भानपुरा.
प्रदेश के उत्तर पश्चिम में कला साधकों ने जिस महान कला की साधना की और सांस्कृतिक प्रतिमानों का निर्माण किया उन्हें हम भानपुरा स्थित शासकीय संग्रहालय में देख सकते हैं। भानपुरा संग्रहालय की स्थापना आजादी से पहले 1942 में होलकर स्टेट के नरेश यशवंत राव होलकर द्वितीय के प्रयासों से हुई। इस संग्रहालय में प्रागैतिहासिक बस्तियों जैसे आवारा मनोटी इंद्रगढ़ के उत्खनन से प्राप्त पुरावशेषों को देखा जा सकता है। इस संग्रहालय मे सुजानपुरा, मोड़ी, इंद्रगढ़, हिंलाजगढ़, कंवला, संधारा, केथुली, निमथुर, कुना, बुंझर, अंसार, लोटखेडी आदि क्षेत्रों की कलात्मक प्रतिमाओं को संरक्षित किया गया है। इस संग्रहालय में होलकर यशवंत राव प्रथम के जमाने में नावली तोप निर्माण शाला में निर्मित तोपें भी आकर्षण व गौरव का विषय है। स्थानीय पुरात्वविद डॉ प्रद्युम्न भट्ट से इस संग्रहालय में रखी मूर्तियों के बारें में बताया।
डॉ भट्ट ने कहा कि संग्रहालय में सातवीं सदी से लेकर सोलहवीं सदी तक की बहुमूल्य कलात्मक प्रतिमाएं संग्रहित हैं। लेकिन दसवीं से तेरहवीं सदी के बीच निर्मित पाषाण प्रतिमाएं जिन्हें परमार युगीन कलात्मक प्रतिमाओं की श्रेणी में रखते हैं। इनमें जीवंतता मांसालता, लावण्यता तथा नायक नायिकाओं व देव प्रतिमाओं की भाव भंगिमाओं को कला कार ने इस तरह उकेरा है। पाषाण पर नहीं बल्कि मोम के सांचों में उन्हें ढाला है। डॉ भट्ट ने इसमें रखी हरिपुरा के नंदी का वर्णन किया। इस नंदी ने विश्व कला महोत्सव में न्यूयार्क व फ्रांस में प्रशंसा बटोरी थी। इसका बारीक जीवंत कलात्मक अंकन सूक्ष्म मनोभावों का अंकन पाषाण में प्राणों का जैसे संचार कर दिया हो। इस संग्रहालय में गोरी प्रतिमा, उमामहेश्वर, योग नारायण विष्णु वाराही, कार्तिकेय सूर्य, नटराज शिव सहित अनेक प्र्रतिमाएं दर्शनीय हैं। यह संग्रहालय होलकर नरेश यशवंत राव प्रथम के स्मारक भानपुरा छत्री में अवस्थित होकर राज्य पुरातत्व संचालनालय के अधीन है। इस संग्रहालय को देखने के लिए भारत ही नहीं भारत के बाहर के अध्येता व हजारों श्रद्धालु यहां आते है। भानपुरा का पुरातत्व संग्रहालय मालवा में अपनी प्राचीन गौरव मय कलात्मक वस्तुओं के लिए विशेष पहचान रखता हैं। डॉक्टर भट्ट का मानना है कि भानपुरा के चप्पे चप्पे में पूरा संपदा बिखरी पड़ी है।