवलेश्वर के स्तंभ में मिलता है। प्राचीन समय का यह दशपुर नगर के होने के साहित्यिक प्रमाण भी उपलब्ध है और इसके प्रमाणित साक्ष्यों की कमी भी नहीं है। इस क्षेत्र में ओलिकर राजवंश का साम्राज्य था व दशपुर इनकी राजधानी थी।
शिवना के आंचल में ओलिकर साम्राज्य का उदय व अस्त हुआ
दशपुर ने भारतीय इतिहास व साहित्य के अनूठे रत्न दिए है। शिवना के आंचल में ओलिकर के साम्राज्य का उदय व अस्त ही नहीं हुआ बल्कि इसके आंगन में अनेक जातियों ने निर्माण व विनाश की अंगड़ाईयां भी ली है। भारत की सीमाओं का प्राचीनतम अभिलेखित प्रमाण दशपुर ने ही दिया है।
शैवधर्म का यह केंद अब मंदसौर के नाम से जाना गया
यहां के मुल्यवान व महीन रेशमी वस्त्रोद्योग के लिए संसार का प्रथम विज्ञापन इसी नगर में उत्कीर्ण किया गया। कृष्ण का सबसे पहला कलात्मक विवरण भी यहीं से होने का प्रमाण भी है। एशिया माइनर से उठी बर्बर हूणों के आक्रमण की आंधी इसी दशपुर के रणक्षेत्र में थमी और झुकी। सम्राट यशोधर्मन ने हुणों को पराजित किया था। आक्रमणकारी तोरमाण 499-502 ई व इसके पुत्र मिहिरकुल को इसी नगर के शासक प्रकाशधर्म व यशोधर्मा के आगे झुकना पड़ा। इसी जीत को लेकर प्राचीनकाल में युद्ध विजय का पहला विशाल कीर्ति स्ंतंभ भी पहली बार दशपुर में ही बना। महाकवि कालिदास ने अपने मेघदुत में इस नगर का स्मरण कर देश के अहम नगरों के रुप में किया है। करीब डेढ़ हजार वर्ष पूर्व यहां का प्रकाशेशवर नाम शिवालय संपूर्ण देश में प्रसिद्ध था। शैवधर्म का केंद्र यह नगर दशपुर आगे चलकर मुस्लिम काल में मंदसौर के नाम से जाना जाने लगा। वर्तमान में यहां के अष्टमुखी पशुपतिनाथ मंदिर ने राष्ट्रीय सीमाओं को पार कर विश्व में अपनी पहचान बना ली है।