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‘सत्य एक नौका है, एक सीढ़ी है और यहीं अंर्तरात्मा की शुद्धि है’

‘सत्य एक नौका है, एक सीढ़ी है और यहीं अंर्तरात्मा की शुद्धि है’

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‘सत्य एक नौका है, एक सीढ़ी है और यहीं अंर्तरात्मा की शुद्धि है’

मन्दसौर.
साध्वी सुभूषणमति माताजी ने बंडीजी के बाग में दशलक्षण महापर्व पर उत्तम सत्य धर्म की व्याख्या की। उन्होंने कहा कि जैसे मां का बेटे पर प्यार कितना है, यह शब्दों की नहीं अनुभव की बात है वैसे ही सत्य वाणी से नहीं कहा जाता अनुभूत किया जाता है। सोने को ही कसौटी पर कसा जाता है, हीरे को ही तराशा जाता है उसी प्रकार सत्य की परीक्षा होती है। सत्य एक नौका है, सत्य एक सीढ़ी है, सत्य अंर्तरात्मा की शुद्धि है। तेल को डबल फिल्टर करके उपयोग करते है वैसे ही मन को भी सत्य वचन से फिल्टर करो। जितनी सावधानी से गाड़ी चलाते है उतनी सावधानी से ही जिव्हा को चलाओ। अपने पैसे को मितव्ययता से खर्च करते हो तो वचनों को भी मितव्ययता से खर्च करो। अर्थात हित मित प्रिय वचन बोले। ध्यान रहे असत्य हमेशा सत्य की बैसाखी पकडक़र चलता है। ऐसा सत्य भी ना बोले की किसी की हत्या हो जाये और ऐसा प्रिय भी ना बोले की सत्य की हत्या हो जाए। इस अवसर पर तपस्या करने वाले आदित्य अग्रवाल एवं मिहिका मिंडा का चातुर्मास समिति के अरविन्द मिण्डा, पिंकेश बक्षी एवं ज्योति मेहता, मंजूला भूता द्वारा स्वागत किया गया। 25 सितंबर को शासकीय महाविद्यालय में विशेष प्रवचन के लिए प्राचार्य सोनी एवं डॉ. राजकुमार बाकलीवाल द्वारा विनती की गई। संचालन कोमलप्रकाश जैन पंछी ने किया। आभार अरविन्द मेहता ने माना।
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पापकर्म में नही धर्म कार्य में धन खर्च करो
आत्मा कई बार संसार में जन्म लेती है और हर बार शरीर बदलती रहती है। जन्म मरण का यह चक्कर एक आत्मा के साथ कई भवों तक चलता है। संसार में उसी भवी आत्मा को पुरी तरह युक्ति मिलती है जो संसार के राग द्वेष को छोड नही पाती है और इसी चक्कर में कभी नरक कभी तिरन्य कभी मनुष्य तथा कभी देव गति में भटकती रहती है। यदि चारो गति से बचना है तो संसार के राग द्वेष को छोडऩा पड़ेगा। यह बात गणिवर्य प्रसन्नसागर ने तलेरा विहार सिथत चिदपुण्य आराधना भवन में आयोजित धर्मसभा में कही। उन्होंने कहा कि मनुष्य को इस संसार से इतना राग हो जाता है कि उसे कसाय भी अच्छे लगने लगते है जिन शासन मिला है तो जिन शासन से प्रेरणा लो और संसार के राग को छोडने का प्रयास करो।
गणिवर्य ने कहा कि जिन शासन में राग का अर्थ है मोह अर्थात संसार के मोह में छोड हमें परमात्मा के प्रति मोह रखना पड़ेगा। तभी इस संसार रूपी भव सागर से मुक्ति मिलेगी।
दीक्षार्थी की अनुमोदना करो
गणिवर्य ने कहा कि कोई व्यक्ति यदि दीक्षा ले रहा है तो कभी उसे मत रोके दिक्षार्थी के भाव अनुमोदना करके आओं वहा भोजन क्या बना केसा ब ना इसकी चर्चा नही बल्कि दिक्षार्थी ने कितना त्याग किया है उसकी चर्चा करो। उन्होंने कहा कि विवाह समारोह बगला बनाने के लिऐ हम धन खर्च करते है लेकिन यदि धर्म में धन खर्च करने की बात आती है तो हम पीछे हट जाते है। यह स्वभाव हमें बदलना चाहिए।
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