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नेपाल में चार मुख तो देश में मंदसौर में पशुपतिनाथ की अष्टमुखी की विश्व की इकलोती सबसे बड़ी प्रतिमा

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मंदसौर.
नेपाल के काठमांडू में पशुपतिनाथ की चार मुख की प्रतिमा है। इसके बाद देश के मंदसौर में पशुपतिनाथ की अष्टमुखी विश्व की इकलोती व सबसे बड़ी दुर्लभ प्रतिमा है। शिवना की गोद से यह प्रतिमा निकली इसलिए शिवना तट पर ही पशुपतिनाथ विराजें। आज देश-विदेश से यहां भक्त पहुंचते है। बारिश के दिनों में उफनती शिवना की लहर हर बार पशुपतिनाथ के गर्भगृह में पहुंचकर पहले चरण प्रक्षालय करती है तो फिर जलाअभिषेक भी करती है। अष्टमुखी प्रतिमा में हर एक मुख जीवन को दर्शाया गया है। पशुपतिनाथ मंदिर परिसर में ही पिछले साल से शिवना से ही निकली सहस्त्र शिवलिंग महादेव की भी दुर्लभ प्रतिमा स्थापित की है। यह प्रतिमा भी कहा जाता है कि देश में सिर्फ पांच स्थानों पर ही है। ऐसे में दो दुर्लभ प्रतिमाओं के दर्शन के कारण महादेव का यह धाम अब तीर्थ स्थल बनता जा रहा है।
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प्रत्यक्षानंदजी के आह्वान पर महिलाओं ने पहने हुए आभूषण किए थे अर्पित
पशुपतिनाथ मंदिर के 101 फीट ऊंचे शिखर पर 100 किलो वजनी कलश स्थापित है। इस पर 51 तोले सोने की परत है। जब मंदिर का निर्माण हुआ तो शिवना के इस पार मंदिर निर्माण की सामग्री रखी रहती थी तब स्वामी प्रत्यक्षानंद महाराज की कथा का यहा दौर था। तब उन्होंने प्रवचनों में कहा कि आते भी राम बोलो जाते भी राम तो जितने भी प्रवचन में श्रद्धालु आते थे वह सब लोग मंदिर निर्माण में लगे ईट पत्थर बालू सहित रेत सामग्री शिवना के इस बार ले आते थे। प्रत्यक्षानंद महाराज के आह्वान पर कथा सुनने आई सभी महिलाओं ने अपने पहने हुए आभूषण पशुपतिनाथ को अर्पित किए थे और इन्हीं आभूषण से भगवान के मंदिर पर स्वर्ण कलश स्थापित हुआ था जो आज भी है।
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उदा धोबी को दिखी मूर्ति, राजमाता सिङ्क्षधया ने कराया मंदिर निर्माण
उदा नाम के धोबी को सपना आया था कि नदी में अष्टमुखी पशुपतिनाथ की प्रतिमा हैं। शिवना में कपड़े धोने के बाद उसकी प्रतिमा पर नजर पड़ी। इसके बाद धोबी ने अपने दोस्तों को यह बात बताई और दोस्तों की मदद से प्रतिमा को बाहर निकाला गया। इस प्रतिमा को निकालने के लिए 16 जोड़ बेलों को खींचने में लगाया था। तब जाकर प्रतिमा को बाहर निकाला जा सका था। प्रतिमा को निकालने के करीब 18 साल बाद तक मंदिर का निर्माण नहीं हुआ था, क्योंकि उस समय संसाधनों का भी अभाव था। स्वामी प्रत्यक्षानंद महाराज ने मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा की गई थी व कुछ समय बाद ग्वालियर स्टेड की राजमाता विजयाराजे सिंधिया ने मंदिर का निर्माण करवाया गया एवं वहीं मंदिर के शिखर पर स्वर्ण कलश को स्थापित किया गया।
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27 नवंबर को हुआ था मूर्ति का नामकरण
19 जून 1940 को शिवना नदी से बाहर आने के बाद प्रतिमा नदी तट पर स्थापित की। स्वामी प्रत्याक्षानंद महाराज चैतन्य आश्रम मेनपुरिया ने 23 नवंबर 1961 को प्राण-प्रतिष्ठा की गई। कार्तिक पंचमी 27 नवंबर को मूर्ति का नामकरण पशुपतिनाथ के रुप में किया गया। इसके बाद मंदिर निर्माण कार्य प्रारंभ हुआ। अष्टमुखी पशुपतिनाथ में बाल्यावस्था, युवावस्था, अधेड़ावस्था व वृद्धावस्था के दर्शन होते हैं। इसमें चारों दिशाओं में एक के ऊपर एक दो शीर्ष हैं। प्रतिमा में बाण शिला या गंगावतरण जैसी दिखाई देने वाली दुर्लभ सफेद धारियां हैं।

यह है प्रतिमा का इतिहास
इतिहासकार केसी पांडेय ने बताया कि इतने बड़े शिवलिंग का विश्व में कहीं। प्रतिमा के आठ मुख होने के साथ 7.3 फीट ऊंचाई है और 11.3 फीट गोलाई है। शिवना नदी के दक्षिणी तट पर बना अष्टमुखी का मंदिर हैं। आग्नेय शिला के दुर्लभ खंड पर निर्मित शिवलिंग की यह प्रतिमा है। प्रतिमा का वजन लगभग 46 क्विंटल 65 किलो 525 ग्राम हैं। पशुपतिनाथ मंदिर 90 फीट लंबा 30 फीट चौड़ा व 101 फीट ऊंचा हैं। माना जाता है कि विक्रम संवत 575 ई में सम्राट यशोधर्मन की हूणों पर विजय के आसपास का समय ही प्रतिमा के निर्माण का है।
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मंदिर के पुजारी कैलाश भट्ट ने बताया कि अष्टमुखी की अद्वितीय प्रतिमा विश्व में कही नहीं है। पशुपतिनाथ की यह प्रतिमा प्राचीनतम प्रतिमा है। अष्टमुखी व इतने बड़े शिवलिंग विश्व में कही नहीं है।
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